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मोदी का करिश्माई नेतृत्व और कांग्रेस के लिए आत्मचिंतन की दरकार-अरुण पटेल

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आलेख

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों से जो तीन संदेश उभर कर सामने आये हैं उनके अनुसार जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का करिश्माई नेतृत्व पूरे उभार पर है और उस पर जन-स्वीकृति की मुहर लग रही है तो वहीं दूसरी ओर धीरे-धीरे कांग्रेस अपनी प्रासंगिकता और साख मतदाताओं के बीच खोती जा रही है। तीसरे पंजाब में आम आदमी पार्टी की सुनामी जिसने अभी तक के सभी स्थापित दिग्गजों को धूल-धूसरित कर दिया, वह यह बतलाता है कि जो पार्टी व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करने की बात करती है और पूर्व में उसका नेता ऐसा करके दिखा चुका है उसके वायदों पर मतदाता भरोसा करेगा तथा वह दल बड़े से बड़े महारथियों को भी चुनाव में पराजित कर सकता है। उत्तरप्रदेश के चुनावी नतीजों ने भले ही भाजपा की शानदार जीत की इबारत दीवारों पर साफ-साफ लिख दी हो लेकिन उसमें उसके लिए एक सतर्कता का संदेश भी छिपा हुआ है, क्योंकि वहां उसने 57 सीटें गंवा दी हैं। उसके उपमुख्यमंत्री एवं पिछड़ों के बड़े नेता जो मुख्यमंत्री पद के दावेदार रहे हैं केशव प्रसाद मौर्य चुनाव हार गए हैं। समाजवादी पार्टी सुप्रीमो अखिलेश यादव का यह कथन भी इसी ओर इंगित करता है जिसमें उन्होंने कहा है कि भाजपा की सीटों को घटाया जा सकता है यह हमारे कार्यकर्ताओं की मेहनत और मतदाताओं के समर्थन ने सिद्ध कर दिया है। लगता है अब विपक्ष इसी रणनीति पर काम करता नजर आयेगा। जहां तक कांग्रेस का सवाल है अब उसके सामने एक ही रास्ता बचा है कि वह पूरी गंभीरता के साथ आत्ममंथन करे और जो भी निष्कर्ष निकलें उस पर तत्काल अमल करे। वैसे तो हर हार के बाद कांग्रेस मंथन करती है और बाद में उसके निष्कर्षों को ठंडे बस्ते में डाल देती है जबकि आज आवश्यकता इस बात की है कि वह ऐसा करते समय अपने-पराये के मोहपाश से मुक्त हो और वास्तविक मूल्यांकन कर उसके अनुरुप कदम उठाये। यदि समीक्षा राग-दरबारी स्टाइल में होती है तो फिर उससे कांग्रेस की दशा व दिशा में किसी सुधार की उम्मीद नहीं की जाना चाहिए। कांग्रेस को यह समझना होगा कि वह अपने तौर-तरीकों में आमूल-चूल बदलाव करे और वह यदि ऐसा नहीं करती है तो उसकी हालत एक समय की शाही सवारी रही एम्बेसडर कार की तरह हो जाने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।
कांग्रेस नेतृत्व लम्बे समय से दुविधा की स्थिति में है इससे निकलने के लिए कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से आत्ममंथन कर तत्काल फौरी और कड़े निर्णय करने वाली कार्यप्रणाली विकसित करने की दरकार है। कांग्रेस के तेजी से खोते जनाधार का एक कारण यह भी है कि उसका नेतृत्व एनजीओ वालों से अधिक प्रभावित रहा है और अभी भी उसी के भ्रमजाल में है जबकि यह वह वर्ग है जो सिद्धान्त की तो बड़ी-बड़ी बातें करता है लेकिन वह व्यवहारिक धरातल पर जो भाषा बोलता है उसका राजनीतिक पेचीदगियों तथा जन-सरोकारों से भले ही सम्बंध सरसरी तौर पर दिखता हो लेकिन उसके तौर-तरीके और भाषा आमजन की समझ से परे होती है। कांग्रेस को एक वैकल्पिक-वैचारिक लड़ाई के लिए तैयार होना होगा और उसके लिए अन्य समान विचारधारा वाले लोगों को जोड़कर आगे बढ़ना होगा। उसे इस अहम् को भी छोड़ना होगा कि लोग हमारे पास आयें, उसकी जगह उसे उनके बीच जाकर उनकी खोज कर एकजुट करना होगा। वर्तमान दौर में राजनीति चेहरों के इर्द-गिर्द सिमट रही है और वह भी ऐसे चेहरों के बीच जिन पर लोग भरोसा कर सकें। इसलिए कांग्रेस को भी क्षेत्रीय नेतृत्व को उभारना होगा और एक लम्बी लड़ाई के लिए अपने आपको ढालना होगा। केवल चुनाव के समय सक्रिय होकर उस दल का मुकाबला नहीं कर सकते जिसके पास एक मजबूत संगठन है, मजबूत वैचारिक पृष्ठभूमि है और संघ परिवार की ताकत हो। भाजपा के कुछ मुद्दों को अपना कर उस पर चलते हुए उसकी कार्बन कापी बनने की जो कोशिश कांग्रेस में परवान चढ़ी है उसका ही परिणाम है कि उसकी साख धीरे धीरे कम होती जा रही है। ट्वीटर और सोशल मीडिया का अपना महत्व है लेकिन उसके भरोसे कोई बड़ा लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता इसके लिए कांग्रेस को मैदान में उतरना पड़ेगा अन्यथा उसके लिए यह संकट भी खड़ा हो सकता है कि अब जो दो-ध्रुवीय राजनीति का दौर प्रारंभ हो गया है उसमें वह आने वाले विधानसभा चुनावों में गुजरात, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में भी अपनी मौजूदा स्थिति से पीछे खिसक जायेगी, क्योंकि आम आदमी पार्टी पंजाब की जीत से उत्साहित होकर इन चुनावों में कांग्रेस के आधार को खिसकाने की भूमिका अब अधिक प्रभावी ढंग से कर सकती है।
कांग्रेस तो धीरे-धीरे जमीन खोती जा रही है लेकिन लगता है अब 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए जो रणनीति पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव की है वह यदि परवान चढ़ती है तो फिर उसे उस मोर्चे में भी दरकिनार किया जा सकता है जो मोदी सरकार का विकल्प बनना चाहता है और ऐसा करने की कोशिशें तेज हो रही हैं। ममता बनर्जी ने पांच राज्यों में विपक्षी दलों की करारी पराजय के बाद सुझाव दिया है कि अब कांग्रेस का इंतजार करने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि वह अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। सभी विपक्षी दलों को 2024 के लोकसभा चुनाव एक होकर लड़ना चाहिए, यदि ऐसा हो सका तो भाजपा को परास्त करने का रास्ता निकल सकता है। ममता बनर्जी ने हालांकि बाद में यही भी कहा कि कांग्रेस चाहे तो हम उससे मिलकर चुनाव लड़ सकते हैं। ममता बनर्जी इस बात से भी सहमत नहीं हैं कि इन राज्यों के चुनाव परिणामों ने 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए लोगों की मनःस्थिति प्रकट कर दी है। उनका कहना है कि भाजपा की यह जीत जनादेश का प्रतिबिम्ब नहीं है। ममता बनर्जी और केसीआर जो सपना देख रहे हैं उसमें सबसे बड़ी बाधा महाराष्ट्र की राजनीतिक परिस्थितियां हैं जहां कांग्रेस वहां की सरकार में शामिल है तथा शरद पवार एवं शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे कांग्रेस का साथ छोड़ने के मूड में नहीं हैं, क्योंकि उनकी सरकार को कांग्रेस का समर्थन जरुरी है और दूसरे वहां की सरकार में आपसी मतभेद हैं ऐसा कोई संकेत फिलहाल नहीं मिल रहा है और तीनों ही घटक पूरी मजबूती से साथ खड़े हैं। शायद यही कारण है कि ममता बनर्जी ने कांग्रेस को भी साथ लेने यह बात कह दी है। एक तरफ क्षेत्रीय दल कांग्रेस को अलग-थलग करने की दिशा में सोचने लगे हैं तो वहीं दूसरी ओर कांग्रेस में बदलाव को लेकर असंतुष्ट नेता भी लामबद्ध हो रहे हैं। असंतुष्ट नेताओं के समूह जी-23 ने अब इस मसले पर निर्णायक कदम बढ़ाने की नीति पर काम करना चालू कर दिया है। फिलहाल तो यही संकेत मिल रहे हैं कि ये नेता कांग्रेस के लगातार सिकुड़ते जनाधार और संगठनात्मक विफलता पर बार-बार पर्दा डाल कर बच निकलने की हाईकमान की रणनीति को चुनौती देंगे। लेकिन यह देखने वाली बात होगी कि वह कुछ गुल खिला पाते हैं या काफी के प्याले में उठे तूफान से अधिक नहीं कर पाते हैं।
और यह भी
कुछ वर्तमान और कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए भी ये चुनावी नतीजे चौंकाने वाले रहे जिनमें उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी शामिल हैं। धामी भले ही चुनाव हार गये हों लेकिन उनके चेहरे को आगे कर पार्टी ने जीत हासिल की है। वैसे जहां तक चुनाव नतीजों का सवाल है एक बात साफ है कि नरेन्द्र मोदी ही भाजपा की इस जीत के चेहरे और शिल्पकार हैं और जहां-जहां नेतृत्व कमजोर था वहां-वहां उनके कारण ही भाजपा को सफलता मिली। पंजाब में भले ही आज भाजपा चुनाव हार गयी हो लेकिन आने वाले समय में उसका जनाधार वहां अकाली दल से अधिक होने की संभावना साफ नजर आ रही है और उसके मत प्रतिशत में भी भले ही कम, लेकिन कुछ वृद्धि भी हुई है। उत्तराखंड में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता और एक प्रकार से चेहरा रहे हरीश रावत तथा पंजाब प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, पूर्व मुख्यमंत्री केप्टन अमरिन्दर सिंह और अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल भी चुनाव हार गये हैं।

-लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक है
-सम्पर्क:9425019804, 7999673990

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