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बुद्धि को विराम देकर समर्पण की ओर-मुनि श्री निरीह सागर महाराज

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सागर । भाग्योदय तीर्थ सागर में विराजमान मुनि श्री निरीह सागर महाराज ने कहा कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की बुद्धि और दृष्टि के सामने हमारी बुद्धि कैसी थी—यह विचार करने का विषय है।दान की चर्चा हम बचपन से सुनते आए हैं। लेकिन दान केवल धन का विषय नहीं है। दान उसी का लग पाता है, जिसका पुण्य तीव्र होता है और जिसके भीतर समर्पण की भावना होती है।

दक्षिण भारत के जैन तीर्थों की यात्रा में श्रवणबेलगोला में एक प्रसंग हुआ। हम 36 ब्रह्मचारी वहाँ पहुँचे। वहाँ अन्य संघ की आर्यिका माताएँ तत्वचर्चा कर रही थीं। जब वे विदा हुईं तो उन्होंने हमें नमोस्तु किया और अचानक पूछा आचार्य श्री का स्वास्थ्य कैसा है?”

हमने तो उत्तर दे दिया कि स्वास्थ्य ठीक है, लेकिन हमारे मन में प्रश्न उठा कि इन्हें कैसे पता कि हम आचार्य श्री के संघ के हैं। उनका उत्तर बहुत अद्भुत था।

“इतने युवा हीरे उन्हीं के संघ में हो सकते हैं।” तब लगा कि आचार्य श्री का व्यक्तित्व और प्रभाव केवल एक स्थान तक सीमित नहीं था। उनकी पहचान दूर-दूर तक थी। वहीं से मन में विचार आया कि हम अपनी बुद्धि को कितना विराम दे पाते हैं?

हम लगातार सोचते हैं, प्रश्न करते हैं, तुलना करते हैं—किसे दीक्षा मिली, किसे नहीं मिली, किसे पहले मिली, किसे बाद में मिली। लेकिन इन बातों का वास्तविक कारण क्या है, यह तो केवल केवलज्ञानी ही जान सकते हैं। हमें अपनी ओर से निष्कर्ष निकालने के बजाय सकारात्मक भाव रखना चाहिए कि कहीं न कहीं पूर्व का पुण्य, वर्तमान का पुरुषार्थ और आचार्य की दृष्टि—इन सबका अपना महत्व है।

आचार्य श्री के सान्निध्य में सात वर्ष ब्रह्मचारी अवस्था में रहने के बाद भी हमने कभी सीधे दीक्षा की मांग नहीं की। जब आजीवन व्रत का निवेदन किया, तब मन में यही भाव था कि जब तक दीक्षा नहीं होती, तब तक नियम और उपवास करते रहेंगे। समय आया और दीक्षा भी हो गई। इससे एक बात स्पष्ट होती है, समर्पण में अपनी बुद्धि को आगे रखने की आवश्यकता नहीं होती। गुरु का निर्देशन जिस दिशा में मिले, उसी में श्रद्धा से चलना ही सच्चा समर्पण है।

आज सर्वतोभद्र जिनालय के निर्माण में भी यही भावना आवश्यक है। यदि हमने अनुमान लगाया है कि इसे बनने में चार-पाँच वर्ष लगेंगे, तो संभव है कि सच्चे समर्पण, सामूहिक पुरुषार्थ और गुरु-प्रेरणा से यह उससे पहले ही पूर्ण हो जाए।

इसलिए अपनी बुद्धि को विराम दें, संदेह और तुलना को विराम दें और गुरु के निर्देशन में अपनी शक्ति, समय और साधनों का समर्पण करें।

जहाँ बुद्धि रुकती है, वहाँ श्रद्धा आगे बढ़ती है; और जहाँ श्रद्धा के साथ समर्पण जुड़ जाता है, वहाँ असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

सिद्धचक्र विधान में 512 अर्घ चढ़े

गौराबाई जैन मंदिर कटरा में आचार्य विभव सागर महाराज के ससंघ सानिध्य में चल रहे सिद्धचक्र महामंडल विधान के पांचवें दिन 512 अर्घ चढ़ाए गए विधान का निर्देशन अंकित भैया भिलाई कर रहे हैं। विधान का आयोजन राजेश जैन सरस, श्रीमती शशि जैन पायल कैटर्स परिवार के पुण्यार्जन से हो रहा है। विधान में प्रतिदिन सैकड़ो लोग पहुंचकर के धर्म लाभ ले रहे हैं। विधान का समापन हवन के साथ 7 सितंबर को होगा

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