शरद शर्मा बेगमगंज रायसेन
जहां इतिहास,आस्था ओर प्रकृति एक साथ सांस ले रहे है , ओर लोगों की आस्था का केंद्र बिंदु बना द्विशतायु बूढ़ा बरगद
की आज जश्न मनाते क्षेत्रीय लोगों ने विधिविधान से पूजा अर्चना के साथ द्विशतायु होने पर मंगल कामना की।
बेगमगंज वन परिक्षेत्र के वन ग्राम जमुनिया गोंडाखोह में 200 वर्ष पुराना बूढ़ा बरगद का पेड़, आज भी अपने भीतर सदियों की कहानियां समेटे हुए है।
यह पेड़ सिर्फ एक पेड़ नहीं,बल्कि पूरे गांव की आस्था का प्रतीक ओर सनातनी परंपरा का केंद्र बन गया है।

इस ऐतिहासिक बरगद के पेड़ का संरक्षण करने का बीड़ा वनमण्डलाधिकारी रायसेन श्रीमती प्रतिभा शुक्ला के मार्गदर्शन में वन परिक्षेत्राधिकारी अरविंद अहिरवार ने इस ऐतिहासिक प्राकृतिक प्रतीक को बचाने का बीड़ा उठाया है।
बूढ़े बरगद के आसपास कुछ लोगों ने अवैध कब्जा करके आसपास की वनभूमि को खत्म करके मजे से खेती योग्य बना ली।
रेंजर अरविंद अहिरवार की सख्ती से अतिक्रमित भूमि से मुक्त किया जा जाकर उसके चारों ओर ग्रामीणों के बैठने के लिए चबूतरे के निर्माण की कार्य योजना बनाई गई है।
चबूतरे पर गांव के बुजुर्गों ओर बच्चों के ठहराव के लिए शांत स्थान मिल सके।
वन समिति अध्यक्ष पुरुषोत्तम सिंह लोधी ने बताया कि बूढ़े बरगद के पेड़ नीचे अब तक जोड़ी की 25 शादियां हो चुकी हैं ।
प्रकृति से प्रेम,एकता और दंपत बंधन का साक्षी बरगद अपने अंदर कई कहानियां समेटे हुए है।
जमुनिया गोंडाखोह के बुजुर्गों ने बताया , पुराने समय में जब गांव की पंचायतें चौपाल में लगती थी,तो कई विवादों के फैसले बरगद बाबा की छांव में किए जाते थे। और इतना ही नहीं इस पेड़ के पास एक प्राकृतिक जल स्रोत (कुंआ) है,जो सालभर गांव की प्यास बुझाता है। जल संरक्षण का एक जीवंत और अद्भुत मिसाल आज भी जारी है।
रेंजर अरविंद अहिरवार ने बताया , इस पेड़ के संरक्षण के लिए आज की युवा पीढ़ी को प्रकृति ,परंपरा ओर सेवा से जोड़ना है। ताकि उन्हें भी प्राकृतिक आक्सीजन के एक अच्छे स्रोत्र को संरक्षित करने की प्रेणना मिले।
उन्होंने कहाकि बेगमगंज वन परिक्षेत्र इसका जीवंत ओर प्रेरक उदाहरण बन रहा है।
अपनी दूरदर्शी सोच से परिक्षेत्र के अंतर्गत ऐतिहासिक , एवं प्राकृतिक महत्व के स्थानों को चिन्हित करके इको पर्यटन के तौर पर पहचान दिलाई जा रही है। जिसका उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा के साथ जीवन को प्रकृति से जोड़कर बचाना है।