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होली मानने के पारंपरिक तरीके:राख,गोबर और फाग का महत्व

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रिपोर्ट:धीरज जॉनसन, दमोह

दमोह:बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला रंगो का त्यौहार होली बहुत धूमधाम से मनाया जाता है जिसमें पहले दिन होलिका दहन और दूसरे दिन धुलेड़ी मनाई जाती है जिसमें रंग, अबीर, गुलाल एक दूसरे को लगाए जाते है ढोल बजाकर गीत गाकर लोग एक दूसरे के घर जाकर रंग लगाते और शिकवे खत्म करते है इस मौसम में खेतों में फसलें भी खिल उठती है।

इस प्राचीन त्यौहार को मानने के तरीके विभिन्न स्थानों पर अलग अलग भी होते थे परंतु आधुनिक समय में कुछ परंपराए धूमिल हो चुकी है जिन्हें लोग आज भी याद करते है।


फसल को मानते थे साल भर का सौभाग्य

दमोह जिले के ग्राम सिमरिया – समदई से मोहन सिंह बताते है कि आदिवासी समाज में इस त्यौहार को पहले बहुत ही अलग तरीके से मनाया जाता था परंतु अब पुरानी परंपरा दिखाई नहीं देती।मोहन बताते है कि पूर्व में होलिका जलाने से पहले सारे गांव से लकड़ियां,उपले ढबुआ एकत्रित करते थे और किसी के भी घर के सामने जो मिल जाता था उसे उठा लेते थे पर कोई बुरा नहीं मानता था।


इसके बाद सभी अपने घर से परेना (लोहे और बांस का डंडा जो जुताई के समय बैलों को हांकने, हल और बखर को साफ करने में उपयोग होता है ) में गेहूं और चना के ढेर बांध कर लाते थे उसे होलिका के साथ जलाते थे और पूजा के साथ उसे सालभर का सौभाग्य मान कर अधजला घर लेकर जाते थे, और फसल के जो दाने आग में भुंज जाते थे उसे धागे की माला में पिरो देते थे और बुरी नजर,बीमारी इत्यादि को दूर करने के लिए बच्चों को पहना देते थे । दूसरे दिन होलिका की राख से खेरमाता,सिद्ध बाबा,दाने बाबा,भैंसासुर को तिलक लगाते थे और साल भर सुरक्षित रहने की कामना करते थे। इसके बाद राख का टीका लगाते और इसके घोल को एक दूसरे पर छिड़कते थे।

घर घर जाते दुख बांटने

इसके बाद गांव में जो गोबर होता था उसे एक दूसरे को लगाते थे और गांव में जहां भी साल भर में जिस जिस के घर में परिजनों की मृत्यु हुई हो उनका दुख बांटने जाते थे और उनके ललाट पर गोबर लगाते थे और दुख के फाग गाए जाते थे, जिसके बोल कुछ इस तरह रहते थे ” बाखर सूनी लगे बिन भइयों के, जब से भए चलान,कहां गए हो महाराजा,राजपाट, धन-धाम, छोड़ गए सकल समाजै , बारे बारे दो कुंअर,सुंदर श्याम शरीर, तुम बिन जिया तरस रहे, फिर कौन बांधवे धीर …..मोहन बताते है गांव के लोग गोबर की पूजा करते थे और उसे इकठ्ठा करके रखते थे जिसे एक दूसरे को लगाते थे रंगों का इस्तेमाल नहीं होता था।

 

गांव के प्रत्येक घर की गंदगी के लिए एक छोटा कुंड बना होता है जहां सारी गंदगी जमा होती है जिसे स्थानीय बोली में नरदा भी कहते है उस गंदगी को बाल्टी से भर भर कर एक दूसरे पर डालते थे परंतु कोई बुरा नहीं मानता था।मृदंग, नगड़िया, मजीरा,झूला, तारे के साथ नृत्य भी किया जाता था परंतु अब ये परंपरा धीरे धीरे कम हो रही है।जिले अंतर्गत कुछ ऐसे क्षेत्र भी है जहां आदिवासी समाज पुरानी परम्पराओं से होली का त्यौहार मनाता है।

जिले के ग्राम सर्रा और इसके आस पास आदिवासी समाज होलिका दहन से लेकर पर्व समाप्त होने तक पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है।होली के दिन से वह उन घरों में जाता है जहां वर्ष भर में मृत्यु हुई हो वहां फाग नृत्य से दुखित परिवार के दुःख में शामिल होता है।

गाते है गाए

होलिका दहन के दिन गांव के बच्चे हों या बुजुर्ग वे लकड़ी – उपले हर घर से एकत्रित कर एक चौराहे पर रखकर दहन कार्य की रूपरेखा तैयार करते है रात्रि के समय पूजन कर आग देते हैं और होलिका की परिक्रमा लगाते हुए अपने अपने घर चलें जातें हैं दूसरे दिन होलिका दहन की आग लेने पहुंचते है और उससे अंगीठी तैयार कर गक्कड बनाते है और होलिका की राख को एक दूसरे के माथे में लगाकर वर्ष भर की बुराईयां को ख़त्म करने का संदेश देते है। धुडेरी में गोबर,रंग गुलाल को एक दूसरे को डालते हुए गले मिलते है और गांव में रागताग के साथ फागों का गायन के साथ उत्सव का आनंद लेते हैं।

पीली मिट्टी का करते है इस्तेमाल

कुछ इसी तरह ग्राम गीदन और आस पास भी आदिवासी समाज शांति पूर्वक इस उत्सव को मनाता है सुंदर सिंह बताते है कि राख, गोबर का इस्तेमाल होता है फागें गातें है। महिलाएं घरों में पोतने वाली पीली मिट्टी का घोल बना कर रखती है जो पास के नाले से लाते है और उसे एक दूसरे को लगाते है।

नई आग से बनाते है बाटी

पठारी ग्राम से देवेंद्र बताते है कि फाग गाना और एक दूसरे से मिलने के साथ साथ होलिका की आग की राख को मेढे के अंदर भी जितने देवी देवता है उन्हें टीका लगाते है फिर उन्हें नहलाते है। आग लेकर घर जाते है और नई आग जलाते है छोटे गोबर के कंडे जिन्हे स्थानीय बोली में बरूला कहते है उन्हें एक माला के रूप में बना लेते हैं उसमें बांटियां बनाते है और छोटे बच्चो को खिलाते है।

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