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शहर में बर्फ की सात फैक्ट्रियां प्रशासन को जानकारी नहीं किसके पास खाद्य लाइसेंस

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भोपाल। शहर में बर्फ बनाने की सात फैक्ट्रियां वर्षों से संचालित हैं, लेकिन हैरानी की बात है कि इसका जिम्मा संभालने वाले खाद्य एवं औषधि प्रशासन को जानकारी ही नहीं है कि कितनों के पास लाइसेंस है। लिहाजा, अधिकारियों ने शहर में बर्फ की फैक्ट्रियों का निरीक्षण शुरू कर दिया है। इसमें गोविंदपुरा की तीन फैक्ट्रियों के पास ही लाइसेंस मिला है। राजधानी में गन्ने का रस, नींबू पानी या फिर खाने-पीने की दूसरे चीजों में उपयोग हो रही बर्फ आपकी सेहत के लिए कितनी नुकसानदायक है, इसकी कोई जांच भी नहीं होती। दरअसल, शहर में खाने योग्य बर्फ बनाने की कोई फैक्ट्री ही नहीं है और जो फैक्ट्री हैं उनकी अभी तक जांच भी नहीं की गई है। खाद्य निरीक्षकों ने सात दिन में शहर की फैक्ट्रियों के निरीक्षण का लक्ष्य रखा है, जिसमें रंगीन (नीली और सफेद) बर्फ की बनाने की प्रक्रिया को भी जांचना है।

खाद्य और औद्योगिक उपयोग की बर्फ में अंतर

खाद्य सुरक्षा अधिकारी के मुताबिक खाने वाली और औद्योगिक उपयोग के लिए लगने वाली बर्फ में काफी अंतर होता है। खाने वाली बर्फ को पीने योग्य पानी से तैयार किया जाता है। इसके रखरखाव पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। औद्योगिक बर्फ खाने के लिए इस्तेमाल न हो, इसके लिए औद्योगिक बर्फ का रंग नीला करने का फैसला लिया था।

इसलिए नहीं दिख रही नीली बर्फ

नीली बर्फ को लेकर फैक्ट्री वालों ने अपने तर्क खाद्य सुरक्षा अधिकारियों के सामने रखे हैं। उनके अनुसार खाने की बर्फ के लिए उनकी फैक्ट्री में बनने वाली बर्फ का 15 प्रतिशत उपयोग हो रहा है। जबकि मछली, मांस, सब्जी, दूध, पनीर जैसी खाद्य समाग्री को पहुंचाने के लिए 85 प्रतिशत बर्फ उपयोग होती है। रंग डालने पर दूसरे स्थानों में भेजी जाने वाली खाद्य समाग्री में यह रंग लग जाता हैद्ध इतना ही नहीं भोपाल में तैयार होने वाले मेट्रो ट्रैक की कंक्रीट को ठंडा रखने के लिए अभी 70 प्रतिशत अतिरिक्त बर्फ की सप्लाई हो रही है। ऐसे में बर्फ में नीला रंग डालने पर यह परेशानी बनेगा।

इसलिए नुकसानदेह है अखाद्य बर्फ

इसका उपयोग किसी चीज को बाहर से ठंडा करने के लिए किया जाता है। लिहाजा इस बर्फ की बड़ी सिल्ली बनाई जाती है। कारखानों में साफ लिखा रहता है यह बर्फ खाने योग्य नहीं है। इसके बाद भी इसके टुकड़े कर खान-पान की चीजों में इस्तेमाल किया जा रहा है। अखाद्य बर्फ में उपयोग होने वाले पानी के लिए कोई मापदंड नहीं है। साफ-सफाई का ध्यान भी नहीं रखा जाता।

इन मापदंडों का पालन जरूरी

– खाद्य बर्फ बनाने के लिए खाद्य एवं औषधि प्रशासन से लाइसेंस लेना होता है।

– बर्फ बनाने के लिए आरओ का पानी इस्तेमाल करना होता है।

– कारखाने में साफ-सफाई को विशेष ध्यान रखना होता है। कर्मचारियों का मेडिकल कराना होता है।

– फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट के तहत लैब में जांच कराई जा जा सकती है।

एक नजर में

भोपाल में हर दिन बर्फ की खपत- 150 क्विंटल

अखाद्य बर्फ की फैक्ट्री- 7

बर्फ को रंगीन करने में खर्च- 20 रुपये रोज प्रति कारखाना

जुर्माना- तीन से पांच लाख रुपये तक जुर्माना और छह महीने की सजा हो सकती है नमूने फेल होने पर।

हमें इससे मतलब नहीं कि वो नीला बर्फ बना रहे हैं या नहीं बना रहे हैं। अगर फैक्ट्री में सफेद बर्फ है तो उसकी लैब में जांच होगी। उस जगह को देखा जाएगा कि जहां बर्फ बन रही है। गंदगी मिली तो कार्रवाई होगी। सभी स्थानों से बर्फ के सैंपल भी लिए जाएंगे। वहीं फैक्ट्री को लेकर भी अगले सात दिन में जांच पूरी की जाना है।

– देवेंद्र दुबे, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, भोपाल

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