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सेमरी बांध नहर में अधिग्रहित भूमि में किसानों की बड़ी जीत

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शरद शर्मा बेगमगंज रायसेन

एक दशक पूर्व सेमरी जलाशय परियोजना निर्माण के दौरान नहरों के लिए तहसील के अनेक किसानों की आननफानन में जलसंसाधन विभाग द्वारा सेमरी परियोजना के अंतर्गत भूमि अधिग्रहित की गई थी। जिसके मुआवजा के लिए किसानों को भटकने के बाद भी कुछ भी हाथ नहीं लगा था। तब इसके खिलाफ प्रभावित किसानों ने मप्र उच्च न्यायालय जबलपुर में रोहताश बाबू एडवोकेट के माध्यम से रिट पिटीशन दायर करके अपने लिए मदद की गुहार लगाई थी। जिसमें किसानों की जीत हुई और उन्हें अपनी भूमि अधिग्रहण में नवीन अवॉर्ड के साथ 2013 से मुआवजा दिए जाने के आदेश जस्टिस मनिंदर एस. भट्टी द्वारा सरकार को आदेश दिया है।

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर ने सेमरी मध्यम परियोजना अंतर्गत नहर निर्माण में भूमि अधिग्रहण मुआवजा से जुड़े एक अहम विवाद में महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए याचिकाकर्ताओं को राहत प्रदान की है।

रिट याचिका में ग्राम खेजड़ा के कृषक अभिनव मुंशी , प्रशांत तांतेड़ , ग्राम सुमेर के जगत सिंह , अशोक साहू , शिखर चंद जैन , धर्मेंद्र जैन , संदीप कंडया , ग्राम गडोईपुर के अशोक जाट , ग्राम शाहपुर हदाईपुर के नरेन्द्र भार्गव, मयंक सिंघई , विश्वजीत दुबे , रमेश सोनी , कुसुम सोनी , ग्राम फतेहपुर की कैलाश बाबू पटेल , ग्राम रहटवास के सचिन नेमा, अमोल सिंह ,हल्के भाई दुबे, जितेंद्र सक्सेना, इंद्राज ठाकुर एवं अन्य कुल 53 कृषकों ने राज्य सरकार द्वारा पारित अवार्ड को वर्ष 2014 में रिट याचिका के माध्यम से चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता रोहताश बाबू पटेल ने तथ्यात्मक तर्क रखते हुए कहा कि संबंधित अवार्ड Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 के लागू होने के बाद पारित हुआ है। इसलिए मुआवजे का निर्धारण उसी नए कानून के तहत किया जाना चाहिए।

याचिकाकर्ता पक्ष ने अदालत को बताया कि मात्र ड्राफ्ट अवार्ड 30 दिसंबर 2013 को तैयार किया गया था, लेकिन उसे प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक स्वीकृति 19 फरवरी 2014 को दी गई और अंतिम अवार्ड 13 मार्च 2014 को पारित हुआ।

उनका प्रमुख तर्क यह था कि जब तक सक्षम प्राधिकारी से स्वीकृति नहीं मिलती, तब तक ड्राफ्ट अवार्ड विधिक रूप से प्रभावी नहीं माना जा सकता। इसलिए 1 जनवरी 2014 को नया कानून लागू होने के समय कोई वैध अंतिम अवार्ड अस्तित्व में नहीं था।

वहीं राज्य शासन की ओर से यह दलील दी गई कि अवार्ड की प्रक्रिया 30 दिसंबर 2013 से शुरू हो चुकी थी, इसलिए नए कानून के प्रावधान इस पर लागू नहीं होंगे।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माननीय न्यायमूर्ति मनिन्दर एस. भट्टी ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि केवल ड्राफ्ट अवार्ड को अंतिम अवार्ड नहीं माना जा सकता।

न्यायालय ने यह पाया कि 1 जनवरी 2014 को जब नया कानून लागू हुआ, उस समय तक अवार्ड को अंतिम स्वीकृति प्राप्त नहीं हुई थी। इसलिए ऐसे प्रकरणों में मुआवजे का निर्धारण 2013 के अधिनियम के अनुसार ही किया जाना आवश्यक है।

अदालत ने अपने आदेश में पुराने अवार्ड (30-12-2013) तथा उससे संबंधित स्वीकृति आदेश (19-02-2014) को निरस्त करते हुए मामले को पुनः भूमि अधिग्रहण अधिकारी के पास भेजने के साथ ही निर्देश दिया गया कि 90 दिनों के भीतर नया अवार्ड पारित किया जाए और मुआवजा 2013 के कानून के अनुसार तय किया जाए।

यह फैसला भूमि अधिग्रहण मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है ।जिसमें उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि अंतिम अवार्ड की वास्तविक तिथि ही यह तय करेगी कि किस कानून के तहत मुआवजा दिया जाएगा।प्रभावित किसान निर्णायक जीत से उत्साहित है। जिनमें अपनी बेशकीमती भूमि का उचित मुआवजा मिलने की आशा जागी है।

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