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जंगल में बाघों और गांवों में इंसानों की मौत—क्या यह एक ही संकट की दो तस्वीरें हैं?- दीपक कांकर 

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टाइगर स्टेट में बाघ और इंसान दोनों क्यों असुरक्षित?

आलेख

दीपक कांकर

मध्यप्रदेश को टाइगर स्टेट होने पर गर्व है, लेकिन बाघों की बढ़ती संख्या संरक्षण की पूरी सफलता नहीं मानी जा सकती। भोपाल से लगे औबेदुल्लागंज वन क्षेत्र की दाहोद रेंज में खेत से बाघिन का शव मिलने की घटना ने जंगल से सटे गांवों और खेतों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं। प्रारंभिक आशंका बिजली के करंट से मौत की है; अंतिम कारण जांच और पोस्टमार्टम से स्पष्ट होगा।

आंकड़े चेतावनी भी हैं

सितंबर 2026 के अंत तक मध्यप्रदेश में करीब 50 बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी थी। इनमें प्राकृतिक कारण, बीमारी, आपसी संघर्ष, दुर्घटना और मानव गतिविधियां शामिल हैं। इसलिए हर मौत को वन विभाग की विफलता कहना उचित नहीं होगा। लेकिन लगातार सामने आती घटनाएं पूछती हैं—क्या हम केवल मौत का कारण दर्ज कर रहे हैं या उसे रोकने की व्यवस्था भी मजबूत कर रहे हैं?

गांवों में बढ़ता खतरा

30 जुलाई 2026 तक वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वन्यजीव हमलों में 50 लोगों की मौत हुई थी। इनमें बाघ के हमलों में 22, जंगली सूअर में 8, हाथी में 7, भालू में 4 और तेंदुए में 1 मौत शामिल थी।

जंगल से लगे गांवों में किसान, लकड़ी बीनने वाले और मवेशी चराने वाले रोज वन्यजीवों के खतरे का सामना करते हैं। इसलिए संरक्षण का सवाल केवल यह नहीं कि बाघ को कैसे बचाएं, बल्कि यह भी है—बाघ के इलाके में रहने वाले इंसान को कैसे बचाएं?

व्यवस्था की जिम्मेदारी

मध्यप्रदेश में मुख्य वन्यप्राणी संरक्षक और प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वाइल्डलाइफ) की जिम्मेदारी डॉ. समिता राजौरा (IFS) के पास है। उनकी भूमिका वन्यजीव सुरक्षा के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष घटाने, गांवों की सुरक्षा मजबूत करने और विभागों के बीच समन्वय सुनिश्चित करने से भी जुड़ी है।ऐसे में वाइल्ड लाइफ का यह तंत्र पूरी तरह नाकाम रहा हे।सिर्फ एसी रूम में बैठकर बॉयल्ड लाइफ की सुरक्षा नहीं हो सकती इसके लिए धरातल पर भी जिम्मेदारो को उतरना होगा।

बाघों की मौत, हमलों और बिजली के करंट जैसी घटनाओं को रोकने के लिए निगरानी तंत्र, त्वरित प्रतिक्रिया दल, कॉरिडोर प्रबंधन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी प्रभावी बनानी होगी। संरक्षण की सफलता केवल बाघों की संख्या नहीं, सुरक्षित सह-अस्तित्व से भी मापी जानी चाहिए।

विकास और कॉरिडोर

सड़क, बिजली, रेलवे, खेती और शहरी विस्तार जरूरी हैं, लेकिन इनके बीच वन्यजीवों के पारंपरिक रास्ते—कॉरिडोर—सुरक्षित रहना चाहिए। वैज्ञानिक प्रबंधन के अभाव में टकराव बढ़ेगा और कभी बाघ, कभी तेंदुआ, कभी किसान या ग्रामीण इसकी कीमत चुकाएगा।

बिजली का तार बन सकता है मौत का जाल

यदि जांच में बाघिन की मौत का कारण करंट साबित होता है, तो खेतों की बिजली लाइनों, खुले तारों, अवैध कनेक्शनों और असुरक्षित विद्युत व्यवस्था की निगरानी पर गंभीर सवाल उठेंगे। फसल बचाने के लिए लगाया गया इंतजाम वन्यजीवों की मौत का कारण न बने, इसके लिए वन विभाग, बिजली विभाग और स्थानीय प्रशासन के बीच नियमित समन्वय जरूरी है।

मुआवजा नहीं, रोकथाम जरूरी

वन्यजीव हमले में मौत के बाद मुआवजा देना आवश्यक है, लेकिन वह किसी परिवार का सदस्य वापस नहीं ला सकता। बाघ की मौत के बाद कार्रवाई भी उसे जीवित नहीं कर सकती।असली सफलता मौत के बाद मुआवजा देने में नहीं, उससे पहले खतरा पहचानकर रोकने में है।

असली परीक्षा

मध्यप्रदेश के पास बाघ, बड़े वन क्षेत्र, टाइगर रिजर्व और संरक्षण का अनुभव है। अब संरक्षण की परिभाषा व्यापक करनी होगी—

जंगल बचाना है तो उसके आसपास रहने वाले इंसान को भी बचाना होगा।बाघ बचाना है तो उसके कॉरिडोर सुरक्षित रखने होंगे।वन्यजीव बचाने हैं तो बिजली, सड़क, रेलवे और खेती से जुड़े खतरों का समाधान करना होगा।सवाल सिर्फ यह नहीं कि कितने बाघ बचे?सवाल यह भी है—कितने बाघ खोए?कितने तेंदुए मारे गए?कितने ग्रामीण संघर्ष का शिकार हुए?कितने परिवारों को मुआवजा देना पड़ा?

और सबसे बड़ा सवाल—

क्या हम हर घटना के बाद आंकड़े जोड़ेंगे या उनसे ऐसी नीति बनाएंगे, जो अगली मौत रोक सके?टाइगर स्टेट की पहचान केवल जंगल में घूमते बाघों से नहीं होगी। उसकी पहचान इस बात से भी होगी कि बाघ सुरक्षित हों और उन्हीं जंगलों की सीमा पर रहने वाले इंसान भी।

– लेखक एमपीटूडे न्यूज के चीफ एडिटर और वरिष्ठ पत्रकार हे।

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