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“जड़ों से कटकर विकास संभव नहीं, भारतीय ज्ञान-विज्ञान का मूल संस्कृत में निहित” – श्री दत्तात्रेय वज्राहल्ली

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सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में ‘भारतीय ज्ञान परम्परा और शिक्षा में संस्कृत का महत्व’ विषय पर विशेष व्याख्यान

सांची रायसेन ।सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय के ‘भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ’ द्वारा “भारतीय ज्ञान परम्परा और शिक्षा में संस्कृत का महत्व” विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता संस्कृत भारती के सह-संगठन मंत्री (हैदराबाद) श्री दत्तात्रेय वज्राहल्ली जी रहे, जिन्होंने भारतीय विज्ञान, वास्तुकला और शिक्षा प्रणाली में संस्कृत की व्यावहारिक उपयोगिता पर विस्तृत प्रकाश डाला।

जड़ों से जुड़कर ही संभव है विकास
अपने मुख्य उद्बोधन में श्री दत्तात्रेय वज्राहल्ली जी ने कहा कि किसी भी समाज का विकास उसकी मजबूत जड़ों पर ही निर्भर करता है। यदि हम अपने मूल से कट गए, तो सूख जाएंगे। उन्होंने बताया कि भारत पर हुए 200 सालों के आक्रमणों और भारी पतन के बावजूद भारतीय संस्कृति जीवित रही। आज भी हमारे पास 40 लाख से अधिक पांडुलिपियां (Manuscripts) उपलब्ध हैं। तंजावुर देवालय का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां शारदा लिपि में वास्तुशास्त्र सहित अन्य विषयों की लगभग 2 लाख पांडुलिपियां आज भी मौजूद हैं।

भूगर्भ विज्ञान से लेकर खगोल तक का ज्ञान है संस्कृत
मुख्य वक्ता ने स्पष्ट किया कि संस्कृत केवल कर्मकांड की भाषा नहीं है। भूगर्भ विज्ञान (Geology) से लेकर खगोल (Astronomy), पाक शास्त्र (Culinary Arts) से लेकर रसायन विज्ञान (Chemistry) और वास्तु से लेकर आयुर्वेद तक का विस्तृत वैज्ञानिक ज्ञान संस्कृत में समाहित है। प्राचीन भारतीय वास्तुकला और लौह शास्त्र (Metallurgy) की उत्कृष्टता का उदाहरण देते हुए उन्होंने मदुरै मीनाक्षी मंदिर और तलकाडु के छाया सोमेश्वर (त्रिकुटेश्वर) मंदिर का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि छाया सोमेश्वर मंदिर में शिवजी के ऊपर हमेशा एक स्थिर छाया रहती है, जिसका वैज्ञानिक वर्णन 250 साल पहले ही ‘बोधायन शिल्प सूत्र’ में कर दिया गया था। इसके साथ ही उन्होंने प्रसिद्ध विचारक धर्मपाल की पुस्तक ‘द ब्यूटीफुल ट्री’ और हम्पी की सदियों पुरानी, लेकिन अत्यधिक उन्नत जल प्रबंधन प्रणाली का भी संदर्भ दिया।

व्यवहार और संवाद में आए संस्कृत
श्री वज्राहल्ली ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि वर्तमान में लोग संस्कृत में पीएचडी (PhD) तो कर रहे हैं, लेकिन उनके शोध कार्य संस्कृत में नहीं लिखे जा रहे हैं। संस्कृत के ज्ञाता शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी इस भाषा को अपने दैनिक व्यवहार और संवाद में नहीं ला पा रहे हैं, जिसे बदलने की महती आवश्यकता है।

भारतीय विज्ञान परम्परा का उद्धार प्रस्तुत करते हुए उन्होंने हृदय के स्वास्थ्य के लिए आंवले, दूब और अनार के रस के उपयोग जैसी व्यावहारिक आयुर्वेदिक दिनचर्या साझा की।

इस अवसर पर साँची विवि के अधिष्ठाता प्रो नवीन कुमार मेहता ने ‘स्वबोध, कुटुंब और पंच अनुभव जनित ज्ञान’ विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हमारी संस्कारी भाषा पर लगातार हमले हुए, जिसके कारण हमने संस्कृत को छोड़ दिया। आज समय की मांग है कि हम अपनी वैज्ञानिक धरोहर को जागरूकता (Awareness) के साथ स्वीकार करें।

कार्यक्रम में संस्कृत भारती के महाकौशल-मध्यभारत प्रांत के संगठन मंत्री श्री जागेश्वर पटले सहित विश्वविद्यालय के प्राध्यापक, शोधार्थी और विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। संचालन सहायक ग्रंथपाल डॉ अमित ताम्रकार ने किया।कार्यक्रम का समापन ‘जयतु भारत – जयतु संस्कृत’ के ओजस्वी उद्घोष के साथ हुआ।

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