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अशोकनगर में है एक ऐसा मंदिर, जहां राम के बिना होती है माता जानकी और लव-कुश की पूजा

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अशोकनगर। जहां पूरा विश्व अयोध्या में रामलला के प्राणप्रतिष्ठा समारोह का पलक पावड़े बिछाकर महोत्सव मनाने का इंतजार कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ देश में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां श्रीराम के बगैर मां जानकी विराजित हैं। वहां पर भी महोत्सव मनाने की तैयारियां जोरों पर हैं। शायद यह जानकार आपको आश्चर्य होगा कि अशोकनगर जिले की मुंगावली तहसील के अंतर्गत ग्राम पंचायत जसैया की पहाड़ियों के बीच एक ऐसा भी मंदिर है, जो देश के विभिन्न प्रांतों के श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। इस मंदिर को करीलाधाम के नाम से जाना जाता है। यहां माता जानकी के अलावा उनके पुत्र लव-कुश का मंदिर है। यहां पर लोग मन्नतें मांगते हैं और मन्नत पूरी होने पर बुंदेलखंड का पारंपरिक नृत्य राई कराते हैं।

ऐसा लोगों का मानना है कि इस स्थान पर लव-कुश का जन्म होने पर स्वर्ग लोक से अफ्सराओं में आकर नृत्य किया था। तब से ही यहां नृत्य की परंपरा चली आ रही है। शायद करीलाधाम ही विश्व में एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां महर्षि वाल्मिकी, माता सीता, लव-कुश की प्रतिमाएं मंदिर में विराजित हैं, लेकिन भगवान श्रीराम दिखाई नहीं देते। उक्त मंदिर का संचालन करीला माता ट्रस्ट करता है।

करीला ट्रस्ट के अध्यक्ष महेंद्र सिंह यादव बताते हैं कि इस स्थान पर भगवान लव-कुश का जन्म हुआ था। ऐसा पूर्व से प्रचलित है कि श्रीराम द्वारा माता सीता का परित्याग करने पर उन्होंने यहीं पर स्थित ऋषि वाल्मिकी आश्रम में आश्रय लिया। मेले की परंपरा दो सदी से अधिक पुरानी है। हर साल रंगपंचमी पर यहां तीन दिवसीय मेला का आयोजन होता है, जिसमें भारत के विभिन्न प्रांतों से लोग पहुंचकर अपनी मन्नतें पूरी होने पर राई नृत्य करवाते हैं। मध्यभारत में एक दिन का सबसे बड़ा मेला करीला है, जहां करीब एक दिन में 25 लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचकर मां जानकी के दर्शन करते हैं।

करीला धाम पर वैसे तो लोग अपनी सुविधा के अनुसार राई नृत्य करवाते हैं, लेकिन रंगपंचमी पर यहां बुंदेलखंड के पारंपरिक राई नृत्य को करने के लिए सैंकड़ों बेड़िया जाति की नृत्यांगनाएं पहुंचती हैं। रात भर ढोलक की थाप पर यहां पारंपरिक राई नृत्य कई स्थानों पर होता है। हालाकि बदलते परिवेश के साथ अब इस मंदिर पर बेड़िया जाति के अलावा दूसरी नृत्यांगनाएं भी पहुंचने लगी हैं। सदियों पुरानी प्रथा आज भी इस मंदिर पर देखी जा सकती है। मंदिर की मान्यता है कि यहां निस्संतान दंपती की झोली माता सीता भर देती हैं। मन्नत पूरी होने के बाद लोग राई नृत्य माता के दरबार में करवाते हैं।

मां जानकी के दरबार में पहुंचकर दर्शन करने के लिए वैसे तो साल भर लोगों का आना जाना रहता है लेकिन हर माह की पूर्णिमा को भी यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर मां जानकी के दर्शन करते हैं। वहीं मंदिर को लेकर एक मान्यता और है कि यहां की भभूति खेत में कीटाणुनाशक और इल्लीनाशक का भी काम करती है। इसके अलावा यहां मेला के दौरान लोहे की कड़ाही को खरीदने की मान्यता प्रचलित होने के कारण हर साल लाखों रुपए की कड़ाही मात्र तीन दिन के मेले में बिक जाती हैं।
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