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“खरी-खरी”-लाइलाज बीमारी बनता जा रहा रहा है,निकायों मे धनबल के बूते आसानी से कुर्सी हथियाने का चलन

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संजय बेचैन

तमाम स्वार्थो के चलते लोग साम-दाम-दंड भेद के बूते राजनीति में आना चाहते हैं। जन सेवा की भावना अब गौण हो चली है। सियासत में बढ़ती तिजारत की प्रवृत्ति से यहां पैसे का खेल एक लाइलाज बीमारी बनता जा रहा है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय संस्था ग्लोबल इंटीग्रिटी द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि राजनीति में धनबल को रोकने में हम फिसड्डी साबित हुए हैं। जनता की भलाई के लिए बनाई जाने वाली नगरपालिका,और जनपद व जिला पंचायत आधुनिक लोकतंत्र में विकास योजनाओं का क्रियान्वयन कराने व नीतियों के बनाने वाले होते हैं । जनता द्वारा चयन किए जाने के बाद पार्षद ,जिला पंचायत सदस्य व जनपद सदस्य लोग अपने वोट से  नगर पालिका ,जिला और जनपद अध्यक्ष को चुनते हैं। शुरुआती दौर में समाज सेवी रही निकायों की राजनीति कालांतर में एक पेशे का रूप अखतयार करती जा रही है। इसका ताजा उदाहरण हाल ही हुऐ ये चुनाव हैं। निकाय अध्यक्षों के चुनाव के दौरान समाजसेवा की भावना रखने वाले, धनबल के आगे हथियार उठाने का दम ही नहीं भर पाये, उनकी जगह तिकड़मबाज और व्यापारी किस्म के लोगों ने इस्तिहार देकर अपने नाम चलवा दिये और लाखों देकर खरीद फरोखत शुरू कर दी । अध्यक्ष की कुर्सी पाने खुलेआम धनबल का इस्तेमाल देखा जा रहा है । चुनाव आयोग ने स त कदम उठाते हुए भले ही कोरे गाल पीटे हों , लेकिन इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता है कि धन के बगैर इस राजनीति में सफलता अपवाद ही है। राजनीति में बढ़ते धनबल की प्रवृत्ति आज हम सबके लिए बड़ा मुद्दा है।

पूर्व मंत्री व कॉंग्रेस के कद्दावर नेता केपी सिंह ने एक पत्रकार स मेलन आयोजित कर इस दुरावस्था पर जमकर प्रहार किया व इस पूरे खेल को आने वाले समय में खतरनाक चलन बताया उन्होने बेवाक अंदाज़ मे कहा कि मेरे पास एक पार्षद आया और उसने अपने बीच के वोट की जो कीमत जब बताई तो मैं सोच में पड़ गया, क्योंकि जितनी रेट उसने बताई, वो कल्पना से परे थी। ऐसे में जबकि पूरा चुनाव ही धनबल पर टिक कर रह गया है और लोग इतनी बड़ी रकम खर्च करके अध्यक्ष बनने की तैयारी कर रहे हैं तो फिर उनसे विकास की उ मीद करना ही बेमानी होगा।

केपी सिंह ने बिना लाग लपेट के कहा कि अध्यक्ष का चुनाव यदि सीधे जनता से होता, तो उसमें न केवल जनमत सामने आता, बल्कि पार्षदों की खरीद-फरो त न होने से बिना अधिक खर्चे के चुनाव जीतने वाले जनप्रतिनिधि अपने क्षेत्र में विकास करते। उन्होंने कहा कि पार्षद के लिए एक वार्ड के सीमित लोग वोटिंग करते हैं तथा उसमें यह सोच भी होती है कि शासन व प्रशासन जिसका है, उसे ही वोट दिया जाए। लेकिन जब विधानसभा चुनाव होंगे, तब जनता खुलकर अपना फैसला देगी।

केपी सिंह ने यह भी कहा कि जिस तरह से चुनाव हो रहे हैं और उसमें कुर्सी पाने के लिए लोग लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं, तो ऐसे हालातों के बीच सामान्य व्यक्ति तो चुनाव लडऩे के बारे में सोच भी नहीं सकता। फिर जो व्यक्ति इतनी बड़ी राशि खर्च करके कुर्सी पर बैठेगा तो उसकी प्राथमिकता विकास कार्यों की होगी या फिर अपनी खर्च की गई राशि की रिकवरी करने की। इसलिए देश में हालात बहुत अधिक बिगड़ चुके हैं और महात्मा गांधी व राजीव गांधी ने पंचायती राज का ऐसा सपना नहीं देखा था।

अब यह रहस्य किसी से छुपा नहीं है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली में धनबल की बड़ी भूमिका है

चुनाव में खर्चे की तय सीमा को बढ़ाए जाने की इस मांग के बीच 99.5 प्रतिशत प्रत्याशियों ने घोषणा करते हुए कहा कि वह तय सीमा का आधा ही खर्च कर सके। इस आश्चर्यजनक तथ्य से ही सहज ही विरोधाभास का अंदाजा लगाया जा सकता है। राजनीतिक प्रक्रिया में धनबल का यह एक पहलू है। एक बार जब एक प्रत्याशी बड़ी मात्रा में अघोषित पैसा चुनाव में लगाता है तो वह जीतने के लिए इसको निवेश की तरह इस्तेमाल करता है। इसी का नतीजा होता है कि चुनाव जीतने के बाद सार्वजनिक धन का बड़े पैमाने पर गबन किया जाता है। ऐसे मामले कभी-कभी कुछ महीनों में सामने आते हैं, तो कुछ वर्षो बाद उजागर होते हैं।

दरअसल यह प्रक्रिया चुनाव शुरू होने से पहले ही शुरू हो जाती है। राजनीतिक दलों द्वारा टिकटों के बंटवारे की प्रक्रिया से ही यह शुरू होती है। हर राजनीतिक दल द्वारा टिकटों का बंटवारा एक केंद्रीकृत बॉडी द्वारा किया जाता है जिसको हाई कमान कहा जाता है। यह बॉडी पार्टी के सदस्यों से लेकर निर्वाचक तक किसी के प्रति जवाबदेह नहीं होती है। भारतीय राजनीति की यह सबसे बुनियादी समस्या है।

यह एक विचित्र स्थिति है कि हम लोग अपने को लोकतांत्रिक देश कहते हैं जोकि ऐसे राजनीतिक दलों द्वारा चलाया जा रहा है जिनकी आंतरिक कार्यप्रणाली आनुवांशिक और पूर्ण रूप से अलोकतांत्रिक ढंग से काम कर रही है। राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में लोकतंत्र में कमी और एकाधिकारवादी प्रवृत्ति के कारण ही राजनीतिक प्रक्रिया में धनबल का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

राजनीतिक दलों की आंतरिक कार्यप्रणाली में लोकतंत्र और वित्तीय मामलों में पारदर्शिता होनी चाहिए। वित्तीय मामलों की अनिवार्य रूप से ऑडिट नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक [कैग] द्वारा की जानी चाहिए। यही एकमात्र रास्ता है जिससे देश की राजनीतिक प्रणाली में धनबल के बढ़ते प्रभाव पर अंकुश लगाया जा सकेगा।

ज्यादा धन, चुनाव जीतने की अधिक संभावना

आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जिस उ मीदवार के पास ज्यादा संपत्ति होती है उसके चुनाव जीतने की अधिक संभावना होती है। इस बार अधिक संपत्ति घोषित करने वाले एक तिहाई उ मीदवारों को विजय मिली है। दूसरी तरफ कम संपत्ति घोषित करने वालों में से एक फीसदी से भी कम उ मीदवारों को ही सफलता मिली है। इस तरह ऐसा लगता है कि धनबल चुनावी नतीजों को अत्यधिक प्रभावित करता है।

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