बा-मुलाहिजा- संदीप भम्मरकर
मुख्य सचिव की बैठक चल रही थी। वक़्त बीत रहा था। दो घंटे बीत गए। मंत्रालय के अफ़सर पूरे वक़्त इस बैठक में मौजूद रहे। यह बात बीते रोज़ की है, जब कलेक्टर-कमिशनर कॉन्फ़्रेन्स ख़त्म हो चुकी थी। बैठक से निकलने के बाद कई विभागों के अफसर बाहर निकलकर झल्ला उठे…. ये कहते हुए कि सीएस की बैठक में ‘दो घंटे बर्बाद हो गए।‘अब सीएस को कौन समझाए वक्त की अहमियत, जो मंत्रालय में अफसरों के कक्ष के अंदर और बंगले पर सीक्रेट मीटिंग्स में ज्यादा उपयोगी है।

कोहली के साए में करोड़पति नेता!
इंदौर टेस्ट से पहले उज्जैन में महाकाल दर्शन के दौरान एक चेहरा अचानक सुर्खियों में आ गया। विराट कोहली के साथ कदम से कदम मिलाते दिखे विंध्य के एक बीजेपी नेता। मंदिर के नंदी हॉल में में तो हाल यह रहा कि कोहली के बगल वाली जगह भी इन्हीं नेताजी के हिस्से आ गई, टीम इंडिया के स्टार कुलदीप यादव पीछे रह गए। बस फिर क्या था, फुटेज भरपूर मिली। अब बीजेपी के अंदरखाने में सवाल गूंज रहा है कि यह नेता आखिर कोहली तक कैसे पहुंचा? करोड़पति हैं, और दिल्ली तक सीधी पैठ रखते हैं। यही चर्चा का असली मसाला है।

राहुल का रोडमैप, मालवा पर रेड अलर्ट
इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी से मौत का मामला राहुल गांधी के दौरे के साथ फिर सियासी आग बन गया। पीड़ितों से मुलाकात, एक लाख का चेक और बीजेपी के अर्बन मॉडल पर सीधा वार करके साफ मैसेज दिया गया है। असली बात दौरे के बाद अंदरखाने में कही गई। राहुल ने नेताओं से कहा—भोपाल और इंदौर को टारगेट करो, यहां मुद्दा हिंदुओं की मौत और भावनाओं का है। यानी कांग्रेस को भावनात्मक फ्रंट पर उतरने का फ्यूचर प्लान दे दिया गया है।
गौ-घाव और भगवा फुसफुसाहट
इसे संयोग कहें या सियासी संकेत कि संघ के बस्ती क्षेत्रों में चल रहे हिन्दू महासम्मेलनों के बीच भोपाल स्लॉटर हाउस का गौ-हत्या कांड सामने आ गया। नतीजा यह कि मंच से लेकर भोजन पंक्तियों तक कानाफूसी तेज है। कहीं खुले तौर पर सजा की मांग उठ रही है, तो कहीं दबे स्वर में यह सवाल भी कि ‘अपना’ निकला तो क्या होगा? खास बात यह कि ये सम्मेलन आरएसएस की पहल पर हो रहे हैं और फीडबैक सीधे ऊपर जा रहा है। अब निगाहें इसी पर हैं कि संघ इस फुसफुसाहट को कैसे सुनेगा और क्या फैसला करेगा।

सरकारी बंगले की कहानी
किसी भी नेता के रसूख का अंदाजा उसका सरकारी बंगला करवाता है। रसूख के दौर में जहां रौनक अफरोज़ होती थी, अब बदली हुई सियासी फिज़ां में उन्हीं बंगलों में सनाका खिंचा हुआ है। वजह साफ है, नेताजी का ओहदा चला गया। सरकार ने ऐसे बंगलों को खाली करने का नोटिस जारी कर दिया है। शुरुआती ना-नुकुर के बाद अब कई लोगों ने बंगले खाली करने शुरू कर दिए हैं। दिलचस्प पहलू यह है कि बंगला खाली होने की भनक भी नहीं लगने दी जा रही। बंगले का सामान छोटे लोडिंग ऑटो में धीरे-धीरे खाली किया जा रहा है। इसकी वजह है, रसूख मिटने का गम, मलाल और शर्म। बहरहाल, गोपाल भार्गव ने बंगले को रैन बसेरे का रूप दे दिया है, जहां सागर से आने वाले जरूरतमंद ठहरेंगे। इसका फीता सीएम मोहन यादव ने खुद काटा। सियासी गलियारों में इस रैन बसेरे के अपने मायने निकाले जा रहे हैं।
पांच करोड़ गए, कुर्सी नहीं आई
पानी वाले डिपार्टमेंट की सबसे अहम कुर्सी के लिए पूरे पांच करोड़ दिए गए थे। सौदा पक्का समझा गया, देने वाले ग्वालियर के बड़े इंजीनियर थे। मगर वक्त बीतता गया, नदियों में पानी बहा और उम्मीद डूब गई। कुर्सी मिली नहीं, अब रकम वसूली की जद्दोजहद चल रही है। इंजीनियर साहब बार-बार भोपाल के चक्कर काट रहे हैं। लेकिन उल्टा उन्हीं से सवाल पूछे जा रहे हैं कि इतनी रकम आई कहां से? जवाब मुश्किल है। फिलहाल पांच करोड़ की तलाश, सिस्टम में भटक रही है।
बीजेपी में नए समूह का जन्म
वैसे, निजाम के बदलते ही नए-नए समूह प्रभाव जमाने की कोशिश में जुट जाते हैं। लेकिन मौजूदा समूह का मामला जरा अलग है। यह एक खास समुदाय से जुड़ा हुआ है, जिसके लिए बाकायदा सोशल मीडिया पर ग्रुप बनाया गया है। यह ग्रुप विशेष समुदाय के पत्रकारों को एकत्रित करता है। चुनिंदा ही इसमें शामिल हैं। बता दें कि न ये ब्राह्मणों का ग्रुप है, न राजपूतों का। न एससी-एसटी का न किरार या यादवों का। यह एक प्रभावशाली समुदाय है, जिन्हें मौजूदा दौर में इकट्ठा करके अहमियत दिलाने की कोशिश की है। यह प्रयास कितना कारगर है, इससे ज्यादा चर्चाएं पार्टी के गलियारों में इसके ‘इस दौर में‘ औचित्य को लेकर हो रही है।

– लेखक मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हे।