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विभाग और परिवार के बीच सामंजस्य बैठाना बहुत बड़ी चुनौतीपत्नी ने यह काम भी बखूबी किया

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बिलासपुर। बड़े बुजुर्ग हमेशा कहा करते हैं,शादी का जोड़ा ऊपर वाला बनाता है। जोड़े ऊपर से ही तय होकर आता है। बुजुर्गों और परिवार के बड़ों की इस बात पर हमने भरोसा किया। आधुनिक युग के चकाचौंध से दूर घर के बुजुर्गों ने जहां रिश्ता तय किया हम दोनों से सहजता के साथ स्वीकार किया। इसे संयोग कहें या फिर संस्कार। सगाई के दिन ही हम दोनों ने एक दूसरे को देखा। आंखें चार हुईं। एक ही नजर में हमने पसंद भी कर लिया। पसंद क्या। हम दोनों तो विवाह के बंधन में बंधने से पहले के रस्मों को मन से स्वीकार कर निभाने के लिए आए थे। सो सगाई का कार्यक्रम हुआ। फिर सात जन्मों के बंधन में बंध गए। जब सगाई हो रही थी उस वक्त पत्नी एमएससी में स्वर्ण पदक विजेता बन गई थी। पढ़ाई लिखाई में विलक्षण होने के बाद सादगी और संस्कार ऐसा कि उनके लिए कुछ शब्द ही नहीं निकल रहे। यह कहना है सिविल लाइन थाना में पदस्थ परिवेश तिवारी का। परिवेश बताते हैं कि पुलिस की नौकरी तो सभी जानते हैं। चौबीस घंटे और सातों दिन। शादी के पहले तक पत्नी का पुलिस और विभाग से दूर-दूर तक नाता नहीं था। प्रशासनिक अफसरों के बीच रहने और पली बढ़ी होने के कारण शुस्र्आत में तो लगने लगा था कि मेरी ड्यूटी और घ्ार के बीच सामंजस्य कैसे बैठेगा। वे एडजस्ट कर पाएंगी या नहीं। मुझे यह बताते हुए खुशी हो रही है कि घ्ार परिवार और जान पहचान के बीच जितना बेहतर सामंजस्य उन्होंने बनाकर रखा है शायद मैं कभी ना बना पाऊं और ना ही ऐसा कर बैठा पाऊं। इसे मैं अपना सौभाग्य ही कह सकता हूं कि पढ़ी लिखी और समझदार जीवनसंगिनी मुझे मिला है। बड़े बुजुर्गों और ईश्वर का ही आशीर्वाद का प्रतिफल है। मेरा सौभाग्य है कि वे सुलझी हुई और समझदाार महिला है। इनके सहयोग के बिना मैं कहीं टिक भी नहीं पाता। बस्तर की अपनी पोस्टिंग और धुर नक्सली इलाके में ड्यूटी के दौर में हमारा हेड क्वार्टर जगदलपुर था। जब बस्तर तबादला हुआ तब मेरी जुड़वा बेटी हो गई थी। जुड़वा बेटियों को संभालना और वह भी अकेली किसी चुनौती से कम नहीं है। इस जिम्मेदारी को भी उन्होंने बखूबी निभाया। नक्सल प्रभाव वाले क्षेत्र में कैंप बनाने का काम चल रहा था। नए कैंप बनाए जा रहे थे। दो से तीन महीने वहां से जगदलपुर आना नहीं होता था। चिंता भी सताते रहती थी दो जुड़वा बेटियों के साथ कैसे रह रही होगी। मोबाइल से ठीक से बात भी नहीं हो पाती थी। जंगल में टावर भी ठीक से नहीं मिलता था। हम लोग ऊंची लकड़ी में मोबाइल को सिग्नल वाले जगह देखकर लटका देते थे। घंटी आती थी तो बात कर लेते थे। वह भी कुछ मिनट ही हो पाता था। एक तो सिग्नल की समस्या और दूसरा नक्सल हमले का भय भी बना रहता था। लिहाजा सुरक्षा व्यवस्था को भी ध्यान में रखना पड़ता था।

तब दोगुने उत्साह से भर जाता था

बस्तर में ड्यूटी के दौरान जब कुछ मिनटों के लिए घर बात हो जाया करती थी तो पहले तो मन में यही डर बना रहता था कि शिकायत ना हो। डांट ना पड़े। नाराजगी ना झेलनी पड़ी। पर ऐसा कभी नहीं हुआ। जब भी बात हुई। बेटियों के कुशलक्षेम बताने के बाद मुझे ही अच्छे से रहने की समझाइश दिया करती थी। सतर्कता बरतने और समय पर भोजन व नाश्ता करना ना भूलने कहा करती थी। फोन लगते ही तबियत को और भोजन किया या नहीं पूछना,कभी नहीं भूली।

पत्नी और मां हो तो ऐसी

जगदलपुर में दोनों बेटियों के लालन पालन के साथ ही बीएड की पढ़ाई भी पूरी कर ली। इस बीच प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी करती रही। मां और पत्नी की जिम्मेदारी निभाते हुए अपने लिए समय निकालना कभी नहीं भूली। मेहनत,त्याग और तपस्या का ही प्रतिफल है कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में उनका चयन हो गया। वर्तमान में वे बिल्हा जनपद पंचायत में एडिशनल सीईओ के पद पर कार्यरत हैं।

बेटियां बनी इस काबिल की होता है गर्व

दोनों बेटियों को उन्होंने काबिल बना दिया है। दोनोंबेटी अंतर्राष्ट्रीय क्लासिकल कत्थक नृत्यांगा है। नेपाल,पुणे और कोलकाता में प्रदर्शन कर चुकी हैं। एक बेटी एयर पिस्टल तो दूसरी बेटी एयर राइफल में नेशनल निशानेबाज हैं। बेटियांं मां पर गईं है। मां को निशानेबाजी का शौक है। उन्होंने राज्य निशानेबाजी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल की है।

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