आलेख
कृष्ण कांत सोनी
“तो भाइयो और बहनो, मध्यप्रदेश सरकार ने बेरोजगारी का गजब इलाज ढूंढ निकाला—नौकरी देना मुश्किल है, तो नाम बदल दो! 27 मार्च 2025 को ऐलान हुआ कि अब राज्य के बेरोजगार युवाओं को ‘बेरोजगार’ नहीं, बल्कि ‘आकांक्षी युवा’ कहा जाएगा। वाह रे सरकार, क्या मास्टरस्ट्रोक है! अमृतकाल में ये जादू देखो—जेब खाली, पेट खाली, पर टाइटल नया! कल तक जो नौकरी के लिए दर-दर भटक रहा था, आज वो ‘आकांक्षी’ बन गया। अब भूखे पेट को भी बोल दो, ‘चुपचाप सपने देख, रोटी तो बाद में आएगी!’ ये सुनकर जनता के माथे पर बल पड़ गए। एक भाई साहब बोले, ‘अरे, नौकरी नहीं दे सकते तो नाम बदलने से क्या फर्क पड़ेगा?’ पर सरकार का जवाब तैयार है—’हम बेरोजगार शब्द को बदनाम नहीं होने देंगे, ये आकांक्षा का दौर है!’ अरे भाई, आकांक्षा से बिल भर जाएंगे? 30 लाख से ज्यादा युवा नौकरी के लिए तरस रहे हैं, और सरकार शब्दों की माला जप रही है। मंत्री जी फरमाते हैं, ‘इनमें आकांक्षा है, इसलिए बेरोजगार नहीं कह सकते।’ वाह, तो फिर भूख को भी ‘आकांक्षी पेट’ कह दो, शायद चुप हो जाए! युवा पूछते हैं, ‘नौकरी कब दोगे?’ जवाब मिलता है, ‘अमृतकाल में धैर्य रखो, सपने देखो, आकांक्षी बनो!’ हंसी भी आती है, गुस्सा भी। जनता सोच रही है—नौकरी का कुआं तो सूखा पड़ा है, पर शब्दों की बारिश से क्या पेट भरेगा? एक तरफ दिल कहता है, ‘शायद कुछ बदले,’ दूसरी तरफ दिमाग चिल्लाता है, ‘अरे, ये तो बस नया लॉलीपॉप है!’ तो चलो, ‘आकांक्षी युवाओं,’ अब रिज्यूमे में ‘बेरोजगार’ मत लिखना, लिखो—’अमृतकाल का सपनों का सिपाही’। शायद सरकार खुद ढूंढ ले, वरना ये आकांक्षा भी बस हवा में तैरती रह जाएगी!”