रिपोर्ट देवेश पाण्डेय सिलवानी रायसेन
कहाबत है कि जिसकी पैर फटी ना बिमाई बो क्या जाने पीर पराई जब तक व्यक्ति के शरीर में दर्द नहीं होता वह किसी दूसरे के दर्द को समझ नहीं पाता इसी का जीता जागता उदाहरण सिलवानी तहसील मुख्यालय के महज 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित आदिवासी बाहुल्य ग्राम ककरुआ में एक छोटा सा प्राथमिक शाला स्कूल जहां पर पदस्थ शिक्षक हेमराज प्रजापति लगातार अपने स्कूल टाइम में बच्चों को पढ़ाने के लिए जाते थे और तय समय पर बच्चों को शिक्षा अध्ययन करा कर वापस अपने घर सिलवानी आ जाते थे लेकिन उन्होंने देखा कि इस भीषण गर्मी में जब वह अपने विद्यालय जा रहे थे तो रास्ते में उनको कई बच्चे ऐसे मिले जिनके पैरों में चप्पल या जूते नहीं थे क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र पूरा जंगल क्षेत्र लगा हुआ है वहां पर आसपास पूरा पथरीला क्षेत्र है जिसकी वजह से पत्थरों पर सुबह से पढ़ने वाली धूप उन पत्थरों को गर्म तवे के समान कर चुकी थी जिस पर कक्षा 1 से लेकर 5 तक आने वाले बच्चों के नन्हें-नन्हें पैरों में सड़क के पथरीले पत्थरों की तपिश शायद सहन नहीं कर पा रही थी जिसको लेकर शिक्षक हेमराज मास्टर की जाते समय जब उनके चेहरों पर उस तपन को लेकर नजर पड़ी तो उनका दिल पसीज गया और उन्हें लगा कि जब इस भीषण गर्मी में हमें इतनी गर्मी लग रही है और हम रोज नए नए जूते चप्पल पहनते हैं वही है नन्हे मुन्ने बच्चे नंगे पैर कैसे विद्यालय आते हैं
उन्होंने अपनी सैलरी के पैसों से तुरंत दूसरे दिन सभी बच्चों के लिए यह ज्ञान के विद्यालय में लगभग 50 बच्चे हैं उन सभी के लिए चप्पलों की व्यवस्था की जिससे कि वह इस तपते हुए धरती पर नंगे पैर विद्यालय ना आए और यकीन मानिए कि इस छोटे से प्रयास से उन बच्चों के चेहरे पर एक अलग ही मुस्कुराहट दिखाई दे देती है जब मैंने इस बीच इस विषय में उनके विचार जाने दो मुझे भी लगा कि वास्तव में आज भी नेक दिल इंसान इस भूमंडल पर रहते हैं आज उन्होंने प्रभारी का पदभार भी ग्रहण किया है उन्होंने बताया कि आने वाले समय में मैं इस स्कूल को सिलवानी ब्लॉक का नंबर वन स्कूल बनाकर छोडूंगा उनकी इस लग्न एवं मेहनत से सभी को यकीन है कि एक दिन वह यह कारनामा भी करके दिखाएंगे