करघे की खनक से वैश्विक मंच तक पहुंची भारत की आवाज, रंजीता प्रियदर्शिनी ने साड़ी में बुनी महिला अधिकारों की कहानी
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर भारतीय संस्कृति, बुनकरों की विरासत और महिलाओं के अधिकारों को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की अनूठी पहल
सत्यवन गोस्वामी सुल्तानगंज /बेगमगंज रायसेन
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर भारतीय हथकरघे की परंपरा और महिला अधिकारों की आवाज को वैश्विक मंच तक पहुंचाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता एवं वैश्विक अभियानकर्ता रंजीता प्रियदर्शिनी एक प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आई हैं। उन्होंने भारतीय हथकरघे की समृद्ध विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंचों से जोड़ने के साथ महिला अधिकार, मासिक धर्म स्वास्थ्य और कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया है।
रंजीता प्रियदर्शिनी ने सवेतन मासिक धर्म अवकाश के अभियान को संयुक्त राष्ट्र से जुड़े अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रस्तुत करते हुए कामकाजी महिलाओं के स्वास्थ्य, सम्मान और अधिकारों की वकालत की है।

हाल ही में ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ लॉर्ड्स में महिला अधिकारों और सवेतन मासिक धर्म अवकाश पर अपनी बात रखते समय उन्होंने करीब 50 वर्ष पुरानी पारंपरिक संबलपुरी साड़ी धारण की। यह साड़ी महज एक परिधान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे बुनकरों के हुनर, संस्कृति और विरासत की जीवंत पहचान बनकर वैश्विक मंच पर पहुंची।
रंजीता का यह प्रयास बताता है कि हथकरघा केवल कपड़ा नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, संस्कृति और बुनकरों की मेहनत की कहानी है। उनके अभियान में भारतीय सांस्कृतिक पहचान के साथ महिला सशक्तिकरण और सामाजिक न्याय की आवाज भी मजबूती से जुड़ती दिखाई देती है।
राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर रंजीता प्रियदर्शिनी की पहल देश के बुनकरों और महिलाओं के लिए यह संदेश देती है कि करघे से निकली भारतीय पहचान की डोर वैश्विक मंच तक पहुंच सकती है।