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संगठित गैंग सक्रिय, कमिश्नर के नकली आदेश से जमीन बेचने की कोशिश, प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल

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– आदिवासी ज़मीन फर्जीवाड़ा कांड`

– फर्जी अनुमति, कूटरचित दस्तावेज़ और दो साल से सक्रिय नकली एसडीएम
– FIR तो दर्ज पर मास्टरमाइंड अब भी फरार

शिवपुरी ।जिले में आदिवासियों की विक्रय-से-वर्जित भूमि पर चल रहे बड़े फर्जीवाड़े ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आदिवासी परिवारों को लुभावने सपने दिखाकर उनकी जमीन खरीदने में सक्रिय एक संगठित शातिर गैंग पर गंभीर आरोप सामने आए हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इस गिरोह ने न केवल कूटरचित दस्तावेज तैयार किए, बल्कि संभागीय आयुक्त ग्वालियर के नाम से नकली अनुमति पत्र, सील-सिक्के और आदेश तैयार कर लिए। इस पूरे रैकेट के बीच प्रशासन की चुप्पी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बता दें मामला तब उजागर हुआ जब उपपंजीयक कार्यालय शिवपुरी में पदस्थ उपपंजीयक निशा शर्मा ने संदिग्ध दस्तावेजों की जांच के बाद विस्तृत प्रतिवेदन कोतवाली पुलिस को सौंपा। 12 नवंबर 2025 को सौंपे गए इस प्रतिवेदन में बताया गया कि भूमि विक्रय के लिए प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों के साथ आयुक्त ग्वालियर का अनुमति आदेश क्रमांक /153/1-21/2025-26 दिनांक 19.06.2025 संलग्न था, जिसकी जांच में यह आदेश पूर्णतः फर्जी, कूटरचित और डिजिटल रूप से छेड़छाड़ किया हुआ पाया गया।

संदिग्ध रजिस्ट्री दस्तावेज क्रमांक MP23IGR18672025 A100916581 दिनांक 10.10.2025 की जांच में पाया गया कि अपलोड की गई अनुमति आयुक्त कार्यालय के रिकॉर्ड से मेल ही नहीं खाती। दस्तावेज़ों पर अलग-अलग तारीखें, ओवरराइटिंग, कटिंग-पेस्टिंग और गलत प्रकरण क्रमांक पाए गए। यह स्पष्ट संकेत है कि यह कोई साधारण त्रुटि नहीं, बल्कि संगठित तरीके से किया गया जमीन हड़पने का खेल है।
प्रकरण के केंद्र में आए आदिवासी रामकुमार आदिवासी, भारती आदिवासी और कोक सिंह आदिवासी के नाम पर अपलोड किए गए दस्तावेजों में भी गंभीर विसंगतियां पाई गईं। मज़ेदार बात यह कि अनुमति का कोई भी रिकॉर्ड आयुक्त कार्यालय के कंप्यूटराइज्ड सिस्टम में दर्ज ही नहीं था।ये कागजात कहाँ तैयार हुये इस पर पुलिस की चुप्पी संदिघ्ध है ।
इस पूरे मामले में एक और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि नकली एसडीएम बनकर दो साल से शिवपुरी में घूम रहा ठग इस खेल का बड़ा हिस्सा था। यह ठग भूख से जूझ रहे गरीब आदिवासियों को बरगलकर जमीन के एग्रीमेंट कराने से लेकर रजिस्ट्री तक करवाने में सक्रिय था। अचानक कांड उजागर होने के बाद वह शहर से गायब हो गया। पुलिस अभी तक उसके गिरेबान तक नहीं पहुंच सकी है।न ही वो दफ्तर सील किया है जहां से ये काला खेल चलता था । उन दुकानों को भी नहीं टटोला जहां से एग्रीमेंट टाइप किए गए।
कोतवाली पुलिस ने उपपंजीयक की शिकायत पर गंभीर धाराओं धारा 336(3), 338, 340 और 318(4) में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस का मानना है कि यह फर्जीवाड़ा किसी एक व्यक्ति का काम नहीं, बल्कि एक संगठित गिरोह की करतूत है, जिसमें दलाल, बिचौलिए और राजस्व तंत्र से जुड़े लोगों की संलिप्तता की संभावना प्रबल है।
इस पूरे कांड ने प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। सहरिया क्रांति संगठन लंबे समय से मांग कर रहा था कि 2001 से अब तक आदिवासियों की विक्रय-से-वर्जित जमीनों की जांच कराई जाए। उनका दावा था कि बड़े फर्जीवाड़े उजागर होंगे, मगर प्रशासन ने ज्ञापन मिलने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं की।
नतीजा यह हुआ कि आदिवासी अपनी ही जमीन से बेगाने होते गए, जबकि दलालों का गिरोह पूरे शहर में सक्रिय होकर सैकड़ों लोगों से अनुबंध कराता रहा। शहर के कई लोग इस जाल में फंसकर रजिस्ट्री तक कराने पहुंच गए। कई ने आदिवासियों से जमीन खरीदने के एग्रीमेंट करा रखे हैं , उन्हे लगता था कि ये विक्रय से वर्जित की विक्रय की अनुमति कलेक्टर या कमिश्नर से ले आएंगे और आदिवासियों की सोना उगलती ज़मीनें हमारी हो जाएंगी ….
प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि आने वाले दिनों में इस मामले से जुड़ी कई और परतें उजागर होंगी और बड़े नाम सामने आ सकते हैं। दस्तावेज़ जिन ऑफिसों में बैठे-बैठे स्वीकृत मान लिए गए, उन अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के दायरे में है।
फिलहाल, जिला प्रशासन, पंजीयन विभाग, आयुक्त कार्यालय और पुलिस पर दबाव बढ़ चुका है कि इस संगठित गिरोह को पूरी तरह बेनकाब किया जाए, वरना जिस रफ्तार से आदिवासी जमीनों पर खेल चल रहा है, शिवपुरी का आदिवासी समाज आने वाले वर्षों में पूरी तरह भूमिहीन हो सकता है।

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