उदयपुरा रायसेन।लगातार 58 वर्षों से एक उत्सव के रूप में चलते आ रहे श्री रामचरितमानस सम्मेलन पचामा में मुख्य कथा व्यास नित्यानंद गिरि महाराज ने संत की व्याख्या करते हुए कहा कि केबल भगवा वस्त्र धारण कर लेने से संत नहीं होते संत तो निर्मल वृत्ति से होते हैं , संत के लक्षण बताते हुए कहा जिसके अंदर सहनशीलता, दया करुणा, हो वह संत हैं , जो अजातशत्रु है वह संत हैं , दूसरों के दुख को देखकर जिसके अंदर करुणा का भाव आ जाए एवं दूसरों की सुख को देखकर प्रेम का भाव आ जाए वह संत है , सत्संग में आगे कहा की भागवत गीता में कहा गया है कि यह संसार परम्परा से अविनाशी है, यहां सभी थोड़े समय के लिए एक दूसरे के साथी है, संयोग वियोग संसार का नियम है । जिस प्रकार पानी में हजारों तिनके इकट्ठे हो जाते हैं , और पानी का तेज झोंका आने पर सभी बिखर जाते हैं इस तरह इस संसार के सारे रिश्ते नाते हैं यह संयोग बस इकट्ठे हुए हैं, इनका वियोग होना निश्चित है , इस सहयोग वियोग के दुख से बचने का एकमात्र उपाय है भगवान का स्मरण और संतों का संग अर्थात सत्संग, सत्संग रूपी नौका में बैठकर इस कलयुग से बचा जा सकता है । मानव सम्मेलन में सुरेंद्र कुमार शास्त्री, विष्णु दत्त शास्त्री, भोपाल सुदामा शास्त्री द्वारा भी मानस प्रसंग सुनने को प्राप्त हुए ।
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