घृणा पाप से करो पापी से नहीं,पांच पाप को त्यागकर ही मोक्षमार्ग में आ सकते हैं- आचार्य श्री विद्यासागर महाराज
सुरेन्द्र जैन रायपुर
संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ससंघ चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में विराजमान है।आज के प्रवचन में आचार्य श्री ने बताया कि संभव है उस समय दूसरी कक्षा में पढ़ते थे पाठ्यक्रम में छोटी – छोटी कथा पढने के लिये उपलब्ध होती थी।आज भी उस कथा को पढ़कर चिंतन में डूब सकते हैं और डूब जाते हैं। यह पाठ जीवन पर्यन्त या जब तक कार्य न हो तब तक याद रहता है। एक कथा थी जिसमे दो सौतेले भाई रहते हैं और दोनों कि पत्नियाँ साथ में रहते थे। दोनों पत्नियों का आपस में थोडा संघर्ष चलता था। एक को संतान थी और एक को संतान नहीं थी।जिसको संतान नहीं थी उसने एक कार्य किया कि नहीं पता नहीं संतान का मरण हो गया।जिसकी संतान थी वह माँ चिल्ला रही थी, रो रही थी , बड़ा कठिन समय है। पंचायत के सामने निर्णय कठिन था।जिसने यह कष्ट पहुचाया वह कहती है कि मै ऐसा कर ही नहीं सकती मै तो वैसे ही संतान कि भूखी हूँ। उसके अलावा घर में कोई था ही नहीं।वे संतान को अपने साथ बाहर नहीं ले जा नहीं सकते थे। जिसकी संतान नहीं थी उसने कहा के अचानक सामने से एक गाय आई और उसने बच्चे को सिंग से उछाल दिया जिसके कारण वह संतान मरण को प्राप्त हुई। इस प्रकार अपने ऊपर जो आ रहा था उसे टाल दिया।आँखों देखा झूठ नहीं हो सकता।कैसे न्याय किया जाए ? तो पंचायत ने कहा जो सही – सही बताएगा उसको पुरस्कृत किया जायेगा।निर्णय करना कठिन है।पंचायत ने दोनो के बीच में मकान का बटवारा कर दिया आधा हिस्सा छोटी को और आधा हिस्सा बड़ी को दिया। इस निर्णय से छोटी को भीतर ही भीतर अच्छा लगा। बड़ी कहती है मुझे नहीं चाहिये उसे ही दे दो सारा का सारा ताकि वह ख़ुशी – ख़ुशी रहे। तब पंचायत ने कहा ये सही माँ है। ये छोटी जो आधा – आधा करने तैयार हो गयी इसने ही यह कार्य किया है।उसने जब गाय का नाम लिया तो गाय ने सुन लिया और वह गाय सारे के सारे लोगो को अलग – अलग करते हुए आँगन में कडावे में जो लोह का गोला गर्म – गर्म था उसको मुह से उठाकर उसके सामने रख दिया जिससे सिद्ध हो गया कि यह गाय दोष से मुक्त है।पहले न तो कोर्ट, न हाई कोर्ट, न जिला कोर्ट होता था किन्तु पांच ही पर्याप्त है पंचायत जिसको बोलते हैं।आज यह पंचायत शब्द रुग्ण हो गया है। कैसे रुग्ण हो गया ? बड़े – बड़े कोर्ट हो गए। करोडो रूपए खर्च करने के बाद सत्य को सत्य सिद्ध करने में शताब्दी लग रही है।शासन भी इस ओर देख रही है किन्तु कुछ कर नहीं पा रही है। प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि सत्य को सामने लाये गाय ने भी सत्य को सामने लाया।हमारे यहाँ भी कई प्रकार के व्यक्ति अनपी व्यवस्था अनुसार, व्यवहार अनुसार सत्य का पालन करते हुए जीवन यापन करते हैं।आज गृहस्थ आश्रम में इन सबका महत्त्व नहीं समझ पा रहे हैं।वह ५ मिनट का कार्य ५० वर्षों में भी पूर्ण नहीं हो पा रहा है।यह अवसर्पणी काल है यहाँ सत्य तो कमजोर होगा क्योंकि पाप बढेगा। पाप को सिद्ध करना ही नहीं होता है।पाप से दूर रहने कि आवश्यकता है।सुखमय जीवन जीने के लिये पाप से दूर रहकर सत्य को उद्घाटित किया जाना चाहिये।पाप को हमेशा घृणा कि दृष्टि से देखा जाता है। हमारे यहाँ पापी को नहीं पाप को घृणा कि दृष्टि से देखने को कहा है। मुक्ति के लिये पांचो पाप का विसर्जन करना होगा।पंचम गुण स्थानवर्ती संयमासंयम गाय, बैल, हांथी, ऊंट, सिंह और सर्प भी हो सकता है।सोलहवे स्वर्ग तक जाकर वहाँ से नर जन्म पाकर मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।ऐसा दौलतराम जी द्वारा कृत छः ढाला में आता है। अपने जीवन में आप पाच पाप को कम करते चले जायेंगे और दूसरे को नहीं देखना है।हमें यदि हल्का होना है तो पाच पापो को छोड़ते हुए जाना यही एक मात्र मार्ग है। असंयम हमेशा – हमेशा अनंत रहता है और संयम गिनती के ही हुआ करते हैं।इसलिए जो गिनती के होते हैं उनसे विनती करता रहता है। यह विनती का रिवाज एक प्रकार से वह जैसा – जैसा पाप को कम करता जाता है वह हल्का होकरके तैरने लग जाता है। तैरना एक प्रकार से पाप से मुक्त होने का पाठ सिखाता है। इसलिए डूबना भारी होने का पाठ सिखाता है। संसार में डूबते – डूबते ही आये है और बहुत को अभी भी कम नहीं करेंगे तो मनुष्य जीवन के अलावा कोई स्थान नहीं है जहाँ पाप का त्याग कर सके। स्वर्गों में भी जो गए वो पाप त्याग कर गए लेकिन वहाँ पाप त्याग कर नहीं सकते है। इसलिए आप लोग पाप के पलड़े को कम कर दो और पुण्य के पलड़े को ऐसा भारी बना दो कि पाप का पलड़ा हल्का होकर सिधे ऊपर चला जाये और सारा का सारा परिग्रह छुट जाए। दूर से आये आज छुट्टी मिली होगी। विद्यालय में पढने वाले बच्चे कि दृष्टि छुट्टी के ओर रहती है आप लोग भी उसी के अनुसार अपना कार्य करते हैं। तराजू के समान ही धर्म का कांटा होता है जिसपर हमेश नज़र रखना चाहिये जिससे पता चलता है कि पाप और पुण्य किसका भार ज्यादा है।भगवान से प्रार्थना करते हैं कि सभी के पुण्य का पलड़ा हमेशा भारी रहे। आज आचार्य श्री विद्यासागर महाराज को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य श्री केशरीमल जी जैन, महेंद्र कुमार जी जैन, सम्कित जी जैन भुपत परिवार सिरोंज विदिशा (मध्य प्रदेश) निवासी परिवार को प्राप्त हुआ।