– छोटे से पैकेट मे छिपा है बड़ा धमाका
आलेख
मनोज कुमार द्विवेदी,अनूपपुर
मध्यप्रदेश के एक जनजातीय जिले की दो घटनाओं से मैं अपनी बात शुरु करुंगा। दोनो का सीधा संबंध जाति भेद के द्वंद मे पिसती आम से है।
सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता करने के दौरान मेरा ध्यान इस ओर गया कि जिस जिले मे सहजता से जातिगत संबोधन करने मात्र से एससी/ एसटी एक्ट लगाने की धमकी दी जाती हो और पुलिस – कचहरी सब हो जाता हो ,उस जिले मे आज भी कोलान टोला, बैगा टोला, भंगीटोला जैसे नाम वाले विद्यालय संचालित हैं । इसे लेकर किसी जन प्रतिनिधि या जिम्मेदार अधिकारी ने कोई पहल नहीं की। जब मैने लगभग 15 वर्ष पहले जिला शिक्षा अधिकारी से विद्यालयों की सूची मांगी और भौतिक अवलोकन किया तो यह सही पाया गया। मैने समाचार का प्रकाशन करके तत्कालीन कलेक्टर को पत्र लिखा लेकिन हुआ कुछ नहीं ।
दूसरी घटना जिला पंचायत अनूपपुर की है। जहाँ एक विभाग की महिला अधिकारी को ब्लाक स्तर का एक पुरुष कर्मचारी कार्यालयीन कार्य के दौरान जिला प्रमुख और स्टाफ से सामने गुण्डागर्दी की हद तक बदतमीजी करते हुए खुले आम एससी/ एसटी एक्ट लगवाने की धमकी देता है। बावजूद इसके की उसका एससी का प्रमाणपत्र ही फर्जी है। इस व्यक्ति को एक पूर्व विधायक प्रश्रय देता है और पुलिस कार्यवाही ना होने देने के लिये दबाव बनाता है।
कहने का आशय ये कि एक ऐसे लोकतांत्रिक देश मे जहाँ जाति आधारित आरक्षण हो, जाति आधारित कानून बनाए जाते हों,जाति आधारित सुविधाएँ दी जाती हों, जाति आधारित राजनीतिक व्यवस्था जमाई गयी हो और जाति के आधार पर सरकारें बनाये और बिगाडे जाते हों ,वहाँ जातिगत विद्वेष खतम करना, सामाजिक समरसता बनाए रखना और जाति व्यवस्था के दोषों से मुक्त होना तब तक असंभव है ,जब तक की समाज इसके लिये तैयार ना हो और जागरुक ना हो जाए।
जातिगत व्यवस्था का लाभार्थी समाज का एक बडा वर्ग है जो आरक्षण , योजनाओं का लाभ और नियम कायदों का संरक्षण प्राप्त करने के लिये पुश्त – दर – पुश्त जाति का लाभ तो उठाता आ रहा है लेकिन अन्य किसी के संबोधन मात्र से उसे सामाजिक सौहार्द बिगडने का खतरा महसूस होने लगता है और वह स्वयं को दबा ,कुचला, पीडित ,दलित बतलाने मे कोई संकोच नहीं करता।
बहरहाल ! एक अति महत्वपूर्ण घटनाक्रम की एक छोटी सी खबर ने आज मेरा ध्तान खींचा तो आश्चर्य हुआ कि इतने महत्वपूर्ण विषय पर उत्तरप्रदेश सरकार के इतने साहसिक निर्णय का कहीं किसी समाचार चैनल, समाचार पत्र मे जिक्र क्यो नही है।
उत्तरप्रदेश सरकार ने उच्च न्यायालय के निर्णय के पालनार्थ यह आदेश जारी किया है। यदि इसका पालन उत्तरप्रदेश मे और इसका अनुकरण करते हुए अन्य राज्यों में यह प्रयोग हो जाए तो देश के सामाजिक ताने बाने को मजबूत करने और जातीय विभाजन को रोकने की दिशा मे मील का पत्थर साबित होगा। यह उच्च न्यायालय का एतिहासिक निर्णय और उत्तरप्रदेश सरकार का साहसिक आदेश माना जाएगा।
उत्तरप्रदेश सरकार ने जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिये एक आदेश जारी करके जाति आधारित रैलियों पर पूरी तरह से रोक लगा दी है। इसके साथ ही सार्वजनिक स्थानों,पुलिस एफ आई आर , अरेस्ट मेमो और सरकारी डाक्यूमेंट्स मे भी किसी की कास्ट नहीं लिखी जाएगी।
इस संबंध में मुख्य सचिव ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले के अनुपालन मे निर्दश दिये हैं। मुख्य सचिच के निर्देशों के अनुसार अब पुलिस रिकॉर्ड जैसे एफ आई आर,गिरफ्तारी मेमो मे किसी भी व्यक्ति की जाति का जिक्र नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही सरकारी और कानूनी दस्तावेजों मे भी जाति से संबंधित कालम हटा दिया जाएगा। सरकार का
यह कदम निश्चित रुप से सभी के साथ समान व्यवहार सुनिश्चित करेगा।
देश मे जहाँ जातिद्वेष जहर की तरह समाज और देश को खोखला कर रहा हो ,वहाँ ऐसी कोई पहल उम्मीद की किरण जगाती है। ध्यान देने योग्य तथ्य यह भी है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ मे यह परंपरा देखने को मिलती है ,जहाँ लोग अपने नाम के आगे जाति का उल्लेख नहीं करते। उच्च वर्ग के अधिकारी ,समाजसेवी, व्यवसायी भी अपने कार्य व्यवहार मे जाति के प्रदर्शन से बचते देखे जा रहे हैं।
उम्मीद है कि ऐसी पहल समाज की एकजुटता, मजबूती और सौहार्दपूर्ण वातावरण के निर्माण मे सहायक होगी।
– लेखक वरिष्ठ पत्रकार और दैनिक समाचार पत्र के संपादक हैं .
– लेख में दिए विचार लेखक के स्वयं के हे।इसमें एमपीटुडे न्यूज की सहमति नहीं हैं