मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
ग्रामीण क्षेत्रों में पलाश के फूलों की बहार से होली उत्सव आगाज का संदेश मिल जाता है। होली पर ग्रामीण इलाकों में पलाश के फूलों से रंगों को तैयार किए जाते है। फागुन माह में पतझड़ के बाद जंगलों में सर्वत्र ओर वीरानी छाई रहती है चारों ओर अधिकतर वृक्ष सूखे दिखाई देते हैं।
वृक्षों के बीच प्ले आफ द फारेस्ट के रूप में पहचाने जाने वाले प्लांट के फूल अपनी सुंदरता बिखेर रहे। होली का आगाज दिलाने वाले पलाश के फूल देखकर ग्रामीण इलाकों में होली मनाने की तैयारी शुरू हो जाती है। पलाश के फूलों से शरबत व होली का प्राकृतिक रंग भी बनाया जाता हैं। इतना ही नहीं इन फूलों के अर्क से औषधि भी तैयार की जाती है। आयुर्वेद में पलाश के पंचांग को उपयोगी वनस्पति का भी दर्जा प्राप्त है। पेड़ों पर पलाश के फूलों की बहार छाई हुई है, जिससे वातावरण का सौंदर्य बढ़ने लगा है। जंगल क्षेत्रो पर अनेक जगह पलाश के पेड़ बड़े पैमाने पर देखे जा सकते है जो होली आने का संकेत दे रहे है।

सड़कों के किनारे लगे पलाश के पेड़ों पर आए फूलों ने सड़कों की रौनक बढ़ा दी है। पलाश के फूल, पत्ते व लकड़ी स्वास्थ्य के लिए भी काफी महत्वपूर्ण होते हैं, जिससे कई रोगों की दवाई बनाई जाती है। टेसू के फूलों से होलिका पर्व पर रंग भी बनाया जाता है। देखने में ऐसा प्रतीत होता है कि मानों पेड़ पर किसी ने दहकते अंगारे लगा दिए हैं। आमतौर पर वसंत ऋतु के समय में यह फूल खिलने लगते है। हालांकि रंग उत्सव मनाए जाने में अभी समय है, लेकिन प्रकृति ने इसकी तैयारी वसंत ऋतु के आगमन के साथ कर ली है। आज भले ही हमें केमिकल युक्त रंग, गुलाल से होली पर्व मनाते हैं, लेकिन एक समय था, जब पूर्वज पलाश के फूल से ही होली खेला करते थे। पलाश के फूल को होली के लिए एक दिन पहले एकत्रित कर उसे मिट्टी के पात्र में रखकर गर्म करते थे। इससे प्राकृतिक रंग तैयार होता था। पलाश के पेड़ की छाल को उबालकर सेवन करने से पथरी और यकृत रोग दूर होते हैं। व्यवसाय उपयोगी पलाश के तने के रेशे से बनी रस्सी काफी मजबूत होती है। इसके पत्ते से दोने व पत्तल बनाए जाते थे। पूर्व में ये लोगो की आजीविका के प्रमुख साधन रहे है।