जैन मुनि द्वारा 8 साल से 35 साल तक के
श्रावको को संस्कार दिए गये एवम् श्रावको से सप्त व्यसन का त्याग कराया गया
ऋषभ जैन ओबैदुल्लगंज रायसेन
आज सुबह श्री दिगम्बर जैन मंदिर में आचार्य श्री विशुद्ध सागर महाराज के परम शिष्या मुनि श्री प्रसन सागर जी एवम् मुनि श्री साध्य सागर जी की उपस्थिती में श्रावक उपनयन संस्कार का आयोजन हुआ।जिसमे 8 साल से 35 साल तक के श्रावको को संस्कार दिए गये एवम् श्रावको से सप्त व्यसन का त्याग कराया गया।जैसे जुआ खेलना, मांस मद, वैश्या गमन,शिकार,चोरी ,पर स्त्री रमण, सातो व्यसन का त्याग श्रावक से कराया गया। महाराज श्री प्रसन सागर जी ने संस्कार का महत्व बताते हुए कहा की सिर्फ़ नाम से जैन होने और संस्कार से जैन होने में उतना ही महत्व है जितना की सवर्ग और मोक्ष में है। जैन संस्कार जीवन को मोक्ष की राह पर चलने में एवम् आत्मा को भगवान बनाने का मार्ग दिखाते है। संस्कार वही है जो संस्कृति बन जाये और संस्कृति वही जो अंत तक साथ रहे।
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श्रावक उपनयन संस्कार में ओबैदुलगंज के २० बालकों ने संस्कार ग्रहण किए। अनुज जैन ,अंशुल जैन ,सुभम् जैन, सम्यक् जैन,उर जैन,पल जैन, आदि ,अनादि ,आदर्श, बंटी जैन, सुभम् वर्धमान आदि ने जुआ खेलना, मांस मद, वैश्या गमन,शिकार,चोरी ,पर स्त्री रमण, सातो व्यसन का त्याग कर संस्कार लिए। मुनि श्री प्रसन सागर जी ने श्रावकों के सिर एवम् हाथ पर साथिया बना कर मंत्रों से संस्कार दिये वही साध्य सागर जी ने मंत्रों से श्रावकों को जनेओ धारण करा पर सातो व्यसन के बारे में बताया।एवम् श्रावकों को माला और इस्मति दे कर माला (जप) देने का महत्व बताया। इसके पश्चात मुनि श्री की आहार चर्या सम्पन्न हुई। तथा सभी श्रावकगण भोपाल में विराजमान आचार्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज का आशीर्वाद लेने गये। आचार्य श्री ने श्रावकों को गुरु मंत्र दिया और उसकी जप देने से क्या क्या फल श्रावक को मिल सकता है मंत्रों की महिमा बताई।