महिलाओं ने सिर पर भुजरिया की टोकरियां रखकर निकाली शोभायात्रा, जलस्रोतों पर विधि-विधान से किया विसर्जन; अच्छी बारिश और समृद्ध फसल की कामना
मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
सांची विकासखंड के दीवानगंज, अंबाडी, सेमरा, नरखेड़ा, जमुनिया, निनोद, सरार और बरजोरपुर सहित 40 गांवों के आसपास के ग्रामीण अंचलों में शनिवार को रक्षाबंधन के दूसरे दिन मनाया जाने वाला पारंपरिक भुजरिया पर्व हर्षोल्लास और लोक संस्कृति के रंग में सराबोर रहा। सुबह से ही गांवों में भुजरिया के मांगलिक गीतों की गूंज सुनाई देती रही। शाम को महिलाओं और युवतियों ने सिर पर भुजरियों से सजी टोकरियां रखकर गीत गाते हुए जलस्रोतों की ओर प्रस्थान किया।
नदियों, तालाबों और जलाशयों के किनारे पहुंचकर भुजरियों की पूजा-अर्चना की गई। महिलाओं ने भुजरिया के चारों ओर लोकगीत गाए और नृत्य किया। इसके बाद विधि-विधान से भुजरियों का जल में विसर्जन किया गया। इस दौरान ग्रामीणों ने अच्छी बारिश, खेतों में उन्नत फसल, हरियाली और परिवार में सुख-समृद्धि की कामना की।

लेगी खेल ने बढ़ाया पर्व का उत्साह
भुजरिया पर्व के दौरान गांवों में पारंपरिक लेगी खेल भी आकर्षण का केंद्र रहा। युवा और बुजुर्ग पुरुष हाथों में छोटे डंडे लेकर एक-दूसरे के साथ ताल मिलाते हुए लोकगीत गाते और नृत्य करते नजर आए। ढोल और लोकगीतों की धुन पर ग्रामीण देर तक लेगी खेलते रहे। बच्चों और युवाओं में भी इसे लेकर खासा उत्साह देखने को मिला।
भुजरिया देने और आशीर्वाद लेने की परंपरा
विसर्जन के बाद ग्रामीणों में एक-दूसरे को भुजरिया देने की परंपरा भी निभाई गई। घर से एक सदस्य मंदिर पहुंचकर भगवान के चरणों में भुजरिया अर्पित करता है। इसके बाद भुजरिया लेकर ग्रामीणों के घर पहुंचकर बड़ों से आशीर्वाद लिया जाता है और छोटों को स्नेहपूर्वक भुजरिया देकर शुभकामनाएं दी जाती हैं। यह सिलसिला देर रात तक चलता रहा।

नई फसल और हरियाली का प्रतीक है भुजरिया
भुजरिया पर्व का ग्रामीण जीवन और कृषि संस्कृति से गहरा संबंध है। सावन महीने की अष्टमी-नवमी के आसपास छोटी-छोटी बांस की टोकरियों में मिट्टी भरकर गेहूं या जौ के दाने बोए जाते हैं। रोजाना पानी देने के बाद करीब एक सप्ताह में इनमें हरे पौधे निकल आते हैं। सावन के दौरान इन भुजरियों को झूला देने की परंपरा भी कई गांवों में निभाई जाती है।
रक्षाबंधन के दूसरे दिन इन हरे पौधों की पूजा कर जलस्रोतों में विसर्जित किया जाता है। विसर्जन से पहले महिलाएं और युवतियां भुजरियों के चारों ओर लोकगीत गाती हैं। ग्रामीण मान्यता के अनुसार भुजरिया नई फसल, हरियाली और खुशहाली का प्रतीक है। इसी भावना के साथ ग्रामीण बेहतर मानसून और अच्छी पैदावार की कामना करते हैं।
पर्व के दौरान महिलाओं, बच्चों, युवाओं, बुजुर्गों और ग्रामीणों की बड़ी संख्या में सहभागिता रही। परंपरा, लोकगीत, नृत्य और आपसी भाईचारे से गांवों का माहौल देर रात तक उत्सवमय बना रहा।