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पटेरा का सदियों पुराना पीतल-कांसे का काम बंद होने की कगार पर

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कारीगर और मजदूर ढूंढने लगे दूसरे रोजगार,महंगाई और सुविधा न मिलने से बंद हुआ काम

सस्ती धातुओं ने बाजार पर जमाया कब्जा

धीरज जॉनसन

दमोह: सदियों से जिले की पहचान रहा पटेरा तहसील का पीतल-कांसे का काम जिसका जिक्र 1919 में रायबहादुर हीरालाल द्वारा लिखित गजेटियर दमोह-दीपक में भी मिलता है वह अब दम तोड़ता नजर आने लगा है।


किसी समय में बुंदेलखंड क्षेत्र को पीतल-कांसे के बर्तनों की पूर्ति करने वाले वर्तमान पटेरा तहसील में अब सिर्फ एक पीतल के कारीगर और लगभग 3 कांसे का काम करने वाले बचे है जिन पर भी मंहगाई की मार और अन्य किसी भी योजनाओं का लाभ न मिलने से काम बंद होने की कगार पर है पहले शादियों के समय इन बर्तनों को बहुत मांग हुआ करती थी पर अब वह भी कम हो चली है क्योंकि अन्य धातुओं के मर्तबानों ने इसका स्थान ले लिया है।


पीतल का काम करने वाले सुधीर ताम्रकार भईयन बताते है कि उनकी याददाश्त के अनुसार तीसरी पीढ़ी यह काम कर रही है। व्यापारी काम देते है और वे उन्हें पीतल की सामग्री बना कर देते है बदले में मजदूरी ही मिलती है वर्तमान में पीतल लगभग 70 हजार रुपये क्विंटल मिलता है एक क्विंटल का काम करने पर 7-8 हजार रुपये मिलते है पर उसमें भी 20-25 दिन लग जाते है वह भी जब परिवार सहयोग करता है छोटे आइटम बनाने में बहुत समय लगता है।
कच्चा माल छतरपुर,चिचली, उचेहरा से आता है,व्यापारी पर ही निर्भर है अन्य सुविधाएं नहीं है हम तो सिर्फ कारीगर है लागत ज्यादा होने से काम बंद होने लगा है स्टील के बर्तनों ने इस धंधे को तोड़ दिया है
अगर सरकारी सुविधा मिले तो काम बढ़ सकता है,मजबूरी है इसलिये करना पड़ता है।
हम पुराने बर्तन भी ठीक करते है और नया भी बनाते है भट्टी में लगने वाला पत्थर का कोयला लगभग 550 रुपये में एक बोरी तो लकड़ी का कोयला 35-40 रुपये किलो मिलता है इसके साथ एसिड,सुहागा अन्य
औजार भी मंहगे हो चले है,बाकी समयों में गांव गांव में गैस चूल्हा, कुकर रिपेयरिंग का काम गुजर बसर के लिए करना पड़ता है।


यहां अब कांसे का काम करने वाले भी अब सिर्फ तीन परिवार शेष है जो पिछले तीन-चार पीढ़ियों से यह काम कर रहे है शादी की रस्म अदायगी में कांसे के बेलन-थाली की पहले बहुत डिमांड हुआ करती थी अब कम हो गई मथुरा प्रसाद और ऋषि सोनी बताते है कि कांसा अब 1500 रुपये किलो हो गया है भट्टी में भी 2-3 व्यक्तियों की जरूरत होती है,अब कांसे का बाजार भी नहीं बचा है। पहले 65-70 भट्टिया थी पर अब तीन ही बची है
थोक में यह 1500 रुपये किलो जाता है। एक किलो पर 250 रुपये मजदूरी मिलती हैअगर अभी भी इन धातुओं का उपयोग किया जाए तो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है,इस पर ध्यान न देने के कारण यह काम अब लुप्त होता जा रहा है व कारीगर और मजदूर अन्य काम खोजने लगे है।

न्यूज स्रोत:धीरज जॉनसन

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