पूर्वजों की कला और प्रकृति के खजाने को पिकनिक संस्कृति से खतरा
रिपोर्ट डॉ. धीरज जॉनसन दमोह
गधेरी नदी की रमणीय घाटी में स्थित आबचंद का रक्षित वन क्षेत्र अपने प्राकृतिक सौंदर्य और प्रागैतिहासिक शैलचित्रों के लिए विशेष पहचान रखता है।
सागर जिले की आबचंद गुफाएं, दमोह से लगभग 45 किलोमीटर तथा सागर से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित यह स्थल जंगल, पहाड़ियों और शीतल वातावरण के बीच प्राचीन मानव सभ्यता की अनमोल धरोहर को संजोए हुए है। इसकी तुलना छत्तीसगढ़ के सिंघनपुर तथा मध्यप्रदेश के आदमगढ़ के शैलचित्र स्थलों से भी की जाती रही है।

गुफाओं की दीवारों पर दर्जनों रंगीन शैलचित्र अंकित हैं, जो प्रागैतिहासिक मानव जीवन की गतिविधियों का जीवंत चित्रण प्रस्तुत करते हैं। इनमें शिकार के दृश्य, धनुष-बाण, बर्छा एवं अन्य हथियारों का उपयोग करते मानव समूह, विभिन्न वन्य जीवों की आकृतियां तथा दो शेरों के बीच संघर्ष का रोचक दृश्य भी दिखाई देता है। कुछ चित्रों से यह भी अनुमान लगाया जाता है कि आदिम मानव गीत, संगीत और नृत्य के माध्यम से मनोरंजन करता रहा होगा।

इन चित्रों में लाल,हल्के पीले, सफेद रंगों का उपयोग किया गया है। कई स्थानों पर एक ही आकृति पर विभिन्न रंगों की परतें स्पष्ट दिखाई देती हैं, जो अलग-अलग कालखंडों में चित्रांकन होने की संभावना को दर्शाती हैं।
प्राकृतिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र अत्यंत आकर्षक है। जंगल में पक्षियों का कलरव, हरियाली और शीतल वातावरण प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

हालांकि इस ऐतिहासिक धरोहर पर मानवीय लापरवाही का खतरा मंडरा रहा है। गुफाओं के उन हिस्सों में, जहां बड़ी संख्या में शैलचित्र मौजूद हैं, अस्थायी चूल्हे बने हुए दिखाई देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि लोग यहां पिकनिक मनाने पहुंचते हैं और भोजन भी पकाते हैं। चूल्हों के धुएं और कालिख के कारण कई शैलचित्र धूमिल होते जा रहे हैं। स्थल पर अधजली लकड़ियां, प्लास्टिक की बोतलें और अन्य कचरा भी देखा जा सकता है, जो इस प्राचीन विरासत के संरक्षण पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

स्थानीय निवासी श्याम बिहारी दुबे (गढ़ाकोटा) का कहना है कि यह क्षेत्र ऐतिहासिक महत्व की अमूल्य धरोहर है, जिसे देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की लापरवाही के कारण इस विरासत को नुकसान पहुंच रहा है। थोड़े से मनोरंजन के लिए लोग अपने पूर्वजों की कला और इतिहास को नष्ट कर रहे हैं। गुफा क्षेत्र में भोजन पकाने, चूल्हे जलाने और प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया जाए तथा नियमित निगरानी की व्यवस्था की जाए, ताकि यह प्राचीन धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सके।

पुरातत्व और प्रकृति का अद्भुत संगम माने जाने वाले आबचंद के शैलचित्र आज संरक्षण की प्रतीक्षा कर रहे हैं। समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो हजारों वर्षों से सुरक्षित यह अमूल्य विरासत धीरे-धीरे नष्ट हो सकती है।