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राजयोगिनी दादी हृदयमोहिनी की पुण्यतिथि आज, देश भर के सेवा केंद्रों पर दिन भर चलेगी योग-तपस्या

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योग-तपस्या दिवस के रूप में मनाई जाएगी ब्रह्माकुमारीज़ की पूर्व मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी हृदयमोहिनी की  पुण्यतिथि। देश भर के सेवाकेंद्रों पर दिन भर योग साधना की जाएगी।

ब्रह्माकुमारीज़ की पूर्व मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी हृदयमोहिनी की पुण्यतिथि शनिवार को देश-विदेश के सेवा केंद्रों पर योग-तपस्या दिवस के रूप में मनाई जाएगी। दिनभर सेवा केंद्रों पर योग-तपस्या के कार्यक्रम चलेंगे और दादी को पुष्पांजलि अर्पित करेंगे। अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय शांतिवन में दादी की याद में बने अव्यक्त लोक को विशेष फूलों से सजाया जा रहा है। 11 मार्च को सुबह आठ बजे मुख्य प्रशासिका राजयोगिनी दादी रतनमोहिनी सहित अन्य वरिष्ठ पदाधिकारी अव्यक्त लोक में पुष्पांजलि अर्पित कर दादी के जीवन चरित्र पर प्रकाश डालेंगे।

बता दें कि राजयोगिनी दादी हृदयमोहिनी का 11 मार्च 2021 को देवलोकगमन हो गया था। दादी को सभी प्यार से गुलजार दादी भी कहते थे। आपको दिव्य दृष्टि का वरदान प्राप्त था। उन्होंने संस्थान के संस्थापक ब्रह्मा बाबा के अव्यक्त होने के बाद 50 साल तक ब्रह्मा वत्सों के लिए परमात्म संदेशवाहक की भूमिका निभाई। आध्यात्मिक जीवन में कैसे योग-तपस्या की गहराई में जाएं और राजयोग की गहन अनुभूति को कैसे जीवन में शामिल करें आदि बातों को लेकर आपने अव्यक्त वाणियों के माध्यम से जन-जन का मार्गदर्शन किया। जीवन सादगी, सरलता, दिव्यता और पवित्रता की मिसाल था। यही कारण है कि लाखों ब्रह्माकुमार-ब्रह्माकुमारी आपके जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में उतारने के प्रयास करते हैं।

दादी जी की जीवन यात्रा पर एक नजर

दादी हृदयमोहिनी के बचपन का नाम शोभा था। उनका जन्म वर्ष 1928 में कराची में हुआ था। वो जब 8 वर्ष की थीं तब संस्था के साकार संस्थापक ब्रह्मा बाबा द्वारा खोले गए ओम निवास बोर्डिंग स्कूल में दाखिला लिया। यहां उन्होंने चौथी कक्षा तक पढ़ाई की। स्कूल में बाबा और मम्मा (संस्थान की प्रथम मुख्य प्रशासिका) के स्नेह, प्यार और दुलार से प्रभावित होकर अपना जीवन उनके समान बनाने की निश्चय किया। आपकी लौकिक मां की भक्ति भाव से परिपूर्ण थीं।

मात्र चौथी कक्षा तक की थी पढ़ाई

दादी हृदयमोहिनी ने मात्र चौथी कक्षा तक ही पढ़ाई की थी, लेकिन तीक्ष्ण बुद्धि होने से जब भी ध्यान में बैठतीं तो शुरुआत के समय से ही दिव्य अनुभूतियां होने लगीं। यहां तक कि उनको कई बार ध्यान के दौरान दिव्य आत्माओं के साक्षात्कार हुए, जिनका जिक्र उन्होंने ध्यान के बाद ब्रह्मा बाबा और अपनी साथी बहनों से भी किया।

सादगी, सरलता और सौम्यता की थीं मिसाल

दादी का पूरा जीवन सादगी, सरलता और सौम्यता की मिसाल रहा। बचपन से ही विशेष योग-साधना के चलते दादी का व्यक्तित्व इतना दिव्य हो गया था कि उनके संपर्क में आने वाले लोगों को उनकी तपस्या और साधना की अनुभूति होती थी। उनके चेहरे पर तेज का आभामंडल उनकी तपस्या की कहानीं साफ बयां करता था।

 

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