आयुक्त प्रणाली को सवा साल हो गए लेकिन साधन-संसाधनों का संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है। डीसीपी स्तर के अफसरों को मिले वाहन अब खटारा हो रहे हैं। जोन-1 के डीसीपी आदित्य मिश्र तो बीते सप्ताह बाल-बाल बच गए। दरअसल इंदौर-भोपाल में आयुक्त प्रणाली की शुरुआत के साथ अफसरों की भी लंबी-चौड़ी फौज भेजी गई थी। तत्कालीन आयुक्त हरिनारायणाचारी मिश्र ने जुगाड़ लगा कर उनके बैठने की व्यवस्था तो की लेकिन गाड़ियों की पूर्ति तो वे भी नहीं करा पाए। जैसे तैसे मुख्यालय से चर्चा की और डीसीपी के लिए सिवनी, खंडवा, देवास, शाजापुर, भिंड, छतरपुर और सतना एसपी को स्वीकृत वाहन दिलवाए। अब ये वाहन (स्कार्पियो) भी खटारा हो चुके हैं। पिछले सप्ताह जोन-1 के डीसीपी आदित्य मिश्र की गाड़ी के ब्रेक फेल हो गए और पुलिस कंट्रोल रूम में दफ्तर के बाहर दीवार में जा घुसी। हालांकि डीसीपी थोड़ी दूर पहले ही उतर चुके थे।
आयुक्त के आदेश ने बढ़ाई परेशानी
पुलिस आयुक्त मकरंद देऊस्कर यूं तो सहज सरल व्यक्ति हैं लेकिन उनके एक आदेश ने परेशानी बढ़ा दी है। आयुक्त का यह आदेश उन मीडियाकर्मियों को ज्यादा परेशान कर रहा जो मैदानी रिपोर्टिंग करते हैं। आदेश पिछले सप्ताह ही जारी हुआ है। उसमें मीडिया ब्रीफिंग को लेकर गाइडलाइन तय की गई है। आयुक्त की मंशा भले ही पुलिस और मीडिया को सुविधा देना हो लेकिन थाना प्रभारियों ने तो बचने का बहाना निकाल लिया है। दरअसल आयुक्त ने लिखित में आदेश जारी कर कहा कि सभी उपायुक्त, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त, सहायक पुलिस आयुक्त और थाना प्रभारी मीडिया को ब्रीफिंग और बाइट दे सकेंगे। फरियादी और आरोपित की निजता व मानव अधिकार का ध्यान रखेंगे। ब्रीफिंग के दौरान भी संबंधित अधिकारी न्यायालय के आदेशों का पालन करेंगे। आयुक्त के इस आदेश के बाद उन थाना प्रभारियों ने बचने का रास्ता निकाल लिया जो अक्सर मीडिया के सवालों का सामना करने से कतराते थे। कुछ थाना प्रभारियों ने यह बोल कर वीडियो-फोटो और बाइट देने से इन्कार कर दिया कि आयुक्त ने ब्रीफिंग पर प्रतिबंध लगा दिया है।
जेल अफसरों का सिरदर्द बनीं ‘अधीक्षक’
करोड़ों के घोटाले में फंसी निलंबित जेल अधीक्षक उषाराज जेल अफसरों के लिए सिरदर्द बन गई है। सेंट्रल और जिला जेल के अफसर फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। हर कोई उससे बचने का रास्ता ढूंढ रहा है। उज्जैन जेल अधीक्षक रही उषाराज को पुलिस ने 15 करोड़ से घोटाले में गिरफ्तार किया था। उषाराज को कोर्ट के आदेश पर सेंट्रल जेल भेजा गया। वह इतनी शातिर निकली कि डायपर में ही 50 हजार रुपये छुपा लाई। सेंट्रल जेल अधीक्षक अलका सोनकर ने न सिर्फ उसके सामान की तलाशी करवाई बल्कि डायपर में रखी नोटों की गड्डियां भी जब्त करवा दी। सोनकर की परेशानी यह नहीं थी कि उषाराज नोट लेकर आई थी, उनकी दुविधा यह थी कि जिस घोटाले में उषाराज गिरफ्तार हुई वह सोनकर के कार्यकाल में हुआ था और पूछताछ से भी गुजर चुकी है। सोनकर ने बगैर देर लगाए उषाराज को जिला जेल भिजवा दिया।
अचानक डीसीपी से क्यों डरने लगे थाना प्रभारी
अफसरों पर गुर्राने वाले थाना प्रभारी अब सहमे-सहमे से हैं। कुछ महीने पहले तक तो डीसीपी और एडीसीपी को अनसुना कर देते थे। व्यवहार में बदलाव नवागत पुलिस आयुक्त मकरंद देऊस्कर के आदेश से हुआ है। अनुभवी उपायुक्त (डीसीपी) होने के बाद भी थाना प्रभारियों को हटाने के अधिकार से वंचित थे। डीसीपी थाना प्रभारियों को डांट फटकार तो करते थे लेकिन थाना प्रभारियों को पता था कि उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। आयुक्त ने आते ही सबसे पहले डीसीपी को अधिकारों से अवगत करवाया। बताया कि उनके जोन की कानून व्यवस्था उनके हाथ में है और थाना प्रभारियों को भी खुद संभालें। आयुक्त ने तो उन थाना प्रभारियों को बेरंग लौटा दिया जो महंगे-महंगे बुके लेकर स्वागत करने पहुंचे थे। आयुक्त की छूट के बाद जोन-1 के डीसीपी आदित्य मिश्र ने एरोड्रम टीआइ संजय शुक्ला को पुलिस लाइन भेज दिया। इसके बाद सभी थाना प्रभारी नतमस्तक हैं।
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