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भाषा की मर्यादा का हो रहा चीरहरण- संजय मेहता

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सी एल गौर 

भोपाल। वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता के समक्ष कोई बड़ी चुनौती है तो वह भाषा की परम्परागत पत्रकारिता की बात करें अथवा वर्तमान में डिजीटल मीडिया की, दोनों ही जगहों पर भाषा के सारे तटबंध तोड़े जा रहे हैं भाषा की मर्यादा का चीरहरण हो रहा है। यह बात वरिष्ठ रंग निर्देशक संजय मेहता ने हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर आयोजित विमर्श में कही।

श्री मेहता ने पत्रकारिता के साथ रंगमंच एवं सिनेमा को जोड़ते हुए कहा कि हम सबकी जवाबदारी समाज है और सामाजिक सरोकार ही हमें जिंदा रखेगा। पत्रकारिता की तरह रंगमंच की बड़ी जिम्मेदारी है।इस विमर्श को आगे बढ़ाते हुए सुप्रीमट कोर्ट की एडव्होकेट एवं जिला भाजपा उपाध्यक्ष सुश्री गुंजन चौकसे का कहना था कि ‘सामाजिक सरोकार से ही पत्रकारिता होती है। एक मायने में पत्रकारिता केवल छपे शब्द नहीं बल्कि अवाम की आवाज है।’ उन्होंने अदालत, मीडिया और राजनीति के संदर्भ में अनेक उदाहरण के साथ अपनी बात रखी। इस अवसर पर प्रो. मनोज कुमार ने कहा कि- समय कितना ही बदल जाए, पत्रकारिता का मूल स्वरूप हमेशा कायम रहेगा।

उन्होंने कहा कि स्वाधीनता संग्राम से भारत के नवनिर्माण में पत्रकारिता का अहम योगदान रहा है। मिशन से व्यवसाय में पत्रकारिता का परिर्वतन आपातकाल के बाद हुआ। दुर्भाग्य से पत्रकारिता को उद्योग का दर्जा देने की साजिशन माँग की जाने लगी। अंतरराष्ट्रीय मानक की अनुसंधान की पत्रिका ‘समागम’ के हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पर केन्द्रित विशेष अंक का विमोचन किया गया। ‘समागम’ के इस विशेष अंक में विविध विषयों का संयोजन किया गया है। लेखक कुंवर इंद्रजीत की सद्य प्रकाशित नवीन पुस्तक ‘जीवन यात्रा के सुमन’ का भी लोकार्पण किया गया। लेखक इंद्रजीत सिंह ने अपने जीवन अनुभव भी साझा किए।

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