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भारत में शिक्षा का व्यवसाईकरण, भाषा का प्रश्न और व्यावसायिक शिक्षा-विवेक त्रिपाठी

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आलेख
विवेक त्रिपाठी

बुंदेलखंड के एक पिछड़े जिले के गांव देहात का हिंदी माध्यम की सरकारी स्कूल में पढ़ा एक लड़का खूब मेहनत करता है, कठिन इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम क्वालीफाई करता है और फिर इंदौर के एक बड़े और नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लेता है। कॉलेज में आने के बाद उसकी स्पीड उतनी नहीं रहती है जितनी पहले थी। किसी तरह ग्रेजुएशन कंप्लीट करता है, लेकिन हाथ में कुछ नहीं आता.. ना केंपस प्लेसमेंट और ना कहीं और.. फिर वह थक हार कर राज्य सिविल सेवा की तैयारी करने लग जाता है और डीएसपी के पद पर सिलेक्शन पा जाता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर आज यह एक चर्चित व्यक्ति है। आप इसके वीडियो देखेंगे तो पता चलेगा कि वह पुलिसिंग जो करता है, वो करता है, ग्रामीण पृष्ठभूमि, गांव देहात से जुड़े घटनाक्रम यहां के बच्चों से मिलने जुलने उनके मोटिवेशन से लेकर कई अन्य सोशल एक्टिविटीज द्वारा आम लोगों के बीच अच्छा खासा पॉपुलर है।

एक प्रश्न आपके दिमाग में जरूर आया होगा इंजीनियरिंग एंट्रेंस एग्जाम क्वालीफाई करके एक अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन लेने वाला और राज्य सिविल सेवा में अच्छी रैंक लेकर टॉप पोस्ट लेने वाला यह ग्रामीण पृष्ठभूमि का बच्चा आखिर इंदौर के एक बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में असफल कैसे हुआ? इंजीनियरिंग के पहले और इंजीनियरिंग के बाद इसकी भाषा हिंदी थी जबकि इंजीनियरिंग के दौरान इंग्लिश। यानी बात भाषा की है; तकनीकी शिक्षा में ही नहीं भारत में स्कूली पाठ्यक्रमों में भी भाषा का प्रश्न आजादी की बात से ही बड़ा सेंसिटिव प्रश्न रहा है और आज हमारी बात भी इसी पर है।

प्राचीन भारत में गुरुकुल और राज्य द्वारा स्थापित विद्यालय अथवा महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त होती थी। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, ओदंतपुरी और वल्लभी जैसे विश्वविद्यालय सबको पता हैं। यद्यपि कि इस काल खंड में जाति- वर्ग आधारित एक सीमित संख्या को ही संस्थागत शिक्षा व्यवस्था में हिस्सेदारी प्राप्त थी। भारत में मुस्लिम सत्ता स्थापित होते ही ऐसे विद्यालयों का महत्त्व समाप्त होने लगा, इस वक्त राज्य पोषित मदरसा व मकतब अथवा स्थानीय हिंदुओं के व्यक्तिगत प्रयासों से स्थापित टोल व पाठशाला का महत्व था। अंग्रेजी शासन में पहली बार वर्नाकुलर स्कूल और फिर आज की तरह के स्कूल और कॉलेज खुलने शुरू हुए जिनकी संख्या शुरुआत में बहुत थोड़ी थी, दरअसल अंग्रेज भारत में थोड़ी बहुत अंग्रेजी की समझ के साथ लेखा-जोखा रखने वाले बाबूओं की एक भीड़ तैयार करना चाहते थे।

आजादी के बाद सत्ता का ट्रांसफर हुआ (1946 में बिना किसी इलेक्शन बड़े ही शांतिपूर्ण तरीके से), भारत में नव स्थापित नेतृत्व अंग्रेजियत की चाल ढाल में पला बढ़ा था। स्वाभाविक है कि इनकी पॉलिसीज ऐसी रही कि स्कूल और हायर एजुकेशन में अंग्रेजी माध्यम का दबदबा बना रहा। भारत में पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) इंदिरा गांधी सरकार के कार्यकाल में साल 1968 में आई थी। दूसरी नीति साल 1986 में तथा तीसरी साल 2020 में आई। नई शिक्षा नीति (NEP) 2020, में में घोषित प्रमुख बिंदु संलग्न में उल्लेखित है। सिविल सर्विसेज की तैयारी के दौरान मैंने भी एक सामान्य अध्ययन के रूप में अलग-अलग वक्त आई एजुकेशन पॉलिसीज को पढ़ा और समझा। एक बात जो समझ आई वह यह कि पॉलिसीज कागज़ में बनाई जाती है, धरातल में इनका कोई बड़ा परिवर्तनकारी रोल नहीं होता। किसी नई पॉलिसी में वही पुरानी पॉलिसी के बिंदुओं को ही शब्दों के हेर फेर के साथ दोहराए जाने की परंपरा रही है जैसे पुरानी बोतल में नई शराब। नई एजुकेशन पॉलिसी अपने उद्देश्यों में कितना सफल रहेगी वह समय बताएगा।

नई एजुकेशन पॉलिसी की संकल्प दृष्टि अनुसार आर्ट कल्चर असिएंट इंडियन फिलासफी को स्कूली पाठ्यक्रम में ज्यादा जगह मिली है। असिएंट और मेडिवल इंडिया की अपेक्षा मॉडर्न इंडिया को ज्यादा कवरेज मिला है। सिविल सर्विसेज की सिलेबस में इसकी झलक दिखती है। अकबर का एक समय बाद का व्यक्तित्व जो भी रहा हो, चित्तौड़गढ़ के युद्ध (1567) के दौरान उसने निर्दोष सिविलियन के नरसंहार का आदेश दिया था। अबुल फजल लिखता है कि दुर्ग के अंदर करीब 8000 सैनिक और 40,000 सिविलियन थे, जिनमें से 30,000 का अकबर के आदेश पर कत्ल कर दिया गया। इसी युद्ध के दौरान चित्तौड़गढ़ का तीसरा जौहर हुआ था। चित्तौड़गढ़ के हमले में जिस अकबर ने हज़ारों निर्दोष नागरिकों की हत्या करवाई वह स्कूली पाठ्यक्रम में बन गए अकबर महान..। वैसे तो भारत में जड़ जमा चुका वामपंथी इतिहास जन सामान्य के सामाजिक सांस्कृतिक इतिहासक्रम को इतिहास के पाठ्यक्रम की सामग्री स्वीकारता है, किंतु बादशाहों सुल्ताने को इतिहास के पन्नों में लंबी जगह दी गई है। मध्यकालीन इतिहास को सिलेबस में कम जगह देकर ऐसे विवादों और विरोधाभासों को ही खत्म करने की कोशिश की गई है।

आजादी के बाद भारत में जिस प्रकार की शिक्षा पद्धति अपनाई गई उसका चरित्र दोहरा था; शिक्षा व्यवस्था में स्थानीय भाषाओं तथा हिंदी को प्रमोट करने का प्रयास हुआ, गांव देहात के लिए हिंदी अथवा अन्य स्थानीय भाषा आधारित सरकारी स्कूल और शहरों में प्राइवेट माध्यम के इंग्लिश मीडियम स्कूल। अमीरों के लिए अलग व्यवस्था और देहातियों के लिए अलग, बड़ी-बड़ी नौकरियां शहरी अमीरों के लिए और शेष बची गांव देहात में पढ़े हिंदी माध्यम के बच्चों के लिए। धीरे-धीरे देश में एक खास तरह का वर्ग तैयार हुआ जो शरीर से भारतीय था किन्तु अंतरात्मा से अंगरेज़; यही लोग प्रशासन में ऊंची जगह पर रहे और इन्होंने ही आगे की नीतियां तय की। आजादी के बाद के कई सालों तक कम से कम सेंट्रल सिविल सर्विसेज में या तो परीक्षा का माध्यम इंग्लिश होना अनिवार्य था, नहीं भी तो इंग्लिश मध्यम को प्रेफरेंस हुआ करती थी। एक दौर था जब यूपीएससी के सिलेक्शंस इंग्लिश मध्यम के शहरी बच्चों के ही हुआ करते थे, हिंदी अथवा किसी स्थानीय भाषा में बहुत कम अथवा नहीं। एक बात समझ में नहीं आती जब आपको हायर एडमिनिस्ट्रेशन वेस्टर्न इंग्लिश एजुकेशन वाला चाहिए तो फिर गांव देहात अथवा सरकारी स्कूलों को इंग्लिश माध्यम आजादी के बाद से ही क्यों नहीं किया? दोहरी एजुकेशन व्यवस्था अपनाने का क्या औचित्य था? पढ़े-लिखे और पैसे वालों के लिए अंग्रेजी माध्यम के स्कूल और जन सामान्य के लिए हिंदी माध्यम। ऐसा क्यों?

भारत में स्कूल और कॉलेज एजुकेशन में भाषा की समस्या हमेशा से रही है। हिंदी माध्यम सरकारी स्कूल बनाम इंग्लिश मीडियम प्राइवेट स्कूल की डिबेट लंबी है। ग्रामीण- शहरी, अमीर- गरीब के लिए अलग-अलग शिक्षा व्यवस्था और इसमें भाषागत भेदभाव का प्रश्न कोई नया नहीं है। कोई भाषा नवीन अथवा परिष्कृत हो सकती है किंतु टेक्निकली संस्कृत, इंग्लिश से भी ज्यादा परिष्कृत भाषा है, सामासिक होने से कंप्यूटर के लिए ज्यादा सही भाषा है। क्या किसी खास भाषा को सीखना कठिन और दूसरी को सीखना आसान होता है? क्या तकनीकी और साइंटिफिक एजुकेशन का कोई भाषाई कनेक्शन है? क्या भाषा का इंटेलिजेंसी से कोई संबंध है?

मेरी बेटी कोरोना टाइम में जन्मी; यह वह साल था जब कई महीने लोग बाहरी दुनिया से कटे घर के अंदर बंद रहे, बाहर आम लोगों से कोई संपर्क था नहीं, घर के भीतर खुद की फैमिली और टेलीविजन। परिवार में मैं हिंदी मीडियम वाला था जो ड्यूटी की वजह से पूरे दिन घर से बाहर होता। यानी घर के भीतर टेलीविज़न में इंग्लिश कॉन्टेंट और फैमिली कम्युनिकेशन की भाषा इंग्लिश। अनायास ही बच्चे का पर्सनैलिटी बिल्डअप ऐसा हुआ कि एक हिंदी परिवार में जन्मे बच्चे की फर्स्ट लैंग्वेज यानी मातृभाषा हिंदी न होकर इंग्लिश हो गई और यह कब कैसे हुआ कुछ पता नहीं चला और फिर उसे जब ढाई तीन साल की उम्र में इंग्लिश मीडियम नर्सरी स्कूल में एडमिशन कराया गया तब सामान्य बच्चों से संपर्क होने पर वह वहां से इंग्लिश की बजाए हिंदी सीख कर घर आ रही थी।

कोई भाषा अपने आप में अच्छी बुरी, सरल- कठिन या प्रोफेशनल- ठेठ नहीं होती। बच्चा जिस भाषा के बीच जन्म लेता है उसे वह आत्मसात कर लेता है। वह उसी भाषा में सोचता है, उसी भाषा में बात करता है और वही उसे समझ आती है। ग्रामीण हिंदी अथवा किसी अन्य स्थानीय भाषा के बीच में पला बढ़ा लड़का किसी सरकारी हिंदी मीडियम स्कूल में पढ़ता है तब वह शुरुआती 17- 18 साल हिंदी या उस स्थानीय भाषा के प्रति अनुकूलित हो जाता है। फिर जब उसे एकाएक ग्रेजुएशन में किसी प्रोफेशनल कोर्स में इंग्लिश मीडियम में सोचने- समझने और लिखने- पढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है तो वह टूटने लग जाता है, अपनी स्वाभाविकता को खोने लगा जाता है। स्वाभाविक है कि एक ब्रिलिएंट लड़का जिसने बहुत सारी कॉम्पिटेटिव एग्जाम्स को अपनी भाषा में फेस किया था अब वह एकाएक भाषाई वजह से अपने स्वाभाविक प्रदर्शन को खोने लगता है जबकि स्थितियां ऐसी भी बनती हैं कि वह डिप्रेशन की स्थिति में जाने लगता है। भारत में ऐसा हो रहा है और बहुत ज्यादा हो रहा है यद्यपि कि ऐसे लोगों की आवाज नहीं है, इसलिए ऐसे मामले मीडिया में नहीं आते, लोगों को पता नहीं चलता अथवा लोगों को पता चलता भी है तो वे इसे इसको हल्के-फुल्के में लेते हैं।

“शिक्षा का व्यवसाईकरण” –
NEP अन्तर्गत स्कूलों में वर्तमान प्रचलित 10+2 फार्मेट के स्थान पर 5+3+3+4 फार्मेट अपना लीजिए या कुछ और मूल प्रश्न तो अब भी ज्यों का त्यों हैं। शिक्षा का निरंतर प्राइवेटाइजेशन हो रहा है राज्य सरकारें निरंतर स्कूली इंफ्रास्ट्रक्चर को कमजोर करके स्वयं को क्रमशः एजुकेशन सिस्टम से बाहर करती जा रही हैं और पूरी जिम्मेदारी प्राइवेट सेक्टर को देने की मंशा रखती हैं। सरकारी स्कूल आजकल मध्यान भोजन का दलिया- दाल- भात और पूरी- सब्जी खाने के केंद्र बनकर रह गए हैं। यहां पदस्थ शिक्षकों का पहला काम है किचन मैनेजमेंट और मध्यान भोजन की व्यवस्था करवाना। शहरों की देखा देखी गांवों में भी आज कुकुरमुत्तों की भांति तथाकथित प्राइवेट इंग्लिश मीडियम स्कूल खुलते जा रहे हैं, जिनकी अच्छी खासी फीस है, क्वालिटी एजुकेशन नहीं है और ये इनकंपिटेंट है।

राइट टू एजुकेशन में गरीब बच्चों के रिजर्वेशन कोटा को स्वीकार किया है फिर भी कोई बड़ा प्राइवेट इंस्टीट्यूशन RET के तहत एडमिशन दे रहा है क्या? इन सबने बचने के कुछ तरीके निकाल रखे हैं, आपकी कंट्रोलिंग अथॉरिटी उन पर कंट्रोल कर पा रही है क्या? नहीं ना..,भारत की 70% आबादी आज भी गांव देहात में रहती है, जहां संसाधन और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है। गरीबों की क्षमता में उतना बदलाव नहीं आया है जितना अमीरों की; क्या महंगी शिक्षा प्रणाली में ऐसे गांव देहात यह शहरों के निम्न मध्यम वर्ग के पेरेंट्स अपने बच्चों को नए तरह की शिक्षा व्यवस्था के साथ जोड़कर चलने की क्षमता रखते हैं? नहीं ना.., कमजोर नींव पर पले बढ़े बच्चे हायर एजुकेशन अथवा प्रोफेशनल कोर्सेस में कंपीट कर पाने में शहरी मध्य अथवा उच्च वर्ग के बच्चों के साथ कंपीट कर पाने में सक्षम रह पाएंगे? मैं फोर्थ तक गांव की सरकारी स्कूल में पढ़ा हूं और बाद में झाबुआ जिले के एक कस्बे में। उस दौर में जब कभी झाबुआ रीवा या सतना शहर जाता था और पीली स्कूल बस में प्रॉपर ड्रेस्ड अप हम उम्र बच्चों को देखता था तो एक स्वाभाविक तुलना किया करता था; उनके और अपने बीच के अंतर को महसूस करता था।

“कोटा का लूट तंत्र”-
शिक्षा के बढ़ते व्यवसाईकरण में लूट तंत्र किस तरह काम करता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण है कोटा, जहां इंजीनियरिंग मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम क्लियर करने के लिए कोचिंग दी जाती है और देश भर के बच्चे यहां जाकर साल दर साल यहां रहकर कोचिंग क्लासेस जॉइन करते हैं। वैसे यह प्रश्न तो पूछा ही जाना चाहिए कि स्कूल एजुकेशन के बाद एंट्रेंस क्लियर करने के लिए आखिर इस तरह के कोचिंग इंस्टीट्यूशंस और ताम-झाम की आखिर जरूरत ही क्या है? एक हमारे मित्र हैं उन्होंने अपनी बिटिया का एडमिशन कोटा के एक ऐसे ही कोचिंग संस्थान में कराया बात-बात में एक बात जानने को मिली। कोटा में किसी भी बड़े कोचिंग संस्थान में तीन तरह की व्यवस्था है। आप एडमिशन के लिए वहां जाते हैं वह एक एग्जाम लेंगे और एक्स्ट्राऑर्डिनरी, ऑर्डिनरी और सामान्य बच्चों को कैटिगराइज करेंगे। इस तरह के कैटिगराइजेशन में एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी बच्चों का एक ग्रुप होगा, ऑर्डिनरी बच्चों के कुछ ग्रुप होंगे और बाकी लोगों के अलग..। एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी बच्चों के लिए टॉप क्लास के टीचर्स लगेंगे, ऑर्डिनरी बच्चों के लिए सामान्य टीचर और शेष 70- 80 परसेंट भीड़ के लिए स्कूल कॉलेज में पढ़ने या पढ़ाने और कम सैलरी पर काम करने वाले टीचर्स। यहां एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी ग्रुप के चुनिंदा बच्चों की फीस भी माफ कर दी जाएगी, क्योंकि यह वह बच्चे हैं जिन्हें सफल होना ही था, इसलिए होंगे ही..।

एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी इन्हीं बच्चों की बड़ी बड़ी तस्वीरें बड़े-बड़े महानगरों या छोटे कस्बों में लगे एडवर्टाइजमेंट बोर्ड्स में लगती हैं, जिसमें एक कोचिंग क्लास विशेष हाई सिलेक्शन रेट का हाइप क्रिएट कर लोगों को कोटा आने के लिए विवश करता है। कहने का मतलब यह कि किसी एक कोचिंग क्लास में देश भर से आए और एडमिशन लिए कुल बच्चों में से 10- 20% बच्चे सिलेक्ट होते हैं और बाकी 80 परसेंट बच्चे फीस भरने और कोचिंग क्लास के लिए पैसा कमाने का माध्यम मात्र हैं। इसी भीड़ में वह बच्चे भी हैं जो असफलता और अविश्वास के मानसिक दबाव के चलते सफलता न मिलने पर हर कई सौ की संख्या में हर साल सुसाइड करते हैं। कोटा का यह लूट तंत्र आज सिर्फ कोटा में ही नहीं, देश के हर बड़े शहर और कस्बे में संचालित कोचिंग संस्थानों में आपको दिखेगा।

आर्टिकल की शुरुआत में जिस डीएसपी की कहानी बताई है, वह अकेली नहीं है। जब मैं कॉलेज में था तब मेरा एक साथी था और एक जूनियर..। दोनों सुदूर मुरैना के किसी गांव के एक सरकारी हिंदी मीडियम स्कूल से पढ़े लिखे थे और इन दोनों की एंट्रेंस एग्जाम में अच्छी खासी रैंक थी। मेरी जानकारी में जूनियर ने सैनिक स्कूल की एंट्रेंस एग्जाम निकाली थी यद्यपि कि कुछ पारिवारिक कारणों से एडमिशन नहीं लिया था। स्कूली पाठ्यक्रम में हिंदी के बाद इंजीनियरिंग ग्रेजुएशन में कंप्लीट इंग्लिश माध्यम की स्थिति इनके लिए इतनी भारी पड़ी कि इन दोनों को पास होना तो ठीक है अच्छे नंबर और अच्छे रैंक के लिए संघर्ष करना पड़ गया। इनमें से एक आज किसी इंडस्ट्री में एक सामान्य जॉब में है जबकि दूसरा किसी सरकारी जॉब में क्लास 3 एम्पलाई।

आजादी के बाद भारत में इंग्लिश भाषा को तकनीकी शिक्षा का माध्यम बनाया गया, यह मानते हुए कि इंग्लिश साइंस की भाषा है, पर ऐसा क्यों? चीन, जापान या जर्मनी जैसे देशों में मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई हमेशा से स्थानीय मंडारिन, जर्मन या जापानीज भाषा में रही है, फिर भी वह विज्ञान प्रौद्योगिकी के विकास के मामले में भारत से आगे हैं, हैं ना!

इंजीनियरिंग कॉलेजेस में प्रचलित आज की शिक्षा व्यवस्था अंतर्गत ग्रेजुएशन के बाद निकला बच्चा बेसिक बातें नहीं जानता, जैसे वह एक इलेक्ट्रिक इंजीनियर है किंतु उसे मोटर वाइंडिंग या पंखे की रिपेयरिंग नहीं आती। एक मैकेनिकल इंजीनियर किसी कार या मोटर की रिपेयरिंग करना नहीं जानता। हम उस शिक्षा प्रणाली में जी रहे हैं जिसमें सैद्धांतिक चीजें तो हमें किताबों में पढ़ा दी जाती है, लेकिन व्यावहारिक पक्ष से हम पूरी तरह अनभिज्ञ रह जाते हैं। ऐसी इंजीनियरिंग का क्या मतलब?

X पर मैं कुछ साल पहले एक बड़े उद्योगपति का एक ट्वीट देख रहा था, शायद महिंद्रा का, वह यह कि भारत में बड़े-बड़े इंजीनियरिंग कॉलेज में कैंपस सिलेक्शन की व्यवस्था होती है जिसमें ग्रैजुएट्स को कंपनियां कैंपस में आकर सिलेक्ट करती हैं और एक पैकेज देकर उनको अपनी कंपनी में काम करने का ऑफर देती हैं। महिंद्रा का कहना था कि भारत के इंजीनियरिंग ग्रैजुएट्स इनकंपीटेंट होते हैं मतलब थ्योरी तो जानते हैं किंतु इन्हें बेसिक पता नहीं होता। जॉब ऑफर करने के बाद हमें इन्हें एक-दो साल की ट्रेनिंग देनी पड़ती है और फिर हम इनसे काम ले पाते हैं। शिक्षा का यही पैटर्न आज तमाम यहां वहां प्राइवेट इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूशंस में आपको देखने को मिलेगा। इसमें एक बड़ी संख्या ग्रामीण बैकग्राउंड के हिंदी मीडियम में पले – बढ़े बच्चों की भी है।

यही स्थिति इंजीनियरिंग के साथ मेडिकल एजुकेशन में भी है। हाल के वर्षों में इंजीनियरिंग के साथ मेडिकल की पढ़ाई में अंग्रेजी के साथ हिंदी और कुछ अन्य स्थानीय भारतीय भाषाओं पर सिलेबस डिजाइन किया गया है। अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी और अन्य भाषाओं में मेडिकल की पढ़ाई शुरू की गई है। बात यहां भी वही है आप जब एक सिस्टम डिजाइन कर देते हैं तो वह लंबे समय में अपनी जड़े जमा लेता है और फिर किसी अन्य परिस्थिति को जमने नहीं देता। मुझे नहीं लगता यह प्रयोग ज्यादा सफल होगा, क्योंकि यह प्रयोग कम से कम शुरुआती दौर में इंजीनियरिंग या मेडिकल कॉलेजैस में हिंदी- नॉन हिंदी, देहाती- शहरी, अमीर- गरीब और शब्द – असभ्य के डिवीजन को बढ़ाएगा। स्थानीय भाषा अपनाने वाले बच्चों का हरासमेंट होगा और फिर ग्रेजुएशन के बाद प्लेसमेंट में जो होगा उसकी आप कल्पना मत करिए।

बात शिक्षा में गुणवत्ता की भी है, आप किसी मेडिकल कॉलेज में चले जाइए यहां एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे बच्चे, इंजेक्शन लगाने जैसे छोटे कामों में आपको किसी नर्स से बेहतर काम करते नहीं दिखेंगे। कई बड़े डॉक्टर को आप देख लीजिए जब ब्लड निकलने के लिए नस पहचाने की बात होती है तब यह काम उनसे बेहतर एक नर्स करती है। मैं कहता हूं कि यह काम एक नर्स का ही है, एक डॉक्टर का नहीं; किंतु एक डॉक्टर को नर्स से बेहतर काम करते आना चाहिए।

आप किसी बड़े कॉरपोरेट हॉस्पिटल में जाइए वहां सुपर स्पेशलिस्ट डॉक्टर की एक टीम होगी, लेकिन उनके नीचे काम करने वाले अधिकांश लोग आयुर्वेद या होम्योपैथी के डिप्लोमा होल्डर या ग्रैजुएट्स हैं जो एक छोटी सैलरी पर पूरा काम संभालते हैं। ऐसा इसलिए की आयुर्वेदिक या होम्योपैथी के डॉक्टर का क्रेज नहीं है। उनके लिए एक सुनहरा अवसर वह होता है जिसमें किसी स्टेट गवर्नमेंट या यहां वहां स्थापित सरकारी हॉस्पिटल अथवा कॉलेज में प्रेक्टिस अथवा टीचर की भर्ती निकलती है; इन भर्तियों में यदि कोई सरकारी डॉक्टर हो गया तो यह एक बहुत बड़ी बात है किंतु ऐसे डॉक्टर की यह एक बहुत छोटी संख्या है जो सरकारी सिस्टम का हिस्सा हैं। भारत में आजादी के बाद से एलोपैथी शिक्षा प्रणाली को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किया गया। गांव हो या शहर आज भी एक सीमित संख्या है जो सामान्य घरेलू बीमारियों का इलाज कराने किसी आयुर्वेदिक या होम्योपैथी डॉक्टर के पास जाती है। तो ऐसे डॉक्टर या तो प्राइवेट क्लीनिक खोलें और वहां एलोपैथी की प्रैक्टिस करें अन्यथा की स्थिति में उनके लिए एकमात्र जगह बचती है किसी प्राइवेट ऐलोपैथी हॉस्पिटल में नौकरी ढूंढना।

इंजीनियरिंग ग्रेजुएशन के दौरान सेकंड ईयर में एक विषय था – “हुमन रिसोर्स डेवलपमेंट”। यह सब्जेक्ट इंजीनियरिंग लाइन से नहीं था इसलिए, इस विषय को पढ़ाने के लिए जिन टीचर को अप्वॉइंट किया गया था वह बाकी जगह इंग्लिश पढ़ाते थे यानी यह विषय उनका कोर सब्जेक्ट नहीं था। वह इस विषय को पढ़ते थे और फिर क्लास में पढ़ाते थे। ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट यानी किसी इंस्टिट्यूशन या किसी औद्योगिक इकाई में काम करने वाले मजदूर सामान्य कर्मचारियों और मैनेजर को बेहतर तरीके से रखना ताकि वे उस कंपनी या इकाई के लिए बेहतर काम करें और किसी दूसरी जगह जाने की बजाय वह यहां रहकर बेहतर करें और मैक्सिमम आउटपुट मिले। एक दिन पढ़ाते पढ़ाते टीचर ने स्टूडेंट से एक प्रश्न किया – “हुमन रिसोर्स के इंप्रोपर मैनेजमेंट या अंडरफंक्शनिंग का एक उदाहरण दीजिए। एक स्टूडेंट खड़ा हुआ और बोला- “सर जैसे आप.., घर में और दूसरी क्लासेस में इंग्लिश पढ़ाते हैं जबकि यहां हमको हुमन रिसोर्स मैनेजमेंट..,” ऐसा उत्तर सुनकर बाकी स्टूडेंट ही नहीं वह टीचर भी जाते जाते मुस्कुरा दिए।

आज ग्रामीण पृष्ठभूमि का हर पिता अपने बच्चों को इंजीनियरिंग कराने की सोचता है। आज शहर – शहर, कस्बे – कस्बे प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेजेस की बहार है। शिक्षा में इस तरह के बढ़ते व्यवसाईकरण की जो परिणिति हुई है उसका दूसरा उदाहरण यहीं से है। गांव में मेरे एक परिचित के यहां शादी होने वाली थी जिसका निमंत्रण पत्र मुझे मिला। जिस लड़के की शादी थी, वह इंजीनियरिंग थर्ड ईयर में था किसी प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में। बात बात में मैंने उसके गार्जियन से पूछा कि अभी थर्ड ईयर में है उसको इंजीनियरिंग के बाद सेटल हो जाने देते। उसके पैरेंट ने जो बात कही वह चौंकाने वाली थी, वह बोले – “बेटा अभी थर्ड ईयर में है, खूब रिश्ते आ रहे हैं; रिश्तेदारों को हम बताते हैं कि लड़का इंजीनियरिंग कर रहा है। यह इंजीनियरिंग शब्द सुनकर लड़की वाले मोल भाव कर लेते हैं। अभी थर्ड ईयर में है, इंजीनियरिंग की छाप है इसलिए अच्छे घर का रिश्ता और अच्छा दहेज मिल रहा है; फोर्थ ईयर के बाद जब लड़का घर बैठ जाएगा तो कोई नहीं पूछेगा।

पिछले कुछ सालों में कितनी बार ऐसी घटनाएं मीडिया में पब्लिश हुई कि किसी सरकारी विभाग अथवा न्यायालय में एक चपरासी की वांट निकलती है जिसमें लाखों की संख्या में MBA ,इंजीनियरिंग ग्रेजुएट बच्चे अप्लाई करते हैं। आज की व्यवसायिक शिक्षा प्रणाली में इनकांपिटेंट भाषाई ग्रैजुएट्स की एक फोर्स तैयार होती जा रही है। यह बात भी सही है कि भारत विकास और तरक्की की राह में अग्रसर है, नई शिक्षा व्यवस्था में एक बड़ी वर्कफोर्स तैयार हुई है जो न केवल भारत अपितु विदेशों में मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छा काम कर रही है। किंतु यह सिक्के का एक पहलू है, क्योंकि ऐसे ग्रैजुएट्स की एक सीमित संख्या है। ग्रामीण पृष्ठभूमि के हिंदी या स्थानीय भाषा- भाषी सरकारी स्कूलों में पढ़े और अब बेरोजगार हो चुके, अपनी डिग्री के लेवल की नौकरी ना मिलने पर यहां वहां घूमते ग्रैजुएट्स का क्या?

“तेल बेच के तकनीकी शिक्षा देने वाली व्यवस्था”-
मैं जब सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था तो अपने किसी मित्र के यहां बैठा हुआ था। मुझे यहां एक सज्जन मिले, जिनसे बातचीत हुई तो बात-बात में उन्होंने बताया कि वह दिल्ली जा रहे हैं। मैंने पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें एक इंजीनियरिंग कॉलेज खोलना है, उनके क्षेत्रीय सांसद केंद्र में मंत्री हैं जिनकी विधायक जी से बात कराई है और उनसे मिलने इसी काम से वह दिल्ली जा रहे हैं। मैंने पूछा आप करते क्या हैं? तो उन्होंने बताया- “वैसे तो मैं ज्यादा पढ़ा – लिखा नहीं हूं, किंतु मेरा तेल पिराई का पुश्तैनी बिजनेस है। पिछले सालों मैंने देखा है कि इंजीनियरिंग का अच्छा क्रेज है, काउंसलिंग में सभी ब्रांचेस फुल जा रही हैं। कुछ पैसे हैं, एक किराए की प्राइवेट बिल्डिंग मैंने देखी है, बाद में एक बिल्डिंग खड़ी कर लूंगा। इंजीनियरिंग कॉलेज चल निकला तो बड़ा काम हो जाएगा। अभी मैं तेल बेचता हूं, तेल बेचकर मैंने पैसा कमाया पर इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूशन में भी खूब पैसा है..”। यानी ये भाई साहब जो अभी तक तेल बेच के पैसा कमा रहे थे, अब वे इंजीनियरिंग कॉलेज से पैसा छापेंगे।

भोपाल इंदौर के कितने ही इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजेस को मैं जनता हूं, जिनका स्वामित्व प्रदेश में कुछ बड़े शराब ठेकेदार या इनके कार्टेल के पास है, इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जिनके बारे में मैं दावे से कह सकता हूं कि बौद्धिक प्रतिभा छोड़िए इन्हें ठीक से लिखना पढ़ना नहीं आता। शिक्षा का व्यवसाईकरण कर शिक्षा को लूट का माध्यम बनाकर चलने वाली मानसिकता का ऐसा जवाब और इस तरह की सोच! सिस्टम को डिज़ाइन करने वालों पर एक तमाचा नहीं तो और क्या है?

भोपाल में एक बड़ा मीडिया हाउस है; मुझे याद है जब मैं 2006 में पहली बार भोपाल आया था एमपी नगर के एक कोने में कुछ झुग्गियां और एक छोटा बुक मार्केट था। अगले तीन-चार साल में इनके द्वारा एक छोटी लीज पर यहां एक भव्य कॉमर्शियल प्राइवेट इमारत खड़ी कर दी गई। यही मीडिया हाउस एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस भी चलाता है। बड़ा तालाब केचमेंट एरिया से लगा, टाइगर मोमेंट एरिया जंगल पहाड़ के बीच 60-70 एकड़ में फैला एक बड़ा आधुनिक स्कूल। हमारे एक साथी बेटे का एडमिशन कराने गए और मुझसे पूछने लगे – बहुत बड़ा ग्रीन एरिया है, पूरा कैंपस देखा क्या? मैं बोला हां, पर आज नहीं, पहले कभी देखा था। पूरी जमीन सरकार की और जंगल फॉरेस्ट डिपार्मेंट का, करोड़ों की जमीन मात्र 99 रुपए की लीज पर, अच्छा ही होगा..।

भारत में शिक्षा व्यवस्था से सरकारें धीरे-धीरे बाहर हो रही हैं .पूरा सिस्टम प्राइवेट सेक्टर के हाथों में आ चुका है
देश में अमीरी गरीबी का भेद आज भी है
तो फिर यदि आप सक्षम है ।तो पैसा देके आपको यहां सब कुछ मिलेगा।भाड़े की शिक्षा और शिक्षा के मंदिर की बिल्डिंग के लिए खाली जमीन.. लाखों करोड़ों देके नहीं,अनंत काल के लिए,
बस ₹99 की लीज पर..और बाकी के लिए मध्याह्न भोजन वाले सरकारी स्कूल हैं ना..

 

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