आधुनिक युग में भी तीन जिलों में घोड़ा से करते थे यात्रा
90 वर्ष से अधिक की आयु में ली अंतिम विदाई, जामवंत सरोवर के तट पर हुआ अंतिम संस्कार; विभिन्न जिलों से पहुँचे नागरिकों ने अर्पित की श्रद्धांजलि
कमल याज्ञवल्क्य बरेली रायसेन
वैदिक कर्मकांड के क्षेत्र में अपनी अगाध विद्वत्ता, तेजस्वी व्यक्तित्व और धार्मिक अनुष्ठानों की विशिष्ट पहचान के लिए विख्यात परम श्रद्धेय पंडित श्री रामसेवक शर्मा ‘घोड़ा वाले दादा’ के देवलोक गमन से जामगढ़ सहित आसपास के ग्रामीण अंचलों और रायसेन, नर्मदापुरम एवं नरसिंहपुर जिलों में शोक की लहर व्याप्त हो गई। उनके निधन से धर्म, अध्यात्म और वैदिक कर्मकांड के क्षेत्र में गहरी क्षति हुई है।
एकादशी, की सुबह 90 वर्ष से अधिक की आयु में उन्होंने देह त्याग दी। वे कर्मकांड के ऐसे प्रख्यात विद्वान थे, जिनकी विद्वत्ता और धार्मिक अनुष्ठानों में निपुणता के कारण अनेक क्षेत्रों में उनका विशेष सम्मान था। संस्कृत पाठशाला जामगढ़ के संस्थापक कर्मकांड भास्कर परम पूज्य गुरूजी चित्रकूट वालों के परम प्रिय एवं कृपापात्र रहे पंडित श्री रामसेवक जी महाराज ने अपने ज्ञान, साधना और तेजस्वी व्यक्तित्व से विशिष्ट पहचान स्थापित की थी।
उनके देवलोक गमन का समाचार मिलते ही जामगढ़ ग्राम सहित आसपास के गांवों तथा रायसेन, नर्मदापुरम और नरसिंहपुर जिलों से बड़ी संख्या में नागरिक, श्रद्धालु और परिचित उनके अंतिम दर्शन एवं अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने पहुँचे। सभी ने नम आंखों से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए दिवंगत पुण्यात्मा के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन किया।

जामवंत सरोवर के तट पर दी गई अंतिम विदाई
पूज्य पंडित श्री रामसेवक शर्मा जी का अंतिम संस्कार जामगढ़ स्थित पवित्र जामवंत सरोवर के किनारे वैदिक परंपराओं के अनुरूप विद्वान विप्रों के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। सेना से सेवानिवृत्त उनके पुत्र राजकिशोर शर्मा और छोटे पुत्र राजेश शर्मा ने पारिवारिक एवं धार्मिक परंपराओं के अनुसार उन्हें मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी। इस अवसर पर उपस्थित जनसमुदाय ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की और शोकाकुल परिवार के प्रति संवेदनाएं व्यक्त कीं।
धर्म और कर्मकांड के क्षेत्र में सदैव स्मरणीय रहेंगे
पंडित श्री रामसेवक जी महाराज का जीवन वैदिक कर्मकांड, धार्मिक आस्था और विद्वत परंपरा के प्रति समर्पण का प्रतीक रहा। उनकी विद्वत्ता, सरलता और तेजस्वी व्यक्तित्व से परिचित लोगों के लिए उनका जाना अपूरणीय क्षति है। उनका व्यक्तित्व और धार्मिक क्षेत्र में योगदान श्रद्धालुजनों के हृदय में सदैव स्मरणीय रहेगा।
आधुनिक युग में भी तीन जिलों में घोड़ा से करते थे यात्रा
विद्वान पंडित रामसेवक शर्मा के जीवन काल की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इस आधुनिक युग में भी कुछ बर्ष पूर्व तक वह अपने शिष्यों के यहाँ अनुष्ठान कराने घोड़ा से ही जाते रहे। रायसेन सहित नर्मदा पुरम तथा नरसिंहपुर आदि जिलों में उनके शिष्य परिवारों के यहाँ जब भी कोई पूजा पाठ या अन्य वैदिक अनुष्ठान होते थे तो पंडित रामसेवक शर्मा जी अपने स्वयं के घोड़े पर सवार होकर जाते थे। इसलिए अधिकतर उन्हें लोग “घोड़ा वाले दादा” के नाम से ही जानते थे।