गौरव शर्मा आरोन गुना
आरोन के सनातन धर्म मंडल प्रांगण में श्री राधा माधव सत्संग समिति द्वारा आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ उमड़ी। इस पावन अवसर पर भागवताचार्य पंडित रामदयाल शास्त्री जी ने भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का रसपूर्ण वर्णन किया। विशेष रूप से महारास, गोपी-उद्धव संवाद तथा रुक्मिणी-कृष्ण विवाह के प्रसंगों ने भक्तों को भक्ति और प्रेम के सागर में डुबो दिया।
शास्त्री जी ने सबसे पहले महारास का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने बताया कि श्रीकृष्ण ने ब्रज की पवित्र रज में गोपियों के साथ दिव्य रासलीला रचाई। यह लीला मात्र एक नृत्य नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के प्रेम का अद्भुत संगम था। गोपियां श्रीकृष्ण के प्रेम में इतनी तल्लीन थीं कि उन्होंने सांसारिक बंधनों को त्यागकर केवल भगवान को ही अपना सर्वस्व मान लिया। इस लीला के माध्यम से श्रीकृष्ण ने यह सिद्ध किया कि सच्ची भक्ति में कोई भी भेद नहीं होता, केवल समर्पण ही सर्वोपरि होता है।
इसके बाद गोपी-उद्धव संवाद का मार्मिक वर्णन हुआ। उद्धव, जो श्रीकृष्ण के प्रिय सखा और ज्ञानी थे, जब ब्रज आए तो उन्होंने गोपियों को ज्ञान-मार्ग की शिक्षा देने का प्रयास किया। लेकिन गोपियों ने कहा कि हमें किसी शास्त्रज्ञान की आवश्यकता नहीं, हमारा हृदय केवल श्रीकृष्ण के प्रेम में मग्न है। यह सुनकर उद्धव स्वयं भी भक्ति के इस अद्भुत रूप को देखकर द्रवित हो गए और समझ गए कि प्रेम ही सर्वोच्च साधना है। इस प्रसंग ने उपस्थित भक्तों को गहरे भाव-विभोर कर दिया।
इसके पश्चात पंडित रामदयाल शास्त्री जी ने भगवान श्रीकृष्ण और देवी रुक्मिणी के विवाह का मंगलमय वर्णन किया। जब रुक्मिणी का विवाह शिशुपाल से तय किया गया, तब उन्होंने श्रीकृष्ण को एक प्रेम-पत्र भेजा और अपनी व्यथा व्यक्त की। भगवान श्रीकृष्ण ने उनकी पुकार को सुना और विवाह मंडप से रुक्मिणी का हरण कर लिया। इस विवाह का वर्णन होते ही पंडाल में भक्तों ने “श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह की जय” के जयकारे लगाए
पूरे कथा आयोजन में भक्ति, प्रेम और श्रद्धा की दिव्य धारा प्रवाहित हुई। अंत में आरती और प्रसाद वितरण किया गया