उस्मानिया ख़लीफत, हैदराबाद का निजाम और सीक्रेट दस्तावेज,आखिरी खलीफा और महाराष्ट्र के खुल्दाबाद की वो,गुमनाम कब्र..-विवेक त्रिपाठी
आलेख
विवेक त्रिपाठी
हैदराबाद का आखिरी निजाम उस्मान अली निजाम जिसकी चर्चा प्राय: उसकी अथाह धन दौलत और हंसी मजाक से भरी किस्से कहानियां में होती है। दूसरी ओर तुर्की का इस्तांबुल शहर, एक दौर में ओटोमन एंपायर और इस्लामी दुनिया के आखिरी खलीफत के दौर का बड़ा शहर था। इसी शहर में केंद्रित तुर्की के उस्मानिया सल्तनत ने इस शहर से पिछले करीब 500 सालों तक एशिया, यूरोप और अफ्रीका के एक बड़े हिस्से पर राज किया, जिनकी हैवानियत और क्रूरता के किस्से आर्मेनिया जैसे यूरोपीय देशों के लोगों के दिलों दिमाग में आज भी ताजा हैं।
1930 के दशक में हैदराबाद का निजाम ‘ मीर उस्मान अली खान’ टाइम मैगजीन के हिसाब से दुनिया का सबसे अमीर इंसान था। उस वक्त निजाम के महल में 14718 सेवकों का स्टाफ था। निजाम की खुद की 42 मिस्ट्रेस (रखैलें), इन 42 रखैलों की देखभाल करने वाला अलग से एक बड़ा स्टाफ..; 10-12 सेवक ऐसे भी थे, जिनका एकमात्र काम निजाम का पुरुषत्व बढ़ाने वाले अखरोट को पीसना था। निजाम की हैसियत का अंदाजा आप इस बात से लगाइए कि वह 900 करोड़ के हीरे को कागज दबाने में इस्तेमाल होने वाले पेपर वेट की तरह इस्तेमाल करता था।

इतनी दौलत के बाद भी निजाम की कंजूसी के कई किस्से हैं – “एक दिन किसी ने निजाम को नजराने में एक सोने की अशर्फी दी, निजाम ने अशर्फी ली ही थी कि उनसे हाथ से छिटक कर नीचे गिर गई और खन-खनाती हुई सीढ़ियों से लुढ़क कर नीचे गिरने लगी। निजाम अपनी कुर्सी से उठे, कोहनियों और घुटनों के बल अशर्फी की तरफ दौड़े। अशर्फी सीढ़ियों के नीचे खड़े एक शख्स के पैर से टकरा कर रुकी, फिर भी निजाम ने उसे उठाया और अपनी पोटली में डाल लिया”।
ग्रेट वार यानी प्रथम विश्व युद्ध (1914- 19) के दौरान तुर्की में कमाल अतातुर्क ने खलीफा की खलीफत को उखाड़ फेंका और तुर्की में आधुनिक नए यूरोप की तरह के मॉडर्न रिपब्लिक की शुरुआत हुई। अब भी खलीफा (सन 632 में पैगंबर मोहम्मद की मृत्यु के बाद उनके प्रतिनिधि खलीफा हुए) का सांकेतिक महत्व था, इसलिए खलीफा के एक चचेरे भाई और प्रतिद्वंद्वी अब्दुल मजीद जिसको राजकाज से कोई विशेष मतलब नहीं था और जो ऐशो आराम, पेंटिंग, नाच- गान में खुश रहने वाला एक रंगीन मिजाज आदमी था को पहले सांकेतिक खलीफा घोषित किया गया और फ़िर कुछ महीनो बाद ओरिएंटल ट्रेन में बिठाकर मय परिवार देश निकाला देकर फ़्रांस भेज दिया गया। इसी के साथ इस्लामी दुनिया में पिछले क़रीब 1000 सालों की लंबी खिलाफत का अंततः खात्मा हुआ।
खिलाफत के खात्में का विरोध अरब वर्ल्ड में होना था, पर हुआ उल्टा; इसका सबसे ज्यादा विरोध भारत में हुआ। खिलाफत की प्रतिक्रिया शुद्ध अरबों में नहीं अपितु यहां के हिंदुस्तानी कन्वर्ट्स में ज्यादा थी। यही वह वक्त था, जब आजादी की लड़ाई में मजहबी लोगों के साथ की आशा लिए गांधी ने खिलाफत मूवमेंट को समर्थन दिया और यहीं से भारत में मजहबी उन्माद और प्रतिक्रियवाद को मेंनस्ट्रीम समर्थन और संरक्षण मिला। वैसे भारत में खिलाफत मूवमेंट को सबसे ज्यादा समर्थन और आर्थिक सहयोग हैदराबाद के निजाम ‘ मीर उस्मान अली’ से मिला।
1924 में जब निर्वासित खलीफा अब्दुल मजीद का परिवार फ्रांस में जाकर बसा तो वहां का पूरा इंतजाम और खर्चा भारत के निजाम ने ही किया। तुर्की में खलीफत के अंत के बाद हैदराबाद का निजाम भारत में खलीफा के राज्य को दुबारा क़ायम किए जाने स्थापना में अपना पूरा ध्यान लगाने लगा; वैसे भी कमाल पाशा के कारण तुर्की में यह सब संभव नहीं था। अली ब्रदर्स (शौकत अली- मोहम्मद अली, वही जामियां मिलिया वाले) ने खिलाफत को समर्थन के बदले गांधी का समर्थन किया, यद्यपि की खुद बाद में ख़िलाफत मूवमेंट की हवा निकलने के बाद वे मुस्लिम लीग में शामिल हो गए। इन्होंने फ्रांस में विस्थापित खलीफा और हैदराबाद के निजाम के बीच मध्यस्थता की और एक आईडिया दिया- “खलीफा की बड़ी बेटी शहजादी ‘ दुर्रू शेहवर’ की शादी निजाम के बेटे प्रिंस आजम जाह से करने का”। दुनिया के सबसे अमीर शख्स के परिवार में दुनिया के सबसे बड़े इस्लामी लीडर के परिवार के साथ शादी का एक सांकेतिक और राजनीतिक मतलब था, शादी से पैदा होने वाला बेटा यानी दौलत और खिलाफत दोनों का वारिस होना था, जिसकी प्रतिक्रिया तुर्की और सुदूर इंग्लैंड में होनी शुरू हुई। शहजादी की कोख से अगले कुछ साल बाद शहजादा मुकर्रम जाह का जन्म हुआ।

सीक्रेट दस्तावेज-
दरअसल शादी से पहले हैदराबाद के निजाम और आखिरी खलीफा के बीच हैदराबाद में निजाम के राजमहल में एक सीक्रेट डील हुई थी, जिसका दुनिया को कई साल बाद पता चला। द लास्ट निजाम: द राइज एंड फॉल ऑफ इंडियाज़ ग्रेटेस्ट प्रिंसली स्टेट” नामक पुस्तक में जॉन ज़ुब्रज़ीकी John Zubrzycki लिखते हैं -“ब्रिटिश लाइब्रेरी के पुराने दस्तावेजों में एक लेटर मिला, जिसके अनुसार अंतिम खलीफा अब्दुल मजीद ने अपनी एक वसीयत बनाई थी इसमें अगले खलीफा की घोषणा की गई थी। वसीयत में खलीफा निजाम को लिखता है – “मुझे भरोसा है कि इस नए रिश्ते का पहला बेटा खलीफा का पद और हैदराबाद का शासन दोनों संभालेगा”। यह बेटा था खलीफा का पोता और निजाम का नाती मुकर्रम जाह..। खलीफा ने यह भी लिखा कि उसके मरने के बाद उसे हिंदुस्तान में दफनाया जाए”।
महाराष्ट्र का औरंगाबाद (वर्तमान संभाजी नगर) तब निजाम शाही राज्य का हिस्सा था, एक यहां एक तहसील है- ‘खुल्दाबाद’। यहां सैकड़ो सूफी संतों को दफनाया गया है, जहां उनकी मजारें हैं। यही एक छोटी पहाड़ी के टॉप में तुर्क शैली में बना एक मकबरा है जिसके बीच में कब्र की जगह आज भी खाली है। निजाम द्वारा यह कब्र इस्लाम के आखिरी खलीफा अब्दुल मजीद के लिए बनवाई गई थी, यद्यपि कि खलीफा की ख्वाहिश पूरी नहीं हो पाई।
साल 1944 अमेरिकी फौज नाज़ी जर्मनी से फ्रांस को आजाद कराने की जंग लड़ रही थी। इसी वक्त पेरिस में अब्दुल मजीद को दिल का दौरा पड़ा और उसकी मौत हो गई। 1947 के पहले हिंदू मुस्लिम बंटवारे की आग धधक रही थी, वक्त ठीक नहीं था इसलिए खलीफा की देह को इस वक्त भारत लाया जाना संभव नहीं था। अब्दुल मजीद वहीं पेरिस में दफन हुए, बाद में उनकी कब्र मदीना ले जाई गई जहां इस्लाम के इस आखिरी खलीफा की कब्र आज भी मौजूद है।
खलीफा के पोते मुकर्रम ज़ाह को आखिरी खलीफा बनाने का सपना भी पूरा नहीं हुआ हो पाया क्योंकि सरदार पटेल ने वहां फोर्स भेज दी और हैदराबाद का भारत में विलय हो गया। मुकर्रम ज़ाह भारत छोड़कर इंग्लैंड चला गया, इसकी मां ‘ दुर्रू शेहवर’ का साल 2006 में 92 साल की उम्र में लंदन में इंतकाल हुआ। मुकर्रम ज़ाह अपने दादा की मृत्यु के बाद हैदराबाद का निजाम घोषित हुआ, किंतु भारत सरकार ने 1971 में निजाम की उपाधि ही खत्म कर दी। 1973 में मुकर्रम ज़ाह ऑस्ट्रेलिया चला गया, जहां उसने करीब 2 लाख हेक्टेयर का एक फार्म हाउस खरीदा और उसमें भेड़ें पाली। करीब दो दशक बाद निजाम मुकर्रम ज़ाह, भेड़ें बेचकर ऑस्ट्रेलिया छोड़ पेरिस चला गया और वहां उसी छोटे से अपार्टमेंट में अपनी आखिरी जिंदगी बिताई जहां उसका नाना अपने निर्वासन काल में रहा करता था। हैदराबाद के आखिरी निजाम मुकर्रम जाह की भी पिछले साल 2024 में इस्तांबुल के एक छोटे से फ्लैट में मौत हो गई।

इस्लामी दुनिया के आखिरी खलीफा की कब्र हिंदुस्तान में क्यों बनी ?
निजाम ने आखिरी वक्त तक पाकिस्तान से मिलने की कोशिश की,भारतीय राज्यों का संघ बनाकर इंडियन स्टेट को कमजोर करने का प्रयास किया।दाल नहीं गली, तो स्वतंत्र रहने का प्रयास किया और रजाकारों की फौज ने राज्य के अधिसंख्य हिंदुओं की क्रूर और निर्मम हत्याएं की, दरअसल भारत को ‘ दारुल हरब’ से ‘ दारुल इस्लाम’ बनाने की आलिज़ाह की पूरी प्लानिंग थी।