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द्रोपदी ने यदि मौन ले लिया होता तो महाभारत नहीं होता-आचार्य विशुद्ध सागर

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उक्त उदगार आचार्य विशुद्ध सागर जी महाराज ने सन्मति नगर रायपुर में प्रवचन सभा में व्यक्त किये

(अविनाश जैन विदिशा)

उन्होंने कहा कि हे माताओ यदि कोई अशुभ प्रसंग घर में हो जाऐ तो मौन ले लिया करो उन्होंने कहा कि यह भारत देश है जंहा पर रोटी वनाने से पहले माताऐं पहली रोटी गाय को और अंतिम रोटी श्वान को निकाला करती थी। उन्होंने कहा कि आजकल तो आपके घर में फ्रिज आ गया है सुनो उसमें जो रोटी रखी जाती है और यदि माताऐं आपसे कह दें कि जाओ फ़िज में रोटी रखी है खा लो
यह हमारे भारत की सभ्यता नही वासी रोटी खाने की सभ्यता तो विदेशी है।
भारतीय महिलाएं तो गरम गरम रोटियां खिलाती है। उन्होंने आज धर्म सभा को सम्वोधित करते हुये कहा कि अपनी कमाई हुई सम्पत्ति और रहस्य को सभी छुपा कर रखते है, अपने आपको स्वामी और प्रभु बनाकर दिखाना तथा स्वयं भु भगवान वन जाना जगत में कोई बड़ा काम नहीं लेकिन जगत में अपनी संपत्ति के सारे रहस्यों को प्रकट कर प्रभू वनाने का मार्ग भगवान ऋषभ देव से लेकर महावीर ने दिया है। आचार्य श्री ने कहा कि जो पीड़ा अस्त्र और शस्त्र से नहीं होती, वह पीड़ा व्यक्ति को मानसिक तनाव से होती है। यदि कोई बाहर से मारना चाहे तो सामने वाला बचता है, लेकिन जो अस्त्र-शस्त्र हमारे मन में है उससे बचने की क्षमता किसी के पास में नहीं है। इस हिंसा को बढ़ावा एकांत दे रहा है। इस हिंसा से बचना चाहते हो तो अनेकांत की दृष्टि खोल दो। जितने विश्व में बाहर से हिंसक हैं वे मन में हिंसा का भाव रखते हैं।


आचार्यश्री ने कहा कि भावों की पीड़ा,क्लेश की पीड़ा,संक्लेषता की प्रवृत्ति से अंतर्मन में जो झुलस रहे, चाहे विषमता के कारण,चाहे धन और धरती के कारण दुखी हो, अपमान से दुखी हो,लेकिन आप किसी को कह नहीं पा रहे,अंदर ही अंदर दुखी हो। यह कष्ट कौन दे रहा है,यहां कोई मारते दिखाई नहीं पड़ रहा,पर पिटाई से आप बच नहीं पा रहे हो। पीड़ा, कष्ट, वेदना,आपत्तियां और विपत्तियां सब पापकर्म के कारण है,इस प्रवृति को छोड़ दो। ऐसा निर्णय लो कि स्वयं से खड़े हो, स्वयं के शरीर में उठने की क्षमता नहीं तो सहारा भी काम नहीं आता है। सहारा वहीं काम में आता है जब सामर्थ्य आ जाता है। एक समय की पर्याय को समझिए। यदि एक समय की पर्याय चली गई तो कष्ट भी उसके साथ चले जाएगा। जिसके पास धन आएगा उसके पास से गरीबी दीपक के जलने पर अंधकार की भांति दूर हो जाएगी। धन बढ़ने पर दरिद्रता अपने आप चली जाती है और धन की हानि होने पर दरिद्रता अपने पैर पसार लेती है। इस अवसर पर मुनिश्री निर्मोह सागर ने कहा कि मनुष्य जन्म मिला है तो सार्थक बना लो। नियमों का पालन करों। देव,धर्म और गुरु की शरण में जाओ। क्या पता पशु बन जाते तो कैसी दशा रहती। जैसे घर में रहकर मंदिर जाने का केवल विचार करने मात्र से हजार उपवास का फल मिलता है। मंदिर जाने के लिए सड़क पर उतर जाने पर लाख उपवास का फल मिलता है। मंदिर में देव दर्शन कर लेने से करोड़ों-करोड़ों उपवास का फल मिलता है। यदि कोई आपको देखकर जाने लग जाए तो पुण्य प्रबल होता है। मंदिर भी जाओ तो कैंची मत बनो सुई धागा बनो। कोई दीप के जगह धूप चढ़ा दे तो रोको मत। किसी से कोई गलती हो जाए तो डांटना नहीं समझना। चाहे कुछ भी हो जाए हमेशा बनिए बिगडो मत।

–संकलन अविनाश जैन विदिशा राष्ट्रीय प्रवक्ता दयोदय महासंघ

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