मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
कायमपुर गांव के हनुमान मंदिर परीसर में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के सातवें और आखिरी दिन कथावाचक हरि ओम महाराज ने उधव चरित्र, महारासलीला व रुक्मिणी विवाह का वर्णन किया। कथावाचक ने कहा कि गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण से उन्हें पति रूप में पाने की इच्छा प्रकट की। भगवान श्रीकृष्ण ने गोपियों की इस कामना को पूरी करने का वचन दिया। अपने वचन को पूरा करने के लिए भगवान ने महारास का आयोजन किया। इसके लिए शरद पूर्णिमा की रात को यमुना तट पर गोपियों को मिलने के लिए कहा गया। सभी गोपियां सज-धजकर नियत समय पर यमुना तट पर पहुंच गईं। कृष्ण की बांसुरी की धुन सुनकर सभी गोपियां अपनी सुध-बुध खोकर कृष्ण के पास पहुंच गईं। उन सभी गोपियों के मन में कृष्ण के नजदीक जाने, उनसे प्रेम करने का भाव तो जागा, लेकिन यह पूरी तरह वासना रहित था। इसके बाद भगवान ने रास आरंभ किया। माना जाता है कि वृंदावन स्थित निधिवन ही वह स्थान है, जहां श्रीकृष्ण ने महारास रचाया था। यहां भगवान ने एक अद्भुत लीला दिखाई थी, जितनी गोपियां उतने ही श्रीकृष्ण के प्रतिरूप प्रकट हो गए। सभी गोपियों को उनका कृष्ण मिल गया और दिव्य नृत्य व प्रेमानंद शुरू हुआ। रुक्मिणी विवाह का वर्णन करते हुऐ कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने सभी राजाओं को हराकर विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी को द्वारका में लाकर उनका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। मौके पर आयोजक मंडली की ओर से आकर्षक वेश-भूषा में श्रीकृष्ण व रुक्मिणी विवाह की झांकी प्रस्तुत कर विवाह संस्कार की रस्मों को पूरा किया गया।
कथा वाचक हरिओम महाराज ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण व सुदामा अच्छे मित्र थे। गोकुल में वह एक साथ खेल-खेलकर बड़े हुए। बाद में पाप का अंत करने के लिए भगवान मथुरा आ गए। वहां पर उन्होंने कंस का संहार किया। कृष्ण के मथुरा जाने के बाद सुदामा के घर काफी गरीबी आ गई। स्थित यह हो गई कि उनके घर दो वक्त की रोटी के लाले पड़ गए। गरीबी से तंग सुदामा की पत्नी सुशीला ने सुदामा से कहा कि तुम अपने बचपन के मित्र श्रीकृष्ण से मिलो, वह मदद कर सकते हैं। पत्नी के कहने पर सुदामा बचपन के मित्र से मिलने के लिए तैयार हुए। जाते समय सुशीला से सुदामा को चावल दिया और कहा कि इसे भेंट में श्रीकृष्ण को देना। जब सुदामा मथुरा पहुंच कर द्वारपाल के माध्यम से सूचना दिया तो भगवान दौड़कर सखा सुदामा से गले मिले। वहां पर उपस्थित लोग आश्चर्य चकित हो गए। सुदामा का भगवान श्रीकृष्ण से स्वागत सत्कार किया। बाद में पूछा की भाभी ने हमारे लिए कुछ भेजा है। तब सुदामा ने चावल दे दिए। भगवान ने उस चावल में से दो मुट्ठी चावल खाया तो सुदामा दो लोक के मालिक हो गए। जब उन्होंने तीसरी मुट्ठी में चावल लिया तो रुक्मणि ने रोक दिया। प्रभु यदि आपने यह चावल खाया तो एक लोक जो बचा हुआ है, उसके मालिक भी सुदामा हो जाएंगे और देवता कहां जाएंगे। कहा कि लोगों को भगवान श्रीकृष्ण व सुदामा की मित्रता से सीख लेनी चाहिए। इससे पूर्व भगवान श्रीकृष्ण व रुक्मणि के विवाह की लीला का मंचन किया है।क्षेत्रीय लोग प्रसाद प्राप्त कर राधे-कृष्ण के जायकारे लगाए।
महायज्ञ की समाप्ति पर गांव में विशाल भंडारा का आयोजन हुआ। जिसमें आसपास के ग्रामीण इलाकों के भक्तों ने प्रसाद सहित भोजन प्राप्त किया।
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