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ज़िंदगी की किताब लेकर आए हरीश पाठक-राजेश बादल

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संसार की कोई किताब ज़िंदगी की किताब से बेहतर नहीं होती। जितने भी रंग ज़िंदगी में होते हैं,उतने रंग शब्दों से भरपूर किसी किताब में नहीं होते।ज़िंदगी की इस अनमोल पुस्तक को यदि कोई शब्दों में ढाल दे ,तो समझो कारूं का ख़ज़ाना हाथ लग गया। मेरे हाथ वाकई एक ऐसा ही ख़ज़ाना लगा है.हरीश पाठक कोई चालीस पैंतालीस साल से दोस्त और भाई जैसे हैं। कई बार उनकी धुन,ज़िद,पागलपन और समर्पण चौंकाता है।आंचलिक पत्रकारिता पर उनका शोध ग्रन्थ हिंदी पत्रकारिता की नायाब धरोहर है। अब उन्होंने यादों की घाटियों में विचरते हुए बेजोड़ स्मृति लेख हमारे हवाले किए हैं ।यकीनन,आने वाली पीढ़ियों के लिए यह ऐसी विरासत है,जो उन्हें अपने पुरखों से जोड़कर रखेगी।


हरीश ने अपनी ज़िंदगी में आए जिन किरदारों को लफ्ज़ों की लीला का पात्र बनाया है,वे स्वयं भी आश्वस्त नहीं होंगे कि इस लोक से विदा होने के बाद उन्हें कोई इस तरह याद करेगा। यही हमारे पितरों का सच्चा श्राद्ध है । पाखंडी कर्मकांड से उन्हें याद करना पितृपक्ष का कर्तव्य नहीं है बल्कि सच्चा श्राद्ध यही है कि हम ऐसे व्यक्तित्वों को अपनी धड़कनों में महसूस करें ।
मेरा आकाश,मेरे धूमकेतु मेरे सामने है ।रात को एक सांस में ही पढ़ गया । उनकी यादों के दरीचों में जिन किरदारों ने जगह बनाई है ,उनमें कुछ मेरे मानस पटल पर भी उपस्थित हैं ।पढ़ते पढ़ते आंखों के सामने फ़िल्म चलने लगती है। चाहे आलोक तोमर हों या निदा फ़ाज़ली, वनमाला हों या फिर डॉक्टर धर्मवीर भारती , गणेश मंत्री हों या फिर प्रभु जोशी, शिव अनुराग पटेरिया हों या फिर भूपेंद्र चतुर्वेदी,जुगनू शारदेय हों या फिर के एम श्रीवास्तव,कैलाश सेंगर हों या फिर मोतीलाल वोरा और साथ साथ ऐसे भी कई अन्य चेहरे हैं ,जो किताब पढ़ते हुए ज़ेहन में आते जाते रहते हैं। अधिकतर नामों से मैं भी वाक़िफ़ हूँ और कह सकता हूँ कि भाई हरीश पाठक ने भारतीय संस्मरण लेखन शैली में एक नए प्रयोग को जन्म दे दिया है। उन्होंने संस्मरण और शब्दचित्र विधाओं को संयुक्त करके एक नई विधा ईजाद कर दी है। इसके लिए कोई नया शब्द गढ़ना पड़ेगा। स्वतंत्रता के बाद बनारसी दास चतुर्वेदी ,राजेंद्र माथुर और डॉक्टर धर्मवीर भारती ने हिंदी में अभिव्यक्ति के लिए जिस भाषा को मांजा और तराशा था ,भाई हरीश पाठक ने उसे आगे बढ़ाया है।आप कोई भी अध्याय या संस्मरण पढ़ लीजिए। आप जैसे जैसे आगे बढ़ते हैं ,दिमाग़ के परदे पर चित्रों की फ़िल्म चलती जाती है। आज़ादी से पहले प्रेमचंद के पास यह हुनर था। उनकी कोई भी कहानी पढ़ जाइए। आपके ज़ेहन में चित्रों की श्रृंखला जाग जाती है। आप कहानी के साथ रोते हैं और कहानी के साथ हँसते हैं। कितने लोगों के पास अपने भाव या विचार को कलम के ज़रिए प्रकट करने की ऐसी कला है ? हरीश पाठक अपने बारे में कोई दावा नहीं करते कि वे सबसे अमीर भाषा के मालिक हैं। लेकिन अगर वे यह दावा करना चाहें कि वे जो कहना चाहते हैं ,लिख पाते हैं तो मैं उनके साथ खड़ा हूँ।
बहरहाल ! हरीश ने मेरा आकाश ,मेरा धूमकेतु हमें सौंप कर हिंदी पत्रकारिता के ख़ज़ाने में एक और मोती रख दिया है। प्रभात प्रकाशन इसके लिए निश्चित रूप से बधाई का पात्र है कि उसने एक शानदार पुस्तक अपने पाठकों को दी है ।

-लेखक देश के ख्यात वरिष्ठ पत्रकार हें।

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