शिवपुरी । जिले के सहरिया आदिवासी समुदाय के खिलाफ पुलिस प्रताड़ना के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। हाल ही में, नरवर थाना की मगरोनी पुलिस चौकी क्षेत्र की एक महिला, कुसुमबाई आदिवासी के साथ पुलिस की निर्ममता और आदिवासी समुदाय की अनदेखी का एक और भयावह उदाहरण प्रकाश में आया है । अपने अपमान व पुलिस दरोगा की पिटाई से अस्वस्थ हुई कुसुमबाई, जो मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करती हैं, ने अपनी आपबीती सुनाई, जो कि सरकारी व्यवस्था की विफलता और न्याय की आस में भटकने वाली गरीबों की दर्दनाक दास्तां का प्रतीक बन गई है। महिला ने 3 माह में पुलिस अधिकारियों को कई आवेदन दिये मगर उसकी फरियाद पर कोई कार्यवाही नहीं हुई ।
कुसुमबाई आदिवासी के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में उनकी तीन बार चोरी हो चुकी है। पहली बार दो साल पहले उनकी दो साइकिलें चोरी हुईं थीं, जिनकी चोरी करने का संदेह उन्हीं के गांव के एक युवक, किशन आदिवासी पर था। जब कुसुमबाई ने साइकिलें बरामद कर लीं, तबसे किशन और उनके बीच तनाव बढ़ गया। दूसरी बार, अक्टूबर 2023 में उनके 50,000 रुपये की चोरी हो गई, जिसकी रिपोर्ट उन्होंने पुलिस और 181 पर की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। तीसरी बार, मार्च 2024 में, उनके घर से एक मोबाइल फोन और अन्य सामान चोरी हो गया, जिसका संदेह फिर से किशन पर ही था।
जब कुसुमबाई चोरी की शिकायत लेकर मगरौनी चौकी पहुंचीं, तो उन्हें न्याय मिलने की बजाय दमन का सामना करना पड़ा। पुलिस ने उन पर अनर्गल आरोप लगाए कि उनके पास इतने पैसे कहां से आए और जबरन उनसे कागजों पर हस्ताक्षर करवाने का प्रयास किया। जब कुसुमबाई ने अनपढ़ होने के कारण हस्ताक्षर करने से इनकार किया, तो पुलिस ने उनके साथ बर्बरता की। उनके साथ मारपीट की गई, जिससे उन्हें सिर पर गंभीर चोटें आईं और तब से उन्हें लगातार चक्कर आ रहे हैं। उनकी सेहत भी इस घटना के बाद से खराब है, और उन्हें नरवर में इलाज कराना पड़ा।
आदिवासी समुदाय पर बढ़ता अत्याचार
कुसुमबाई का मामला कोई एकल घटना नहीं है। शिवपुरी, विशेषकर सहरिया आदिवासियों, के खिलाफ पुलिस प्रताड़ना के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। थानों में उनकी रिपोर्टों पर ध्यान नहीं दिया जाता, बल्कि उन्हें और अधिक परेशान किया जाता है। यह मामला पुलिस और प्रशासन की लापरवाही और आदिवासी समाज के प्रति असंवेदनशीलता को उजागर करता है। सहरिया क्रांति आंदोलन के नेता और सामाजिक कार्यकर्ता इन मामलों को लेकर लगातार आवाज उठा रहे हैं, लेकिन स्थिति में कोई सुधार नहीं दिख रहा है।
सहरिया क्रांति संचालक संजय बेचैन कहते हैं कि कुसुमबाई और उनके जैसे सैकड़ों आदिवासी न्याय की आस में भटक रहे हैं। कुसुमबाई ने अधिकारियों से इस मामले की जांच करने और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है। यदि जल्द ही इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति आदिवासी समुदाय के गुस्से को और भड़का सकता है।
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