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प्रभु दा के बगैर एक साल….!-अजय बोकिल

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कभी भूले से भी यह विचार मन में नहीं आया था कि कोई एक साल बिना प्रभु जोशी की मीठी डांट, अविस्मरणीय नसीहतों और जरूरी मार्गदर्शन के भी बीतेगा। यूं तो यह साल भी हर साल की तरह से गुजरा, लेकिन खिन्न मन और कुछ एकाकी सा। यह अनचाही सच्चाई है कि कोरोना की उस दूसरी और महाभयानक लहर ने बहुत से ऐसे फोन नंबर सदा के लिए खामोश हो गए हैं, जिनका आना ही अपने आप में रचनात्मक जीवतंता की गारंटी थी। प्रभु दा उसमें अग्रणी थे। उनके इस तरह असमय जाने के सिर्फ एक माह पहले तक उनसे बात नहीं हुई थी। वरना मेरे स्तम्भ के हर एपीसोड पर वो जरूरी प्रतिक्रिया देते थे, कमियां बताते थे, बेहतर लिखने के लिए अनमोल टिप्स भी देते थे। वो जब ये कहते थे कि अजय मेरे साथ यूं तो बहुत से लोगों ने काम किया, लेकिन तुम उन गिने चुने लोगों में से हो, जिन्होंने खुद को लगातार ‘इम्प्रूव’ करने की कोशिश की है, करते जा रहे हो। एक जेनुइन पत्रकार और लेखक की यही निशानी है।
प्रभुदा के न होने का मेरे लिए अर्थ यही है कि मेरी रचनात्मकता के लिए बार बार टोकने और उसकी दिशा सही रखने वाला एक विराट कम्पास ही खामोश हो गया है। बीते कुछ सालों से प्रभुदा रंगों की दुनिया में ज्यादा रम गए थे। जल रंगों से बनी उनकी कई पेंटिग्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही और पुरस्कृत हुईं। शब्दकार और चित्रकार एक साथ होने से वो भावों और संवेदनाअों को बहुत गहराई से ‘विजुअलाइज’ कर सकते थे। ऐसी प्रतिभा बिरली ही देखने को मिलती है और उससे गहरा सान्निध्य तो केवल भाग्य की बात है। प्रभुदा वैचारिक रूप से भी सम्पन्न थे, लेकिन अतिवादी और वैचारिक कट्टरता से दूर थे। अलबत्ता कारपोरेट जगत, पूंजीवाद के हथकंडों और स्त्री को लेकर बाजार की सोच के मुखर विरोधी थे। इस बारे में उन्होंने अपनी राय हमेशा बेबाकी से रखी।
प्रतिभाअों में भी ‘जेनुइन’और छद्म प्रतिभा के फर्क को उनकी बड़ी बड़ी भाव प्रवण आंखें बहुत गहराई से बूझ लेती थीं। मैंने अपनी श्रद्धां जलि में पिछले साल लिखा था कि प्रभु दा कई बार हिंदी के (अधिकांश) लेखकों की बौद्धिक विपन्नता पर क्षोभ व्यक्त करते थे। चूंकि वे स्वयं किसी विशेष खेमे से नहीं बंधे थे और अपने सृजनात्मक मानदंड खुद ही तय करते थे, इसलिए उन्हें वैसा ‘सपोर्ट’ नहीं मिला, जो अमूमन किसी एक झंडे तले खड़े होने से मिलता है, लेकिन उनकी बौद्धिक समझ, तर्क शक्ति, प्राणवान भाषा और जलरंगों पर उनकी पकड़ लासानी थी।
है।
यह विचित्र संयोग था कि 2021 में प्रभुदा की की फेसबुक पर ( संभवत) आखिरी पोस्ट 24 अप्रैल की थी। जिसमें उन्होंने जाने-माने लेखक रमेश उपाध्याय के असमय निधन पर लिखा था-‘आज रमेश उपाध्याय के न रहने के सच को स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ। जैसे कोई धमकी देकर , मुझे बाध्य कर रहा है। लेकिन कैसे करूं, अभी तो उनकी आवाज़ की अनुगूँज भी कान के पर्दे पर डोल रही है। कुछ ऐसी ही बात प्रभु दा को लेकर मेरे मन में आज भी है। वो आवाज जो दिल से आती थी और दिल तक पहुंचती थी। लिहाजा एक साल तो क्या प्रभु दा के भौतिक रूप से जाने के सालो साल बाद तक गूंजती रहेगी।
उनकी अनमिट स्मृतियों को नमन….!
( अपनी फेसबुक वाल से)

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