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जलाशयों में दिखाई देते सूखे पेड़; मत्स्य पालन में बनते है बाधक

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तालाब बनने से पहले काटे जाना चाहिए पेड़ तो समितियां होंगी लाभान्वित

रिपोर्ट धीरज जॉनसन, दमोह

दमोह जिले में मत्स्य पालन और इससे रोजगार के अवसर तलाशने के लिए वैसे तो काफी जलाशय अस्तित्व में है और मछुआरों के लिए विभिन्न योजनाएं भी आती रहीं है पर जमीनी स्तर पर शोध और सुधार कार्य न होने के कारण नीली क्रांति की धीमी गति से चलती हुई प्रतीत होती है।

जिले में विभिन्न विभागों के अंतर्गत आने वाले तालाबों की संख्या तो बहुत है और नए तालाबों के निर्माण के लिए टेंडर के समय जलाशय के अंतर्गत आनेवाले पेड़ों को काटने का प्रावधान भी होता है परंतु जिम्मेदारों द्वारा इस ओर ध्यान नहीं दिया जाता और जब यह तालाब या जलाशय मत्स्य विभाग द्वारा मछुआ समितियों को मत्स्य पालन के लिए दिया जाता है तो जलाशय के अंदर पेड़ों की अधिकता के कारण मछली पकड़ना ही कठिन हो जाता है या मछुआरों के जाल फट जाते है जिससे नुकसान होता है और लागत वसूल नहीं हो पाती है।

एक जानकारी के अनुसार एक मछुआ समिति में 20 से अधिक सदस्य होते है और इन कठिनाइयों के कारण उन्हें बहुत कम आय होती है जिसका असर इनके परिवार पर भी पड़ता है यही कारण है कि मछुआ समितियों का मत्स्य पालन से मोहभंग होता जा रहा है।

इस संबंध में जब कुछ मछुआ समितियों से बात की गई तो उनका कहना था कि जलाशय र्निर्माण के दौरान विभिन्न विभागों के साथ मत्स्य विभाग को तालमेल से काम करना चाहिए और पेड़ों को पहले कटवाना चाहिए जिससे मछुआरों को सुविधा हो सकती है। साथ ही जलाशय में बर्बाद होने वाली लकड़ियों को डिपो भेजा जा सकता है जो लोगों के काम आएंगी और अवैध कटाई पर कुछ हद तक रोक के साथ मत्स्य पालन भी बढ़ जाएगा। अगर इस ओर ध्यान नहीं दिया गया तो पानी में पेड़ भी खराब होंगे और समितियों से जुड़े लोगों को नुकसान होगा,पर विभाग तो प्रतिवर्ष उत्पादन के बेहतर आंकड़े प्रस्तुत कर अपनी पीठ थपथपाता रहेगा।

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