आलेख
मनोज द्विवेदी
40 दिन युद्ध के बाद अमेरिका-ईरान में हुआ सीजफायर का ऐलान के कुछ ही घंटों बाद टूटता हुआ दिख रहा है। अमेरिका के सशर्त सीजफायर की घोषणा के कुछ घंटो बाद ईरान के लावन आइलैंड (Lavan Island) में पहला बड़ा हमला हुआ है।
यह हमला लावन आईलैंड पर एक ऑयल रिफाइनरी (Oil Refinery) में किया गया है।लावन आइलैंड में स्थित एक तेल रिफाइनरी में जबरदस्त ब्लास्ट के बाद धुआं निकलता हुआ दिखा।
दूसरी ओर UAE-कुवैत पर भी मिसाइल-ड्रोन अटैक किया गया है।संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का कहना है कि ईरान की ओर से अभी भी मिसाइलें दागी जा रही हैं।यूएई ने कहा कि वह ईरान की ओर से आने वाली मिसाइलों की बौछार को रोकने के लिए जवाबी कार्रवाई कर रहा है।
अब सवाल यही है कि बडबोले ट्रंप पर क्या दुनिया भरोसा करने को तैयार नहीं है ? क्या ट्रंप के झूठेपन और अविश्वसनीयता के कारण विश्व का कोई देश ,यहाँ तक कि नाटो भी उसके साथ नहीं खडा हुआ।
किसी जिम्मेदार देश ने मध्यस्थता की कोई कोशिश नहीं की।
यही कारण है कि कटोराछाप पाकिस्तान और धुर विरोधी चीन को अमेरिका मध्यस्थता का श्रेय देता दिख रहा है।
अमेरिका ने ईरान को वेनेजुएला समझने की गलती की। जबकि ईरान का इतिहास है कि वह ना कभी युद्ध हारा है और ना दुनिया भर के प्रतिबंधों से कभी झुका है।
निश्चित रुप से अमेरिका- इजराइल के विध्वंसक प्रहारों से ईरान मे भारी विनाश हुआ है। कहा जा रहा है कि ईरान 30-35 साल पीछे चला गया और उसके लगभग 15000 लोग मारे गये।
लेकिन नुकसान अमेरिका को भी बहुत हुआ है।
सबसे पहला तो यह कि उसके अजेय होने का भ्रम टूट गया।
नाटो जैसा संगठन ट्रंप के आचरण के कारण खण्डित हो गया।
ट्रंप ने अपने अहंकार, बडबोलेपन ,असत्य आचरण और लोभी प्रवृत्ति के कारण अमेरिका की साख को बडा बट्टा लगा है।
ट्रंप के आचरण मे भाषाई शालीनता तक नहीं है।
चालीस दिन मे उसके तमाम फाईटर प्लेन, एयर डिफेंस और एयर क्राफ्ट कैरियर को नुकसान हुआ है। सैनिक मारे गये और सैकडों घायल हुए।
यह अमेरिका – इजरायल का पहला युद्ध था ,जब नाटो उसके साथ नहीं खडा हुआ। अमेरिका के लिये लंबे युद्ध मे फंसने की आशंका थी। जबकि उसके लिये चीन ,रुस, उत्तर कोरिया बडे खतरे के रुप मे सामने खडे हैं।
अमेरिका की एक भी शर्त, एक भी बात ईरान ने नहीं मानी। तो यही कारण है कि अब लोगो को लग रहा है कि या तो ट्रंप युद्ध से भाग खडे हुए या दो – चार – आठ – दस दिन मे खाडी मे विध्वंसक युद्ध फिर भडकेगा। दुनिया विश्व युद्ध के खतरे से बिल्कुल सुरक्षित नहीं है।
लेखक मनोज द्विवेदी अनूपपु्र, मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हे।