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नैना के बहाने टेलिविज़न चैनलों का काला सच उजागर करते संजीव पालीवाल को सलाम !

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आलेख

राजेश बदल

बचपन से ही मुझे पढ़ने का शौक रहा है। राम चरित मानस से लेकर महाभारत और रामचंद्र गुहा से लेकर मस्तराम कपूर तक की किताबें।गांधी से लेकर नेहरू और टैगोर से लेकर शेक्सपियर तक। वे भी ,जो किसी ज़माने में बंबई वी टी के इर्द गिर्द फुटपाथ पर मिला करती थीं और बनारस से होली पर निकलने वाले विशेषांक भी।चूँकि रामचरित मानस तो साल भर रोज़ पाँच दोहे पढ़े जाते थे और वर्षों तक पढ़े गए। लेकिन कुछ ग्रन्थ या पुस्तकें ही याद आती हैं ,जो कई कई बार पढ़ी गईं। इनमें गीतांजलि ,गुनाहों का देवता ,मृगनयनी ,चित्रलेखा , वे आँखें ,तुम फिर आना तथा इसी तरह की क़रीब एक दर्ज़न किताबें होंगीं ,जिनको पढ़ा और कई बार पढ़ा। हालाँकि किशोरावस्था में जासूसी उपन्यास भी कम नहीं पढ़े।इब्ने सफ़ी ,बी ए ,कर्नल रंजीत से लेकर जेम्स हेडली चेइज़ का -आय वुड रादर स्टे पुअर जैसा घनघोर जासूसी नॉवेल तक। उनके अनेक पात्र जैसे कर्नल विनोद ,कैप्टन हामिद ,क़ासिम , सुधीर ,डोरा और सोनिया आज भी मेरे ज़ेहन में अक्सर ज़िंदा हो जाते हैं। कुछ किरदार दिलों में धड़कते भी हैं। मेरा ख़्याल है कि वह उमर होती ही ऐसी है।मैं कह सकता हूँ कि चालीस -पचास साल पहले पढ़े जासूसी उपन्यासों की तरह कोई उपन्यास बाद में पढ़ने को नहीं मिला।

बीते दिनों मित्र संजीव पालीवाल का जासूसी उपन्यास नैना पढ़ने को मिला। बेहद रोमांचक ,सनसनीखेज़ और आख़िरी पन्ने तक बांधकर रखने वाला। दावा कर सकता हूँ कि पिछले चार दशकों में ऐसा कोई जासूसी उपन्यास कम से कम मैंने तो नहीं पढ़ा। यह एक मर्डर मिस्ट्री है। भारत के सर्वाधिक लोकप्रिय टीवी चैनल की एक खूबसूरत स्टार एंकर नैना की हत्या सुबह की सैर के वक़्त हो जाती है।इसके बाद कहानी टीवी चैनल के कामकाज ,उनमें काम करने वालों के अंतरंग क़िस्सों के इर्द गिर्द घूमती है और संदेह की सुई एक के बाद एक पात्रों पर आकर रूकती जाती है।एक घरेलू गृहणी के तेज़ तर्राट ,महत्वाकांक्षी और उन्मुक्त यौन संबंधों के ज़रिए करियर आगे बढ़ाने वाली युवती में बदलने की कहानी पल पल रहस्य और उत्सुकता जगाती है।
चूँकि मैंने भी अपनी छियालीस साल की पत्रकारिता में पैंतीस बरस टेलिविज़न की दुनिया में बिताए हैं इसलिए एक एक लफ्ज़ मेरी यादों में एक फ़िल्म की तरह चलता रहा। कहाँ हम लोगों ने मुल्क़ के पहले चैनल की शुरुआत की थी। उन दिनों के मापदंड कैसे थे। स्वस्थ पत्रकारिता के कीर्तिमान रचे गए और कैसे चैनल इंडस्ट्री आज एक स्याह और भयानक अंधी सुरंग में समा गई है। पत्रकारिता के सरोकार गुम हो चुके हैं।नैना मौजूदा दौर का एक दस्तावेज़ है ,जिसे संजीव ने अदभुत क़िस्सागोई के ज़रिए हमारे सामने पेश किया है। इसमें शॉर्ट कट सक्सेस के फार्मूले ,प्यार की कारोबारी परिभाषाएँ ,बिखरते परिवार, रिश्तों की टूटन , जिस्म और भावना के घिनौने रिश्ते – सब कुछ आप इसमें पाएँगे। मुझे नहीं लगता कि भाई संजीव पालीवाल ने इसमें चैनलों की अंतर कथाओं का कोई अतिरंजित रूप पेश किया है। बहुत कुछ तो मेरे सामने घटता रहा है।कह सकता हूँ कि संजीव ने कमाल का लिखा है।मैंने कहानियां कम ही लिखी हैं। शायद चार या पांच। एक कहानी सत्रह साल पहले राजेंद्र यादव जी के अनुरोध पर हंस के लिए लिखी थी – उसका लौटना। हंस के उस विशेषांक में टीवी चैनलों के भीतर की ऐसी ही बदशक्ल होती दुनिया पर टीवी पत्रकारों ने कहानियाँ लिखी थीं। नैना पढ़ते हुए कई बार उस विशेषांक की याद आई।
बहरहाल ! इस चैनल इंडस्ट्री की जब तस्वीर बदल रही थी तो मैंने लगभग अठारह साल पहले एक तुक बंदी लिखी थी। उसकी कुछ पंक्तियाँ अभी तक याद हैं –
ये है भट्टी ,हम हैं ईंधन ,बाक़ी सब कुछ जन गण मन / न कुछ तेरा ,न कुछ मेरा ,बीवी बच्चे जन गण मन /
काम किए जा,काम किए जा और झौंक दे तन मन धन /क्योंकि चैनल दौड़ रहा है ,इसीलिए सब जन गण मन /
ढूँढ़ते रह जाओगे ख़बरें ,बरस रहे हैं विज्ञापन / बनी ज़िंदगी एक मशीन ,चैनल बन गया नंबर वन /
और भी इससे आगे लंबी रचना है। फिर कभी उसके परदे के पीछे की कहानी सुनाऊँगा. फिलवक़्त तो यही कहूँगा कि नैना आज की टीवी इंडस्ट्री के सच को उजागर करने वाला नायाब शाहकार है। जो भी इस पेशे से जुड़े हैं ,उनके लिए भी संग्रहणीय है।
किताबों की इस श्रृंखला में अगली किताबें डॉक्टर मुकेश कुमार की मीडिया मंडी पर और यशवंत व्यास की पुस्तक गुलज़ार पर।

लेखक देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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