दमोह से धीरज जॉनसन की रिपोर्ट
जिंदगी जीने के लिए इंसान कई तरह से संघर्ष भी करता है और अपना व अपने परिवार का भरण पोषण करता है भले ही इसके लिए उसे कितने ही खतरों का सामना क्यों न करना पड़े।

इन दिनों शहर के समीप सागर-दमोह-बटियागढ़ बाईपास के निकट कुछ टेंट लगे हुए दिखाई देते है जिन्हे धूप और बारिश से बचाव के लिए प्लास्टिक से ढांका गया है अस्थाई रूप से ठहरे हुए ये लोग अन्य जिले से यहां आकर रुके हुए है और टीन के डिब्बे को काट-काट कर घरेलू उपयोग के सूपे, छलनी,कचरा दानी बना कर गांव-गांव में बेचते है और परिवार का भरण पोषण करते है। बारिश के समय भी यही छत इनका बचाव करती है।

साल के आठ महीने जाते है अलग अलग स्थानों पर
चार महीने घर पर रहते है पर वहां कोई काम नहीं है बारिश के बाद करीब आठ महीने प्रदेश के विभिन्न इलाकों में जाकर रुकते है और यह सामान बना कर बेचते है यह कहना था भीमा और लक्ष्मण का,जो टीन के खाली कनस्तर को काट काट कर सूपे और अन्य सामग्री बना रहे थे,इनके साथ परिवार के करीब 12 अन्य सदस्य भी उपस्थित थे।

खाली मैदान में लगाते है टेंट
शहर या बस्ती से बाहर की तरफ टेंट लगाकर रहने वाले ये लोग सारा काम मिल कर करते है आस पास से छोटे पत्थर लाकर चूल्हा बना कर खाना तैयार होता है और परिवार के छोटे सदस्य भी इसमें सहयोग करते है जरूरत की सारी सामग्री दोपहिया वाहन से लाई जाती है जिसमें आवश्यकता के अनुसार एंगिल भी इन्होंने लगाए है, अगर नगर की दूरी ज्यादा है तो बस से भी यात्रा करते है।

टेंट में मंदिर:अशुद्ध शक्तियों से बचाव
यहां बने टेंट में एक तरफ छोटा मंदिर भी दिखाई देता है।इनके बुजुर्ग रामा पाली ने बताया कि वे तेंदूखेड़ा से है और बाकी जो रिश्तेदार यहां है वे बरमान से है। हम लोग अलग अलग स्थानों पर जाते है इसलिए अशुद्ध शक्तियों से बचने और सुरक्षित रहने के लिए पूजा आराधना भी करते है। तीन साल में एक बार बड़ी पूजा बरमान में करते है।

स्कूल नहीं जाते है बच्चें
इनके टेंट में गृहस्थ की सामग्री के साथ मुर्गी,सुरक्षा के लिए कुत्ता और इनके इर्द गिर्द छोटे बच्चे भी खेलते हुए दिखाई देते है,जब बच्चों की शिक्षा के बारे में जानकारी ली गई तो इनका कहना था कि वे स्कूल नहीं जाते है चूंकि साल भर विभिन्न इलाकों में जाना पड़ता है तो परिवार भी साथ रहता है इसलिए बच्चे पढ़ाई नहीं करते है।
बहरहाल लोगों के जीवन की विविध झलकिया सामने आती रहती है पर आज भी कुछ लोग ऐसे है जो वजूद की तलाश में भटक रहे है,जिनके हुनर का इस्तेमाल उनके स्थानीय निवास स्थल पर उचित व्यवस्था कर भी किया जा सकता है ।