मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
होली पर्व से दो दिन पहले दीवानगंज के साप्ताहिक हाट बाजार में रंग, गुलाल और पिचकारी की दुकानों की भरमार दिखाई दी। बाजार में सुबह से ही ग्रामीणों और बच्चों की भीड़ उमड़ पड़ी, जहां लोगों ने होली के रंग-गुलाल, पिचकारी, अबीर और अन्य पूजन सामग्री की खरीदारी की।
बाजार में छोटे बच्चों के लिए कार्टून-आकृति वाली पिचकारियां, टैंक पिचकारी और आधुनिक वाटरगन विशेष आकर्षण का केंद्र रहीं। वहीं विभिन्न रंगों के गुलाल और हर्बल रंगों की भी अच्छी बिक्री हुई। दुकानदारों ने बताया कि होली के एक दिन पहले खरीदारी सबसे अधिक होती है और देर शाम तक बाजार में रौनक बनी रहती है।
ग्रामीण महिलाओं ने भी पूजन के लिए अबीर-गुलाल, नारियल और मिठाई की खरीदारी की। बच्चों में होली को लेकर खासा उत्साह देखा गया और वे रंग-पिचकारी पसंद करते नजर आए।
हाट बाजार में बढ़ी भीड़ को देखते हुए स्थानीय पुलिस द्वारा सुरक्षा व्यवस्था भी की गई, ताकि खरीदारी के दौरान किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो।
होली से पहले दीवानगंज हाट बाजार की यह रंगीन रौनक ग्रामीण क्षेत्र में पर्व के आगमन का संदेश दे रही है। दीवानगंज, अंबाडी , सेमरा, नरखेड़ा, जमुनिया, निनोद, बरजोरपुर, सरार, कयामपुर, संग्रामपुर, करैया, गिदगढ़, सत्ती, टोला, बालमपुर, देहरी, सहित आसपास क्षेत्र के ग्रामीणों की

दुकानों पर भीड़ लगी रही, कोई पिचकारी खरीद रहा था तो कोई गुलाल खरीद रहा था कोई कलर मांग रहा था समय के साथ पिचकारी में बदलाव होता चला गया। पिचकारी के बिना होली अधूरी है। साठ के दशक में बांस से बनी पिचकारी से होली का रंग बरसता था। बाद में उसकी जगह पीतल और फिर स्टील की पिचकारी आ गई। त्योहार पर बाजार का रंग गाढ़ा हुआ तो प्लास्टिक की अलग-अलग डिजाइन में पिचकारियां बिकने लगीं। इस साल तो इससे भी दो कदम आगे बढ़कर रंग-गुलाल भरे पटाखे आ गए। पिचकारी की दुकान चलाने वाले गोपी नायक कहते हैं कि लोग कैसे और किससे रंग खेलेंगे, अब यह भी बाजार तय करने लगा है। पहले कम से कम 15 दिन पहले ही होली का माहौल बन जाता था। बाजार में दूर-दूर और साप्ताहिक हुआ करते थे। ऐसे में लोग त्योहार को यादगार बनाने के लिए नए-नए उपाय करते थे। ग्रामीण क्षेत्र में लोग बांस की पिचकारी बनाते थे, जिसके लिए बांस की गांठ, लकड़ी और कपड़े का प्रयोग होता था। आजादी के एक दशक बाद पीतल की पिचकारी का दौर आया। हालांकि, तब यह केवल आर्थिक रूप से संपन्न लोगों के ही पास होती थी। पीतल की पिचकारी भी अलग-अलग प्रकार की बनने लगी। इसे आकर्षक बनाने के लिए उसकी डिजाइनिंग होने लगी।
कई सालों से दीवानगंज हाट बाजार में पिचकारी और कलर बेचने वाले थोक विक्रेता फरीद खान और शरीफ खान कहते है कि हमारा कारोबार दीवानगंज हॉट बाजार मे चार पीढि़यों से चला आ है। होली और पिचकारी की चर्चा छिड़ते ही फरीद खान ने कहा कि हमारे पिताजी बताते थे मैंने जब दुकान पर बैठना शुरू किया तो उस वक्त पिचकारी की कीमत दो रुपये हुआ करती थी। तब नया-नया प्लास्टिक का चलन शुरू हुआ था।
स्प्रिंग वाली इस पिचकारी की बिक्री खूब होती थी। इसी दौर में स्टील की फव्वारे वाली पिचकारी आई, जो बाद में पीतल की पिचकारी का विकल्प बन गई। हालांकि, प्लास्टिक के चलन ने इसमें भी परिवर्तन किया और बाद में स्टील जैसी पिचकारी प्लास्टिक की मिलने लगी। हर साल तकनीक बदलती जा रही है। पहले लोग एक बार पिचकारी खरीदते थे और कई वर्ष तक उससे होली खेलते थे। लेकिन अब कंपनियां हर साल नए डिजाइन को लांच करती हैं। बच्चे भी होली के बाद पिचकारी फेंक देते हैं।