झाड़ियों और पेड़ों से ढंकने लगी छतरपुर-पन्ना जिले की सीमा के निकट दिखाई देती वर्धा की गढ़ी और बावड़ी
दमोह से धीरज जॉनसन की रिपोर्ट
दमोह जिला मुख्यालय से करीब 76 किमी दूर छतरपुर-पन्ना जिले की सीमा के निकट हटा तहसील के ग्राम वर्धा में अतीत के वैभव को प्रदर्शित करता किलानुमा स्थान जिसे स्थानीय लोग गढ़ी भी कहते है दिखाई देती है जिसके भग्नावशेष इतिहास की खूबसूरती का वर्णन करते प्रतीत होते है जो अब जहरीले जीव-जंतु,खरपतवार, झाड़ियां और पेड़ से ढकने लगी है परंतु अभी भी यहां की कुछ दीवार और बुर्ज सुरक्षित दिखाई देते है, जहां पहुंचने के लिए पथरीले, उबड़ खाबड़ और छोटे छोटे गड्ढों वाले मार्ग को पार करना पड़ता है क्योंकि अब तक यहां पहुंचने के लिए रास्ता नहीं है।

इसके बाहरी और खेत और एक तरफ पत्थर को रखकर बनाई गई दीवार दिखाई देती है जिसे स्थानीय बोली में खकरी भी कहा जाता है। किले के भीतर प्रवेश करने के लिए घनी झाड़ियों और दीवार के टूटे हुए हिस्सों के मध्य से पहुंचना पड़ता है जो काफी मुश्किल भी है। इनके बुर्ज भी जीर्ण शीर्ण हो चुके है पर वहां अब तक बनी हुई सीढ़ियों से ऊपर पहुंचने के बाद बाहर का खूबसूरत नजारा और झाड़ियों और पेड़ से ढके हुए किले के अन्य स्थान भी दिखाई देते है।

गढ़ी के अंदर एक चबूतरा भी बना हुआ दिखाई देता है स्थानीय निवासियों ने बताया कि निकट के गांव के लोग आषाढ़ मास में यहां पूजा करने आते है, अगर इस स्थान की सफाई और संरक्षित कर दिया जाए तो लोगों का आवागमन यहां बढ़ जाएगा।

भीतरी हिस्से में ही एक खूबसूरत बावड़ी है पर पेड़ और झाड़ियों के कारण इसका थोड़ा हिस्सा ही दिखाई देता है इसके नीचे तक जाने के लिए सीढ़ियां भी है पर भरा हुआ पानी गंदा प्रतीत होता है इन्हे देखकर लगता है कि देखरेख के अभाव में ये अपने अस्तित्व से संघर्ष कर रहे है।
गौरतलब है कि जिले में अभी भी बहुत से ऐसे प्राचीन स्थान है जिन्हें संरक्षित और पर्यटन की दृष्टि से महत्व दिया जा सकता है। अगर यहां भी पहुंच मार्ग बन जाए तो शायद ऐतिहासिक महत्व के इस स्थान का अस्तित्व बचा रहेगा अन्यथा झाड़ियां और पेड़ जल्द ही इसे जंगल और खंडहर में तब्दील कर देंगे।