Let’s travel together.

राष्ट्रीय पर्व पर अतिथि विद्वानों की मजदूरी काटना  राष्ट्रप्रेम का अपमान

0 147

विद्वानों ने कहा राष्ट्रीय पर्व,त्यौहारों में कटता है मानदेय,क्या संविधान हम पर नहीं होता लागू
भोपाल।भारत के स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस केवल तिथियां नहीं हैं -ये उन बलिदानों का स्मरण हैं, जिनकी बदौलत हमें यह आज़ादी मिली। इन दिनों पूरे देश में देशभक्ति के गीत गाए जाते हैं, ध्वज फहराया जाता है और संविधान की गरिमा को नमन किया जाता है।

परंतु इसी देश में, इन्हीं दिनों, अतिथि विद्वान — जो देश के युवा मस्तिष्क को राष्ट्रप्रेम, संविधान और उसके मूल्यों की शिक्षा देते हैं — आर्थिक अपमान झेलते हैं।राष्ट्रीय पर्व पर उनकी मजदूरी काट ली जाती है।
विडंबना की पराकाष्ठा है कि एक ओर, हम स्कूलों और कॉलेजों में यह सिखाते हैं कि संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है।दूसरी ओर, अतिथि विद्वानों को समानता और स्वतंत्रता का वही अधिकार नहीं दिया जाता जिसे वे अपने विद्यार्थियों को पढ़ाते हैं।

अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 (स्वतंत्रता का अधिकार) केवल किताबों में सजावट बनकर रह गए हैं।

सवाल जो चुभते हैं-क्या अतिथि विद्वान भारत के नागरिक नहीं?
क्या राष्ट्रप्रेम दिखाने की कीमत मजदूरी कटौती है?
क्या संविधान पढ़ाने वाले शिक्षकों को ही संविधान के अधिकारों से वंचित करना न्याय है?

इनका कहना हे 
राष्ट्रीय पर्व पर अपेक्षा रहती है कि हम कॉलेज में उपस्थित रहें, ध्वजारोहण करें, कार्यक्रमों में भाग लें और विद्यार्थियों को प्रेरित करें। हम यह सब करते भी हैं — निष्ठा से, गर्व से।लेकिन इसके बदले हमें मिलता है मानदेय कटौती।यह न केवल आर्थिक रूप से क्षति है, बल्कि हमारे आत्मसम्मान और गरिमा को भी ठेस पहुँचाता है।

डॉ आशीष पाण्डेय,मीडिया प्रभारी महासंघ

अतिथि विद्वान महासंघ, सरकार और उच्च शिक्षा विभाग से मांग करता है कि
1. राष्ट्रीय पर्व पर मानदेय कटौती की प्रथा तुरंत समाप्त की जाए।
2. इन दिनों की उपस्थिति को पूर्ण कार्य दिवस के रूप में मान्यता दी जाए।
3. अतिथि विद्वानों को संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप समान सम्मान और आर्थिक सुरक्षा दी जाए।
डॉ अविनाश मिश्रा,उपाध्यक्ष महासंघ

यह केवल अतिथि विद्वानों की लड़ाई नहीं यह उन मूल्यों की रक्षा की लड़ाई है जिन पर हमारा राष्ट्र खड़ा है — समानता, स्वतंत्रता और न्याय।अगर हम, जो संविधान पढ़ाते हैं, उसके अधिकारों से वंचित रहेंगे, तो यह देश के लोकतांत्रिक ढांचे पर धब्बा है।
राष्ट्रप्रेम को सज़ा मत बनाइए।
शिक्षकों का सम्मान कीजिए क्योंकि एक राष्ट्र की पहचान उसकी सेना और उसके शिक्षक से होती है।
डॉ जेपीएस चौहान,महासचिव अतिथि विद्वान महासंघ

Leave A Reply

Your email address will not be published.

कायस्थ महिला प्रकोष्ठ का हरियाली तीज महोत्सव, अंताक्षरी और म्यूजिकल चेयर में महिलाओं ने दिखाई प्रतिभा     |     सप्रे संग्रहालय की प्रचुर संदर्भ संपदा देख कर यू.के. हिंदी समिति अभिभूत     |     मैहर से मिली लाड़ली बहनों को नैहर की नेग,मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने सवा करोड़ से अधिक लाड़ली बहनों को अंतरित किए 2148.30 करोड़ रुपए     |     सीहोर जिले में दर्दनाक हादसा: पानी में डूबने से तीन मासूमों की मौत     |     सही दिशा का प्रसाद ही सही दशा का प्रसाद बनता है-मुनि श्री अभय सागर महाराज     |     माता वैष्णोदेवी यात्रा पर भक्तों का 22 सदस्यों का जत्था हुआ रवाना     |     पशुओं के प्रति क्रूरता से परिवहन करने वाले 02 आरोपी गिरफ्तार     |     भोपाल-विदिशा हाईवे-18 पर एक सप्ताह में 10 से ज्यादा मवेशियों की मौत, गौशालाओं के बावजूद नहीं थम रहा हादसों का सिलसिला     |     भोपाल-विदिशा हाईवे-18 पर गड्ढों का जाल, हादसों का बढ़ा खतरा     |     सूखा करार मे बाहरी महिलाओं से देह व्यापार से नाराज ग्रामीणों ने थाना प्रभारी को सौंपा आवेदन     |    

Don`t copy text!
पत्रकार बंधु भारत के किसी भी क्षेत्र से जुड़ने के लिए इस नम्बर पर सम्पर्क करें- 9425036811