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विदिशा की विरासत का जीवंत दर्शन : हेरिटेज वॉक में उजागर हुए इतिहास के अनमोल रत्न

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विदिशा । गौरवशाली विरासत को करीब से जानने और समझने के उद्देश्य से आयोजित हेरिटेज वॉक में इतिहास प्रेमियों एवं विरासत संरक्षण से जुड़े प्रबुद्धजनों ने सहभागिता की। इस विशेष भ्रमण का नेतृत्व प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. अहमद अली ने किया। कार्यक्रम में विरासत समूह के अध्यक्ष श्री गोविंद देवलिया, माधव सिंह कामरेड, ब्रजकिशोर गोयल, मनमोहन बंसल, कैलाश अग्रवाल, राजकुमार शर्मा, प्रवीन शर्मा, सुरेंद्र राठौर एवं वास्तु विशेषज्ञ आचार्य पंडित शिव कुमार तिवारी प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।
चितोरिया ग्राम : परमार काल की कला का साक्षात्कार
हेरिटेज वॉक की शुरुआत चितोरिया ग्राम से हुई, जहां परमार कालीन शिव एवं विष्णु मंदिरों के अवशेषों का अवलोकन किया गया। यहां स्थित अर्धनारीश्वर शिव (उमा-महेश्वर) की प्रतिमा विशेष आकर्षण का केंद्र रही। डॉ. अहमद अली ने बताया कि यह प्रतिमा तत्कालीन शिल्पकला की उत्कृष्ट मिसाल है, जिसमें शिव और शक्ति के अद्भुत समन्वय का दर्शन होता है।
रावण ग्राम : गुप्तकालीन विरासत का रहस्य
इसके पश्चात दल रावण ग्राम पहुंचा, जहां स्थित चतुर्मुखी विशाल रावण प्रतिमा का अध्ययन किया गया। डॉ. अहमद अली ने जानकारी दी कि यह प्रतिमा संभवतः गुप्तकाल (चौथी-पांचवीं शताब्दी) की हो सकती है। उन्होंने इसके ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि यह प्रतिमा उस काल की धार्मिक आस्था और शिल्प परंपरा को दर्शाती है।

रावण गांव की अद्भुत प्रतिमा : शिल्पकला और आस्था का विलक्षण संगम
विदिशा जिले के रावण गांव में स्थित रावण की विशाल प्रतिमा आज भी इतिहासप्रेमियों और श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यह प्रतिमा अपनी भव्यता, दुर्लभ संरचना और अनोखी शिल्प विशेषताओं के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
यह प्रतिमा लगभग 12 फीट लंबी एवं 3 फीट चौड़ी है, जो इसे क्षेत्र की सबसे विशाल प्रतिमाओं में सम्मिलित करती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रतिमा के सामने और पीछे दोनों ओर विशाल मुख बने हुए हैं। इसके अतिरिक्त दोनों साइड में भी दो प्रमुख मुख अंकित हैं, जिससे यह प्रतिमा चतुर्मुखी स्वरूप में दिखाई देती है।
प्रतिमा के शीर्ष भाग (सिर) पर नंदी भगवान शिव, माता पार्वती तथा सिंह की आकृतियाँ अत्यंत सुंदर ढंग से उकेरी गई हैं। यह दर्शाता है कि तत्कालीन कलाकारों ने धार्मिक प्रतीकों का गहरा ज्ञान रखते हुए इस शिल्प का निर्माण किया था।
कमर पर प्रतिमा में व्याघ्रचर्म (बाघ की खाल) अंकित है, जो शैव परंपरा और तपस्वी जीवन का प्रतीक माना जाता है। वहीं दोनों हाथों में प्रतिमा द्वारा हिरण को पकड़े हुए दर्शाया गया है, जो शक्ति, नियंत्रण और वन्य जीवन से जुड़ी प्रतीकात्मकता को दर्शाता है।
विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतिमा संभवतः गुप्तकाल (चौथी–पांचवीं शताब्दी) की हो सकती है। इसकी संरचना और अलंकरण उस काल की उन्नत शिल्पकला का प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
हेरिटेज वॉक के दौरान पुरातत्वविद् डॉ. अहमद अली ने इस प्रतिमा के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि मध्य भारत की प्राचीन कला परंपरा का सशक्त उदाहरण भी है।
रावण गांव की यह प्रतिमा आज संरक्षण की मांग कर रही है। विरासत प्रेमियों का कहना है कि यदि शासन और समाज मिलकर प्रयास करें, तो यह स्थल एक प्रमुख पर्यटन एवं शोध केंद्र के रूप में विकसित हो सकता है।यह प्रतिमा वास्तव में विदिशा अंचल की सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य रत्न है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने का कार्य करती

बूदे की पहाड़ी : प्राचीन बौद्ध स्तूप के अवशेष
हेरिटेज वॉक का अगला पड़ाव बूदे की पहाड़ी रहा, जहां एक प्राचीन स्तूप के खंडहर देखे गए। विशेषज्ञों ने बताया कि यह स्तूप कभी बुद्ध सर्किल का हिस्सा रहा होगा। वर्तमान में यह संरचना जर्जर अवस्था में है, फिर भी यह क्षेत्र बौद्ध कालीन इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है।
विरासत संरक्षण का संदेश
हेरिटेज वॉक के दौरान सभी प्रतिभागियों ने एक स्वर में विदिशा की ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण और प्रचार-प्रसार की आवश्यकता पर जोर दिया। श्री गोविंद देवलिया ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम युवाओं को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने का सशक्त माध्यम हैं।यह हेरिटेज वॉक न केवल इतिहास की परतों को खोलने वाला अनुभव रहा, बल्कि विदिशा की सांस्कृतिक विरासत को संजोने की प्रेरणा भी दे गया।

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