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राइट क्लिक::सनातनी एकता पर गहरी चोट है यूपी का यह ‘सवर्ण-संघर्ष’…अजय बोकिल

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आलेख

अजय बोकिल

उत्तर प्रदेश में दो सनातनियों के बीच छिड़ी जंग अब खुलकर ‍िजस तरह ब्राह्मण बनाम ठाकुर में तब्दील हो गई है, उससे सबसे ज्यादा खुशी शायद डीएमके जैसी पार्टियों को होगी, जिन्होंने दो साल पहले सनातन पर हमला बोलते हुए इसे मलेरिया और डेंगू जैसा ‘रोग’ बताया था। इसके जवाब में भाजपा और आरएसएस ने सनातन के मुद्दे पर सभी हिंदुअों को एक करने का अभियान चलाया था, जिसकी अब यूपी में खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। यहां लड़ाई धर्मसत्ता बनाम राजसत्ता के साथ-साथ मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ और ज्योतिेषपीठ के शंकराचार्य के बीच हो रही है। योगी जाति से ठाकुर हैं तो शंकराचार्य ब्राह्मण हैं। मौनी अमावस्या पर माघ मेले में मेला प्रशासन द्वारा शंकराचार्य के अपमान से आहत होकर पहले एक ब्राह्मण अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने सिटी मजिस्ट्रेट के पद से इस्तीफा दिया तो जवाब में अयोध्या के जीएएसटी डिप्टी कमिश्नर प्रशांत कुमार सिंह ने अपने (ठाकुर) मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ब्राह्मण शंकराचार्य द्वारा अपमान से दुखी होकर पद से त्यागपत्र दे दिया। अगर यह दुर्भाग्यपूर्ण विवाद यहीं नहीं थमा तो इसकी चिंगारियां यूपी और देश में भी दूर तक फूटेंगीं। लग नहीं रहा कि कोई इस विवाद को खत्म करने में दिलचस्पी ले रहा है, बल्कि इसकी आड़ में अलग चालें चली जा रही हैं। सवाल यह है कि इस योगी बनाम शंकराचार्य प्रकरण में कौन असली टारगेट कौन है? क्योंकि योगी खुलकर शंकराचार्य पर हमला कर उन्हें कालनेमि ( असुर) और नियम कायदों का उल्लंघन करने वाला बता चुके हैं तो दूसरी तरफ पिछड़ी जाति से आने वाले राज्य के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य शंकराचार्य से उनके अपमान के ‍िलए माफी मांग चुके हैं। उधर शंकराचार्य हैं कि अपनी बात पर अड़े हैं और उन्होंने सरकारी पद छोड़ने वाले अंलकार को ब्रा्ह्मणों में अकेला ‘अलंकार’ बताकर उनकी तारीफ की है। अग्निहोत्री ने भी अपने इस्तीफे के साथ राज्य में 56 ब्राह्मण विधायकों के जमीर को चैलेंज किया है कि वो अपमान सहकर भी चुप क्यों हैं तो दूसरी तरफ प्रशांत कुमार सिंह इस बात से व्यथित है कि धर्माधीश शंकराचार्य संवैधानिक रूप से चुने गए मुख्‍यमंत्री को अपमानित कर रहे हैं।
यह अपने आप में अभूतपूर्व एवं अप्रिय स्थिति है और हिंदू एकता के तमाम दावों तथा आंतरिक मतभेद तथा जातिभेद भुलाने की कोशिशों पर पानी फेरने जैसी है। सवाल तो यह उठ रहा है कि अगर सवर्ण भी एक नहीं हो पा रहे हैं तो बाकी हिंदू जातियों का क्या? इसी तरह सनातन का व्यावहारिक अर्थ सत्ता और स्वार्थ के लिए सनातन संघर्ष ही‍ है तो इस सनातन का व्यापक हिंदू एकता के लिए क्या मायने है?
बड़ा सवाल यह भी है कि एक छोटी घटना ने इतना व्यापक और गंभीर रूप कैसे ले लिया कि उनकी गूंज धर्म और राजनी‍ति के साथ- साथ समूचे प्रशासन में भी होने लगी। एक शीर्ष हिंदू संत के अपमान का मुद्दा सवर्ण जातियों में ही ऊर्ध्व विभाजन का कारण कैसे बन गया? अगर वर्णाश्रम व्यवस्था की दो शीर्ष जातियां ब्राह्मण और क्षत्रिय भी एक नहीं हो सकते तो फिर बाकी जातियों को एक जाजम पर लाने के दावों में कितना दम है।
यूपी में यह लड़ाई ब्राह्मणों के आत्म सम्मान की रक्षा और ठाकुरों के वर्चस्व की ही है अथवा इसके पीछे कोई और चाल है, यह अभी स्पष्ट होना है। यह सही है कि देश में ब्राम्हणों की सर्वाधिक यानी करीब 12 फीसदी संख्या यूपी में ही है। इस मायने में ब्राह्मणों का समर्थन या विरोध सत्ता परिवर्तन में अहम भूमिका ‍निभाता आया है। 2007 में ब्राह्मण बसपा के साथ गए तो मायावती की सरकार बनी तो 2012 में ब्राह्मणों के बड़े वर्ग का झुकाव समाजवादी पार्टी की तरफ हुआ तो सपा की सरकार बनी। 2014 में केन्द्र में मोदी सरकार सत्ता में आने के बाद यूपी में ब्राह्मण फिर भाजपा के साथ हुए और आज भी बड़ा तबका भाजपा के साथ ही है। लेकिन शंकराचार्य बनाम योगी प्रकरण से ब्राह्मणों के भगवा जुड़ाव पर भी प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। इस लड़ाई में विपक्ष ब्राह्मणों के साथ है जबकि भाजपा ब्राह्मणों की इस बगावत से शायद यह सोचकर बेफिकर है कि ब्राह्मण भाजपा को छोड़कर जाएंगे कहां? क्योंकि ब्राह्मण तो खुद सनातन की धुरी है। लेकिन यह ‘टेकन फाॅर ग्रांटेड’ वाली स्थिति है। जबकि ब्राह्मणों का मानना है ‍िक योगी राज में उनकी हर स्तर पर न केवल उपेक्षा हो रही है, बल्कि उन्हें अपमानित किया जा रहा है। शंकराचार्य प्रकरण इसका उदाहरण है। उनका यह भी मानना है कि ब्राह्मणों का श्राप जिसे लगा, वो ठिकाने लग गया। जबकि ठाकुरों का मानना है कि अब वक्त बदल चुका है। योगी आदित्यनाथ निर्वाचित मुख्‍यमंत्री हैं और सरकार को हार्ड हिंदुत्व की लाइन पर ही चला रहे हैं। उनका विरोध संवैधानिक सत्ता का ‍िवरोध है, जो किसी भी स्थिति में सहन नहीं‍ किया जा सकता।
हालांकि शंकराचार्य को लेकर संत समाज भी दो भागों में बंटा है। भाजपा समर्थक संतों का कहना है ‍िक प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में शंकराचार्य को संगम स्नान के लिए रथ पर सवार होकर जाने की जिद नहीं करनी चाहिए थी। क्योंकि नियम सभी के लिए बराबर है। जबकि शंकराचार्य का कहना है ‍िक उन्हें प्रशासन ने केवल संगम पर जाने से रोका बल्कि उनके साथ अभद्र व्यवहार भी किया। प्रशासन ने उन्हें नोटिस देकर शंकराचार्य के रूप में वैधता का प्रमाण पत्र मांगा। इसके खिलाफ वो धरने पर बैठे हैं। यही नहीं, प्रशासन ने दूसरे नोटिस में यह चेतावनी भी दी कि अगर शंकराचार्य ने विरोध खत्म नहीं किया तो क्यों न उन्हें माघ मेले में बैन कर ‍िदया जाए। विपक्षी नेताअों का कहना है कि शंकराचार्य का अपमान जानबूझकर किया जा रहा है, क्योंकि वो मुख्‍यमंत्री और उनकी ‘ठकुरैती’ को चुनौती दे रहे हैं। वैसे भी स्वामी ‍अविमुक्तेश्वरानंद का सुर भाजपा और संघ विरोधी ही रहा है। उन्हें जो नोटिस दिया गया, उसका आधार उनकी शंकराचार्य पद पर नियुक्ति की वैधता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहा मामला है। हालांकि शंकराचार्य का दावा है कि कोर्ट ने उनकी नियुक्ति पर कोई रोक नहीं लगाई है। जैसे-जैसे यह मामला अागे बढ़ रहा है कि भाजपा के असंतुष्ट खेमे से भी शंकराचार्य को समर्थन मिल रहा है। लेकिन भाजपा आला कमान का इस मामले में रवैया अभी भी अस्पष्ट है। इस ‘तटस्थता’ के दो मायने निकलते हैं या तो यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ को मुख्यमंत्री पद से हटाने की तैयारी की जा रही है या फिर एक तीर से दो निशाने (योगी और शंकराचार्य) साधे जा रहे हैं, क्योंकि ऐसा न होता तो डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य शंकराचार्य के प्रति इतनी सहानुभूति नहीं दिखाते। दूसरा, इस बहाने (भाजपा विरोधी) शंकराचार्य को उनकी हैसियत बताने की कोशिश की जा रही है। और इसीके चलते राज्य में ब्राह्मणों की नाराजी की भी चिंता नहीं की जा रही है। एक तर्क यह भी है कि भाजपा इस बार विस चुनाव में ‘ब्राह्मण बनाम आॅल’ जातीय ध्रुवीकरण कराकर भी चुनाव जीत सकती है। इसमें यह संदेश भी निहित है कि सनातन की ध्वजा अब पहले की तरह ब्राह्मणों के हाथ में नहीं रही। वह गैर ब्राह्मणों के हाथ में जा चुकी है और ब्राह्मण विरोध के मुद्दे पर ज्यादातर अन्य जातियां भाजपा के साथ हैं। वैसे ब्राह्मणों में भी ‍िकतने शंकराचार्य के समर्थन में हैं, यह दावे से नहीं कहा जा सकता। दूसरे, योगी को यूपी से हटाना इतना आसान नहीं है। शीर्ष स्तर ऐसी परोक्ष कोशिश पिछले लोकसभा चुनाव के समय भी हुई थी, जिसका असर चुनाव नतीजों में साफ दिखा। अगर भाजपा योगी को सीएम पद से हटाती है तो उससे फायदे से ज्यादा नुकसान हो सकता है। हालांकि दूसरी तरफ ब्राह्मणों के छिटकने से भी नुकसान होगा। यानी इधर कुआं, उधर खाई वाली स्थिति है। इसके अलावा जिस ब्राह्मण अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने जिन कारणों से पद से इस्तीफा दिया, उनमें एक महत्वपूर्ण कारण जातीय उत्पीड़न के मामले में यूजीसी के बदले नियम हैं। अग्निहोत्री का कहना है ‍कि इस नियम में सवर्णों को स्वत: अपराधी मान लिया गया है। उन्हें जातीय उत्पीड़न के मामले में कोई भी फंसा सकता है। यह अन्याय है। हालांकि इस बारे में केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का स्पष्टीकरण आया है कि कोई भी इस कानून का दुरूपयोग नहीं कर सकता। जो भी व्यवस्था होगी वह संविधान की परिधि में होगी। यह व्यवस्था भी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में गई है। उनके मुताबिक यूजीसी के नए नियमों का उद्देश्य कैंपस पर जाति, धर्म, लिंग, जन्मस्थान, विकलांगता आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को पूरी तरह समाप्त करना है। इन नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षा संस्थानों (विश्वविद्यालयों और कॉलेजों) में इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान है, जो शिकायतों की जांच करेगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई (जैसे डिग्री रोकना, संस्थान की मान्यता रद्द करना आदि) कर सकेगी। यूजीसी ने 13 जनवरी को इन नियमों को अधिसूचित किया था। देश में इस नियम का व्यापक विरोध शुरू हो गया है। विरोधियों का कहना है कि नए दिशा- निर्देशों में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार केवल कुछ वर्गों तक सीमित कर दिया गया है, जहां केवल अनुसूचित जाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग ही शिकायत कर सकते हैं, जो अपने आप में पक्षपातपूर्ण है। नए एक्ट में झूठी शिकायतों पर कोई सजा का प्रावधान नहीं है, जिससे दुरुपयोग का खतरा है।
समग्रता में देखें तो पहले राजसत्ता धर्मसत्ता से वैधता चाहती थी तो अब धर्मसत्ता राजसत्ता से वैधता मांग रही है। हालांकि बहुत से सनातनियों का मानना है कि भले ही शंकराचार्य अपनी सत्ता के लिए अदालतों में मुकदमें लड़ रहे हों, लेकिन जनमानस में उनके प्रति आदर और सम्मान में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि वो धर्माधीश हैं। लेकिन आज धर्मसत्ता के लिए शंकराचार्यों का यह आचरण आदि शंकराचार्य के उस मूल सिद्धांत ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्‍या’ के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। यहां सारी लड़ाई धर्म को सत्ता मानकर उस पर काबिज रहने तथा गृहस्थाश्रम को छोड़ दें तो बाकी तमाम सांसारिक सुखों को उपभोगने की है। .
इसमें दो राय नहीं कि आज भारत में जितने भी खुद को संत महात्मा पीठाधीश्वर आदि कहलवाने वाले लोग हैं, वो धर्म के प्रचारक भले हों, धर्म के नियंता और रक्षक तो शायद ही हैं। ‘संत को कहा सीकरी सों काम’ की निर्मोही लेकिन नैतिक सत्ता वाले संत अब दुर्लभ हैं। कथावाचकों, बाबाअों, धर्माधिकारियों और धर्म के नाम पर स्वघोषित धर्माचार्यों की संख्या बढ़ती जा रही है और उसी तादाद में इनके भक्तों की तादाद भी बढ़ रही है। कौन कब किस बाबा का चोला पहन कर अव‍तरित हो जाए और लोग अपने विवेक को ताक पर रखकर उसकी सेवा में लीन हो जाएं, कहा नहीं जा सकता। धर्म और धर्माचार्यो की महत्ता का आदर होना ही चाहिए, लेकिन उसकी आड़ में पाखंड और सांसारिक सुखों के लिए निम्न स्तर की लड़ाई का विरोध भी जरूरी है। वरना एक आम इंसान और साधु-संतों और धर्माचार्यों में फर्क ही क्या है? शंकराचार्य ने टकराव का रास्ता चुना है, लेकिन इस लड़ाई में नैतिक बल किसके पास ज्यादा है, यह भी तय होगा। बावजूद इसके सनातन की झंडाबरदार दो शीर्ष जातियों के बीच यह दु:साध्य संघर्ष न सनातन के हित में है, न हिंदू हित में है और न ही देशहित में है।


– लेखक सुबह सवेरे के कार्यकारी प्रधान संपादक हे।
‘राइट क्लिक’

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