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हादसा या हत्या,परिवार जानना चाहता है सच, मृतक का नहीं कटता था पीएफ ईएसआईसी श्रम कल्याण मंडल कराएगा जांच

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सुरेन्द्र जैन धरसीवा रायपुर

सिलतरा की रामनिवास फेक्ट्री में कोल डस्ट में तीन दिन बाद मृत मिले सुपरवाइजर देवराज वर्मा के परिवारजन घटना का सच जानना चाहते हैं वो जानना चाहते हैं कि ये हत्या है या हादसा आख़िर उसके ऊपर डस्ट किसने डाली वही एक ओर सनसनीखेज मामला यह भी सामने आया है कि साल डेढ़ साल से काम कर रहे देवराज का फेक्ट्री प्रबंधन ने न तो ईएसआईसी कराया न ही उसका पीएफ कटता था इस मामले का श्रम कल्याण मंडल ने संज्ञान लेकर जांच की बात कही है।
मृतक के बड़े भाई संतोष वर्मा ने बताया कि उनका भाई देवराज साल डेढ़ साल से रामनिवास फेक्ट्री में काम करता था आठ घण्टे का उसे फेक्ट्री बारह तेरह हजार के आसपास पेमेंट देती थी लेकिन उसका एसआईसी पंजीयन कंपनी ने नहीं कराया था न ही पीएफ काटती थी भाई की इस तरह दर्दनाक मौत से दुखी संतोष का कहना है कि उन्हें उनके भाई की मृत्यु का कारण जानना है किसी ने हत्या की है या हादसा हुआ तो किसने उसके ऊपर कोल डस्ट डाली तीन दिन बाद कैसे शव मिला सच जानना है भाई का दशगात्र कार्यक्रम होने के बाद वह पुलिस अद्धिकारियो से उच्चस्तरीय जांच की मांग करेंगे।


जांच कराकर करेंगे प्रभावी कार्यवाही-शफी अहमद
छत्तीसगढ़ श्रम कल्याण मंडल के अध्यक्ष शफी अहमद ने कहा है कि 21 हजार रुपये तक जिनका मासिक वेतन है ऐंसे श्रमिको व फेक्ट्री कर्मियों का ईएसआईसी पंजीयन कराना चाहिए इससे राज्य सरकार और केंद्र सरकार की श्रमिको के कल्याणार्थ चल रही योजनाओं का लाभ श्रमिको को मिलता है रामनिवास फेक्ट्री में देवराज वर्मा का ईएसआईसी पंजीयन न होने की जानकारी मिली है इसकी जांच कराकर प्रभावी कार्यवाही की जाएगी।
ईएसआईसी पंजीयन के लाभ
ईएसआई का लाभ उन कर्मचारियों को मिलता है जिनकी मासिक आय 21 हजार या इससे कम होती है. ये स्‍कीम कर्मचारी राज्य बीमा निगम की तरफ से चलाई जाती है. कर्मचारी राज्य बीमा निगम (Employees State Insurance Corporation-ESIC) की तरफ से ईएसआई स्कीम उन कर्मचारियों के लिए चलाई जाती है, जिनकी आय कम होती है.
अधिकांश फेक्ट्रियो में नहीं है श्रमिको का ईएसआईसी पंजीयन
ओधोगिक क्षेत्र सिलतरा की कुछ बड़ी ओधोगिक इकाइयों को छोड़कर अधिकांश उधोगों में काम करने वाले श्रमिको ग्रामीण महिला श्रमिको का ईएसआईसी पंजीयन नहीं हैं लेबर ठेकेदार उनका भरपूर आर्थिक शोषण करते हैं उन्हें निर्धारित रेट करीब 400 रुपये की जगह आठ ग्घन्टे का मात्र 200 रुपये ही देते हैं।

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