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जन्मदिन पर विशेष::जनसंघ के दीपक – डॉ शेजवार

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हरीश मिश्र

परिवार के बुज़ुर्ग दिशा देते हैं, समाज में मुखिया मर्यादा तय करता है और राजनीति में वही नेतृत्व योग्य होता है जो सत्ता नहीं, साधना करता है। राजनीति यदि केवल पद-प्राप्ति की कला होती, तो वह क्षणभंगुर होती लेकिन जब वह तपस्या बन जाए, तो व्यक्तित्व विश्वविद्यालय हो जाता है। डॉ. गौरीशंकर शेजवार ऐसे ही एक जीवंत विश्वविद्यालय हैं, जहां न डिग्रियां दी जाती हैं, न प्रमाणपत्र, बल्कि संस्कार, संकल्प और संघर्ष के गुण सिखाए जाते हैं।
आपाधापी और अवसरवाद से भरे आज के राजनीतिक वातावरण में डॉ. शेजवार एक ठहराव हैं, एक वैचारिक विराम, जहाँ युवा नेता और कार्यकर्ता स्वयं को पहचानते हैं। वे जनसंघ के उन प्रारंभिक दीपकों में से हैं, जो हवा के हर थपेडों के बावजूद बुझने के बजाय अखंड ज्योति बन गए। उनकी राजनीति प्रचार की नहीं, प्रभाव की है, मंच की नहीं, मन की है।
उनकी सरलता दिखावटी नहीं, साधना से उपजी हुई है। संगठन के प्रति उनका समर्पण कोई नारा नहीं, जीवन-शैली है। वे न केवल आदर्श कार्यकर्ता हैं बल्कि कुशल प्रशासक भी हैं । न थकना उनकी आदत नहीं, स्वभाव है। वे चलते हैं, रुकते नहीं; बोलते हैं, लेकिन अनावश्यक नहीं। उनकी बातें इसलिए मन को छूती हैं क्योंकि वे अनुभव से उपजी होती हैं, अभ्यास से नहीं।
डॉ. शेजवार राजनीति, धर्म, समाज और प्रकृति के ज्ञाता हैं। बागवानी उन्हें प्रिय है। उन्होंने भंवर में फंसे कार्यकर्ताओं को दिशा दी, चरणों में पड़े युवाओं को जनसेवा का पाठ सिखाया। कुछ अशिक्षित युवाओं को इस तरह तराशा कि वे आज शिक्षित राजनेताओं, दल बदल कर आए कार्यकर्ताओं को भी आत्मविश्वास से संबोधित कर रहे हैं। वे हर कार्यकर्ता की क्षमता पहचानते हैं और उसी अनुरूप उससे काम लेते हैं, यही संगठन-शास्त्र है।
यह सच है कि उनके वटवृक्ष पर बैठे कुछ परिंदों ने यूकेलिप्टस पर घोंसले बना लिए, लेकिन वे परिंदे आज भी ब्रह्म मुहूर्त में अपने राजनीतिक आचार्य को नमन करना नहीं भूलते। यह श्रद्धा पद की नहीं, प्रभाव की है।
डॉ. शेजवार मूल्यों की राजनीति करते हैं, बिना शोर, बिना समझौते। उनकी ठसक अहंकार नहीं, आत्मविश्वास है। वे बड़ी से बड़ी बात व्यंग्य में कह जाते हैं। जनसंघ से भाजपा तक के सफ़र में उन्होंने संगठन की हर ऋतु देखी है—वसंत भी, पतझड़ भी। उन्होंने कभी पद का घमंड नहीं किया, लेकिन एक कठोर और न्यायप्रिय प्रशासक के रूप में अपनी पहचान अवश्य बनाई।
वे राजनीति के ऐसे पुरोहित हैं, जो अनुष्ठान तभी करते हैं जब कार्यसिद्धि संभव हो; अन्यथा स्पष्ट रूप से “न” कह देते हैं। वे सच को सामने कहते हैं और जानते हैं कि राजनीति के हाट में सच की दुकान पर भीड़ कम होती है। फिर भी वे झुकते नहीं, क्योंकि कुछ लोग झुकने के लिए नहीं, उदाहरण बनने के लिए होते हैं।
डॉ. शेजवार उन सिद्ध पुरुषों में हैं, जिन्हें शब्दों में बांधना कठिन है। वे लिखे नहीं जाते, वे महसूस किए जाते हैं और जिन्हें समझ में आ जाएं, उनके लिए राजनीति केवल सत्ता नहीं, साधना बन जाती है।

– लेखक स्वतंत्र पत्रकार हे।

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