आलेख
संदीप भम्मरकर
गुना की एक छोटी सी पुलिस चौकी… और वहां पकड़ी गई एक करोड़ की रकम… कहानी यहीं खत्म हो जानी थी। लेकिन 20 लाख में “सेटलमेंट” हुआ… फोन गुजरात से आया… और अब सवाल दिल्ली तक जा पहुंचा है। आखिर ये सिर्फ कैश था… या किसी बड़े खेल की कड़ी? मामला दब चुका था, फाइल बंद हो चुकी थी… लेकिन ग्वालियर अंचल के ही एक अफसर ने “लीक” कर पूरी कहानी को सड़कों पर ला दिया। अब तक कार्रवाई पुलिस तक सीमित है, लेकिन असली सवाल वहीं खड़ा है कि वो एक करोड़ आखिर गया कहां? और उससे भी बड़ा सवाल… ये पैसा किसके लिए था? सूत्रों की गलियों में अब एक नई फुसफुसाहट तैर रही है… कहा जा रहा है कि ये रकम दिल्ली के किसी बड़े नेता से जुड़ी थी। मुख्यमंत्री की सख्त कार्रवाई के बाद मामला और गरमा गया है… लेकिन सियासत की ये परतें इतनी आसानी से खुलती नहीं हैं। गुना की चौकी में पकड़ा गया कैश अब सिर्फ “सबूत” नहीं रहा… ये एक सवाल बन चुका है… जिसका जवाब शायद फाइलों में नहीं… बल्कि सत्ता के गलियारों में छुपा है।

बाबा का कांग्रेस में हिन्दू बम
आदिवासी इलाकों में धर्म और पहचान को लेकर नैरेटिव सेट करने में जुटे उमंग सिंघार की मुहिम को उनकी ही पार्टी के भीतर से झटका लग गया है। भागवत कथा वाचक पंडित मोहित नागर ने कांग्रेस के मंच से ऐसा “हिंदू बम” फोड़ा कि सियासत में गूंज दूर तक सुनाई दे रही है। उनका साफ कहना है कि आदिवासी हिंदू ही हैं, उनका अलग कोई धर्म नहीं। दिलचस्प बात ये है कि कुछ ही दिन पहले उमंग सिंघार आदिवासी सभाओं में ठीक इसके उलट बात रखते दिखे थे… जहां वे आदिवासियों को हिंदू न मानने की लाइन पर जोर दे रहे थे। अब हाल ये है कि कांग्रेस में ही दो विचार आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। एक तरफ “पहचान की नई राजनीति”… तो दूसरी तरफ “परंपरा का पुराना पाठ”। सवाल ये है कि ये घटना ये भीतर का टकराव है ये गहरी दरारों का नतीजा हैं। लेकिन बाहर तो क्लीयर हो रहा है कि आदिवासियों के हिन्दू एजेंडे को लेकर कांग्रेस का मैसेज क्लीयर नहीं है।

निगम-मंडल से राज्यसभा का रास्ता
तीन सीटें… एक पक्की… फिर भी कांग्रेस खेमे में बेचैनी? क्या इस बार वोटिंग मशीन नहीं… “मनोविज्ञान” हैक होने वाला है? ये सवाल राज्यसभा चुनाव से पहले फिर से हवा में तैर रहे हैं। वैसे तो “ऑपरेशन लोटस” भूलने वाला कांड नहीं है। लेकिन राज्यसभा चुनाव से पहले कांग्रेसी खेमा फिर उसी एहसास से गुजर रहा है। विजयपुर की हालिया घटना के बाद कांग्रेस का वही दर्द फिर उभरने लगा है कि फिर से कोई “खेल” न हो जाए। सियासी गलियारों में चर्चा है कि बीजेपी की तरफ से एक पुराना लेकिन असरदार फॉर्मूला फिर हवा में तैर रहा है… एक राज्यसभा वोट के बदले निगम-मंडल की कुर्सी! ये कोई नया प्रयोग नहीं है। इससे पहले भी इस तरह के “पैकेज डील” सियासत के मंच पर दिख चुके हैं। अब कांग्रेस के भीतर नजरें अपने ही विधायकों पर टिक गई हैं… कौन नाराज़ है, कौन संतुष्ट… और कौन “ऑफर” के लिए तैयार बैठा है… ये सब बारीकी से तौला जा रहा है। वोटिंग का दिन अभी दूर है… लेकिन सियासी बाज़ार सज चुका है। अब देखना ये है… कांग्रेस का कुनबा एकजुट रहेगा… या फिर कोई “एक वोट” पूरी कहानी बदल देगा?

पीसीसी में फट रही ठेकेदारों की फाइलें
पहले साथ में टेंडर… फिर साथ में ट्रांजेक्शन… और अब सीधे प्रेस कॉन्फ्रेंस! वैसे तो अफसरों और ठेकेदारों के बीच ‘पहले प्यार’ वाला रिश्ता रहता है। ये रिश्ता अक्सर “समझदारी की चाय” पर चलता है। लेकिन जैसे ही रकम की चीनी कम-ज्यादा होती है, रिश्ते में कड़वाहट घुलने लगती है तो नतीजा पॉलिटिकल प्रहार के रूप में बदल रहा है। ऐसे ही “नाराज़ फूफा” अब नया ठिकाना ढूंढ चुके हैं… और वो है प्रदेश कांग्रेस कमेटी का दफ्तर। एक-एक कर ठेकेदार अपने पुराने कांग्रेसी कनेक्शन खंगालते हुए PCC पहुंच रहे हैं… और साथ ला रहे हैं पूरा हिसाब-किताब, फाइलें, और “गुप्त डायरी” का खजाना। इधर PCC में बैठे नेता भी किसी शिकारी बाज से कम नहीं… मुद्दा मिला नहीं कि झपट्टा मारा… और फिर प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए आरोपों के तीर चलाए जा रहे हैं। इन तीरों का निशाना भले अफसर दिखते हों… लेकिन चोट सीधी सरकार पर लग रही है। और इस पूरे खेल का सबसे दिलचस्प किरदार हैं वही ठेकेदार… जो सिस्टम से नाराज़ होकर मैदान में उतरे थे… अब मीडिया में उठती धूल को दूर खड़े होकर ऐसे देख रहे हैं जैसे कोई अपनी ही फिल्म का ट्रेलर एंजॉय कर रहा हो। फाइलें खुल रही हैं… रिश्ते टूट रहे हैं… और सियासत इस पूरे ड्रामे का फ्रंट रो टिकट लेकर बैठी है।
सीधी कार्यवाही से कुनबा नाराज़
सीधी कार्रवाई… और सत्ता का सख्त संदेश! लेकिन इस बार मामला सिर्फ ट्रांसफर-पोस्टिंग का नहीं, पूरे अफसरी कुनबे की धड़कनों का है। सीधी के कलेक्टर और गुना के एसपी पर हुई कार्यवाही के बाद सीएम के गुस्से का शिकार बनने वाले कलेक्टरों की संख्या 10 हो गई है और एसपी जैसे सीनियर आईपीएस अफसरों का आंकड़ा 8 पर पहुंच गया है। वैसे, हटाने की कार्यवाही तो एक परंपरा सी बन चुकी है। लेकिन मौजूदा कार्यवाही के बाद ऊपर के अफसरी कुनबे के कान खड़े कर दिए हैं। चर्चा आईएएस और आईपीएस एसोसिएशन के ग्रुप्स में हुई। अफसर ये कहते सुनाई दिए कि कलेक्टर-एसपी जैसे जिम्मेदार अफसर पर इस तरह का बर्ताव करके हटाना ठीक नहीं है। वैसे, देखा गया है कि एसोसिएशन के नाक-भौंहे चढ़ाने का कोई फायदा नहीं होता। अब क्या असर दिखाई देगा, कहना मुश्किल है।

– लेखक मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हैं।