मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
सांची विकासखंड के कई गांव में आज भी किसान अपने खेतों में देसी खाद डालते हैं। गेहूं चने की फसल काटने के बाद किसान अपने गांव में बने गोबर के खाद को डालना प्रारंभ कर देते हैं धीरे धीरे मिट्टी की सेहत के प्रति किसान जागरूक होने लगे हैं। लगातार घट रहे उत्पाद के कारण अब किसानों ने भी मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। किसान अपने खेतों में देशी खाद के प्रयोग पर अधिक ध्यान देने लगे हैं। छोटी जोत होने के कारण वर्षभर खेतों से उत्पादन चलता रहता है जिससे लगातार भूमि में पोषक तत्वों का अभाव होता जा रहा है।
दीवानगंज क्षेत्र में 70% घरों में पशु पालन होता है। पशुओं से प्राप्त गोबर को देशी खाद के रूप में प्रयोग कर किसान भी अपने खेतों की सेहत सुधार रहे हैं। अच्छे उत्पादन के लिए भूमि को 17 प्रकार के पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। गोबर की खाद में भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए पर्याप्त मात्रा में पोषक तत्व होते हैं। पिछले नवंबर से जनवरी माह के दौरान किसानों को डीएपी खाद के लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ी थी। वहीं गेहूं चना की फैसल काटने के बात किसानों ने अपने खेत में देशी खाद डालना प्रारंभ कर दिया है।
नरखेडा गांव में रहने किसान सुरेश लोधी ने बताया कि देशी खाद के माध्यम से 15 से 20 प्रतिशत उत्पादन भी बढ़ता है। वहीं डीएपी के लिए गत दिनों किसानों को बड़ी परेशानी भी उठानी पड़ी थी। प्रत्येक घर में पशु पालन होता है ऐसे में पशुओं से प्राप्त गोबर की देशी खाद मिट्टी की सेहत सुधारने मेें काफी कारगर है।
गोबर की खाद में भूमि के लिए आवश्यक 17 पोषक तत्वों में से अधिकांश पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं। इसके प्रयोग से भूमि की भौतिक, जैविक व रासायनिक दशा में सुधार होता है। भूमि की नमी को अधिक समय तक शोषित रखने की ताकत बढ़ती है। सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है जो उत्पादन बढ़ाने में सहायक है। किसान वर्ष में एक एकड़ में छह टन देशी खाद का प्रयोग कर वर्षभर बिना किसी अन्य रसायनिक खाद या केमिकल के प्रयोग के अच्छी पैदावार ले सकते हैं। तीन वर्ष तक लगातार एक ही खेत में डालने से खेतों की स्थिति में काफी सुधार संभव है।
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