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अश्लील और अमर्यादित वीडियो दिखाने की कोई तो सीमा हो -राजेश बादल

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आलेख
राजेश बादल

हद है। इस बार तो वाकई सोशल मीडिया ने हद कर दी। मध्यप्रदेश में एक आदिवासी पर स्थानीय बीजेपी विधायक के प्रतिनिधि ने पेशाब कर दी। इस घटना की जितनी भी निंदा की जाए ,कम है। यह क्रूर ,अमानवीय , सामंती और मर्यादा की सारी सीमाएँ लाँघने वाली घटना है। यह इस बात का भी प्रतीक है कि जब कोई पार्टी सत्ता में बीस साल तक बनी रहती है तो उसके नेता कितने गँवार ,घमंडी और ज़ाहिल हो जाते हैं। अफ़सोस कि ऐसे नेताओं को फाँसी देने का कोई विधान हमारे दंड विधान में नहीं है। घटना इस बात से और भी गंभीर हो जाती है कि नेता के उस समर्थक प्रतिनिधि ने इस गन्दी हरक़त का किसी मित्र से वीडियो रिकॉर्ड कराया और उसे शेयर किया। इस आधुनिकतम मीडिया अवतार के दुरूपयोग का यह चरम है। नेता प्रतिनिधि ने बाद में आदिवासी का हलफनामा बनवाया कि वह मानसिक रूप से विक्षिप्त था। लेकिन इस बात से उक्त नेता को कुकृत्य का लाइसेंस नहीं मिल जाता।
मगर मैं यहाँ एक दूसरे गंभीर मसले के साथ प्रस्तुत हूँ। इस समूचे प्रकरण में पत्रकारों ने इसी वीडियो को जारी किया ,अनेक चैनलों पर विस्तारित किया और आनन फानन में दुनिया भर में इसे फैला दिया। मेरा सवाल है कि यदि वह नेता प्रतिनिधि किसी लड़की के साथ दुष्कर्म करते हुए वीडियो बनवाता तो क्या पत्रकार उसे भी दिखाते ? क्या नहीं दिखाने और दिखाने के बीच कोई सीमा रेखा है ? इस घृणित ख़बर का कवरेज बिना वीडियो दिखाए भी किया जा सकता था।लेकिन हमारी हिंदी पत्रकारिता ने बेशर्मी की हद पार करते हुए इसे दिखाया। यूरोपीय और पश्चिमी देशों के पत्रकारों से भारतीय पत्रकारों को कुछ तो सीखना ही चाहिए। वे अपने किसी भी माध्यम में दुर्घटना में मारे गए लोगों के चेहरे और वीभत्स दृश्य नहीं दिखाते। यह उनकी अपनी आचार संहिता है ,जो उन्होंने स्वयं विकसित की है।
मेरी निराशा का एक कारण यह भी है कि जिन डिज़िटल मंचों ,टीवी चैनलों और अन्य माध्यमों में इसकी तस्वीरें परोसी गईं ,उनके संपादक ,प्रबंधक और ज़िम्मेदार संपादकीय सदस्यों ने यह अपने कनिष्ठों के लिए कौन सा नमूना पेश किया है। यह ग़ैर ज़िम्मेदार पत्रकारिता है। आप एक ग़रीब आदिवासी की पहचान भी नहीं छुपाते और उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित करते हैं। यह हमारे संविधान की भावना के ख़िलाफ़ है। कुछ मित्र यह कुतर्क दे रहे हैं कि यदि वीडियो नहीं दिखाया जाता तो सरकार और प्रशासन के कान में जूं भी नहीं रेंगती । मैं इसे नहीं मानता । आख़िर परदे पर दिखाने के लिए कोई तो मापदंड होना चाहिए । संपादकों ,मालिकों और उनके संगठनों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है । अगर वे किसी सर्वमान्य आचार संहिता को स्वीकार नहीं करते तो कम से कम अपने अपने माध्यम के लिए एक कोड ऑफ कंडक्ट तो स्वीकार करना ही पड़ेगा ।

लेखक देश के ख्यात वरिष्ठ पत्रकार हें।

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